UP: यूजीसी के नये नियमों पर अखिलेश यादव बोले-किसी के साथ उत्पीड़न और नाइंसाफी नहीं हो
यूजीसी के नए नियमों पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि किसी के साथ उत्पीड़न और नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए। वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमों पर रोक को उचित बताया और जांच समितियों में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की बात कही।
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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यूजीसी के नये नियमों को लेकर हुए घटनाक्रम पर कहा कि सच्चा न्याय किसी के साथ अन्याय नहीं होता है। न्यायालय यही सुनिश्चित करता है। कानून की भाषा और भाव साफ होना चाहिए। बात सिर्फ नियम नहीं, नीयत की भी होती है। किसी का उत्पीड़न, जुल्म-ज्यादती और नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए।
सपा अध्यक्ष ने बृहस्पतिवार को जारी अपने बयान में कहा कि देश में संविधान है। तमाम कानून हैं। इसके बाद भी समय-समय पर भेदभाव और अन्याय होता है। किसी भी मामले में दोषी नहीं बचे और निर्दोष के साथ अन्याय न हो। वर्ष 2012 में भी यूजीसी के रेगुलेशन आये थे। उसमें आखिर क्या कमी रह गई थी।
विश्वविद्यालयों में क्या-क्या व्यवहार हुए थे। हमने 2012 के रेगुलेशन से क्या सीखा। संविधान कहता है कि कहीं भेदभाव न हो। भाजपा सरकार नौजवानों को नौकरी, रोजगार नहीं दे रही है। महंगाई बढ़ा रही है। इससे आम जनता त्रस्त है। किसान, मजदूर सभी वर्ग परेशान हैं। खेती का लागत मूल्य बढ़ता जा रहा है। किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई। फसलों का सही दाम नहीं मिल रहा है। बिचौलिए हावी हैं। भाजपा सरकार जनता से किया गया कोई वादा पूरा नहीं कर पाई।
मायावती बोलीं-जांच कमेटी में अपरकास्ट समाज को देना था प्रतिनिधित्व
दूसरी ओर बसपा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने यूजीसी के नये नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को उचित बताया है। उन्होंने बृहस्पतिवार को जारी अपने बयान में कहा कि यूजीसी द्वारा देश के सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों में जातिवादी घटनाओं को रोकने के लिए जो नये नियम लागू किए गए हैं, उससे सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा हो गया है।
वर्तमान हालात के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट का यूजीसी के नये नियमों पर रोक लगाने का फैसला उचित है। इस मामले को लेकर देश में सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नये नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में ले लेती। जांच कमेटी आदि में भी अपरकास्ट समाज को नेचुरल जस्टिस के अंतर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती।