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उन्नाव दुष्कर्म कांड पीड़िता का भाई बोला, मेरी बहन ने अग्निपरीक्षा दी अब दोषियों को भी देना होगा

Sun, 08 Dec 2019 05:59 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sun, 08 Dec 2019 05:59 PM IST
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Unnao sexual assault victim's mother want brutal punishment for culprits.
शनिवार रात पीड़िता का शव उसके घर लाया गया। - फोटो : amar ujala

उन्नाव दुष्कर्म कांड की पीड़िता की मां और बड़ा भाई अस्पताल परिसर में रोते बिलखते दोषियों को गोलियों से भूनने की मांग कर रहे थे। पीड़िता के भाई ने कहा कि उनकी बहन अग्निपरीक्षा दे चुकी है। अब उसकी ऐसी हालत करने वाले दोषियों को यह परीक्षा देनी होगी। वे हर उस चीख का बदला लेना चाहते हैं जो उसकी बहन के मुंह से निकल रही थी।

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अपनी आंखों में आंसू लिए भाई ने कहा, मैं अपनी बहन को नहीं बचा पाया लेकिन मैं सरकार से मांग करता हूं कि आरोपियों को भी मौत की सजा मिलनी चाहिए। मैंने उससे वादा किया था कि सब मिलकर उसे बचा लेंगे पर ऐसा हुआ नहीं। आखिरी वक्त मुझसे गले मिलते हुए बहन ने कहा था कि सब कुछ खत्म हो गया। भाई ने कहा कि अपनी बहन के पार्थिव शव को न गंगा में बहाएंगे न ही चिता देंगे। वे उसे धरती माता की गोद में देंगे। रविवार शाम पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

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'न्याय मांगते-मांगते मेरी बेटी की चप्पलें घिस गईं'

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पीड़िता के परिजनों से मिलने पहुंची प्रियंका गांधी वाड्रा। - फोटो : amar ujala

प्रियंका गांधी को सामने देख पीड़िता के पिता की आंखों से आंसू निकलने लगे। रूंधे गले  से कहा कि न्याय मांगते-मांगते मेरी बेटी की चप्पलें घिस गईं और अंत में मौत मिली। बेटी मरते- मरते भाई से कह गई-भैया न्याय दिलाना।

पिता का आरोप है कि सत्तापक्ष के दबाव में दो जिलों की पुलिस बेटी को कई महीने तक दौड़ाती रही पर उसकी रिपोर्ट तक नहीं लिखी। कोर्ट और महिला आयोग का दबाव न होता तो अब तक रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती। मेरा तो परिवार तबाह हो गया। आरोपियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए।

उधर, प्रियंका ने कहा कि यूपी का तंत्र किसके साथ खड़ा है? समय से एफआईआर न लिखने वाले पुलिस अफसर के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। क्या उसे कार्रवाई के दायरे में लाया जाएगा, ताकि दूसरे अधिकारियों के लिए भी यह नजीर बन सके। प्रियंका ने कहा कि इसके लिए सामाजिक तौर पर हम सब दोषी हैं।  वहीं, यह प्रदेश की कानून-व्यवस्था का भी आईना है। बता दें कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाउ्रा पीड़िता के परिजनों से मिलने के लिए पहुंचीं थी।

दो साल में तीसरी बार चर्चा में उन्नाव

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पीड़िता का शव गांव पहुंचने पर भारी भीड़ लग गई। - फोटो : amar ujala

उन्नाव पिछले दो साल में तीसरी बार सुर्खियों में है। यह जिला जब भी सुर्खियों में आया, तब गाज पुलिस पर जरूर गिरी है। इस बार भी एक पुलिस अधिकारी को हटाया जा चुका है और दूसरे अधिकारी पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है। सबसे पहले चर्चा में यह जिला तब आया जब माखी थाना क्षेत्र के एसएचओ पर स्थानीय विधायक को दुष्कर्म के मामले में बचाने का आरोप लगा।

दुष्कर्म पीड़िता ने लखनऊ पहुंचकर आत्मदाह की कोशिश की, लेकिन बच गई। इसके दो दिन बाद पीड़िता के पिता को थाने में पीट-पीट कर मार डाला गया। मामले ने तूल पकड़ा, जांच सीबीआई तक पहुंची और सीबीआई ने माखी थाने के एसएचओ समेत आधा दर्जन पुलिस कर्मियों को सलाखों के पीछे भेज दिया। एसपी और सीओ को हटा दिया गया।

यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि पैरवी के लिए अपने वकील के साथ रायबरेली जा रही इसी मामले की रेप पीड़िता की गाड़ी एक ट्रक से टकरा गई, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। आरोप फिर आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के लोगों पर लगा। यह मामला भी सीबीआई को सौंपा गया और कई दिनों तक सीबीआई रायबरेली और उन्नाव की खाक छानती रही और कई दिनों तक उन्नाव में डेरा डाले रखा। इस मामले में भी पीड़िता की सुरक्षा में लगे पुलिस कर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई।

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उन्नाव, लखनऊ और दिल्ली के अस्पतालों में जिंदगी से जंग लड़ने के बाद हुई मौत

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बिहार थानाक्षेत्र में पीड़िता के घर के बाहर तैनात पुलिसकर्मी। - फोटो : amar ujala

अब ताजा मामला भी इसी जिले में हुए दुष्कर्म का है। लेकिन यह न तो माखी थाने का है और न ही किसी विधायक से जुड़ा है। फिर भी सुर्खियों में इसलिए है कि रेप पीड़िता को आग के हवाले कर दिया गया। उन्नाव, लखनऊ और दिल्ली के अस्पतालों में जिंदगी से जंग लड़ने के बाद उसकी मौत हो गई। इस मामले में भी एएसपी विनोद कुमार पांडेय को हटा दिया गया। घटना को लेकर दिए गए विवादित बयान को लेकर स्थानीय सीओ पर भी कार्रवाई की तलवार लटक रही है।

स्थिति संभालने को अब युवा अफसरों पर भरोसा
सरकार ने उन्नाव की स्थिति संभालने के लिए युवा अफसरों पर भरोसा दिखाया है। 3 दिसंबर को यहां की कमान 2014 बैच के आईपीएस विक्रांतवीर ने बतौर एसपी संभाली थी। विक्रांतवीर का किसी जिले का यह पहला चार्ज है। इससे पहले वे लखनऊ में एसपी ग्रामीण, एसपी उत्तरी, एएसपी बलिया के पद पर तैनात रह चुके हैं। विक्रांत को जिले की कमान पहली बार मिली है।

घटना के बाद हटाए गए एएसपी विनोद कुमार पांडेय के स्थान पर डायरेक्ट आईपीएस धवल जायसवाल को भेजा गया है। धवल 2016 बैच के अधिकारी हैं। वे बतौर प्रशिक्षु प्रयागराज में और मेरठ में एएसपी के रूप में तैनात रहे हैं। अब देखना है जायसवाल उन्नाव में कितने दिनों तक जम पात हैं।

नर्सों की आंखों में भी छलक उठे आंसू

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बिहार थानाक्षेत्र में पीड़िता के घर के बाहर तैनात पुलिसकर्मी। - फोटो : amar ujala

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में देश का सबसे बेहतर बर्न यूनिट होने की वजह से यहां आए दिन जलने के मामले आते हैं, लेकिन शुक्रवार देर रात उन्नाव की बिटिया के दम तोड़ने की खबर सुनते ही अस्पताल के डॉक्टर व नर्सों की आंखों में भी आंसू छलक उठे। हर कोई सात वर्ष पहले इसी दिसंबर के महीने में अस्पताल पहुंची निर्भया को याद करने लगा। डॉक्टरों का कहना था कि निर्भया की तरह ही उन्नाव की बिटिया बड़ी हिम्मत वाली थी। पूरा शरीर जलने के बाद भी वह हिम्मत नहीं हार रही थी।

अस्पताल की नर्स शकुंतला देवी बताती हैं कि सात वर्ष पहले जब निर्भया अस्पताल पहुंची थी उस वक्त अस्पताल में मौजूद हर कर्मचारी की रूह तक कांप उठी थी। ठीक वैसा ही उन्नाव की बिटिया को देखकर महसूस हुआ। पूरे शरीर पर बंधी पट्टियां और काला पड़ा चेहरा रोंगटे खड़े कर दे रहा था। अस्पताल के ही डॉ. विष्णु कुमार का कहना है कि कोई इतना भी जालिम कैसे हो सकता है?

एक डॉक्टर होने के नाते वह आग में झुलसे मरीजों की पीड़ा समझ सकते हैं, लेकिन एक आम व्यक्ति जब ऐसे मरीज को देखता है तो उसकी आंखों में आंसू ही दिखाई देते हैं। नर्स प्रेमरोज ने बताया कि उन्नाव की बिटिया की हालत शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। इस केस ने निर्भया की याद दिला दी। सात वर्ष पहले भी जघन्य अपराध की शिकार निर्भया जिस दर्द से कराह रही थी, वैसा ही इस बार भी सुनाई दिया।

अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुनील गुप्ता का कहना है कि शुरुआत से ही उन्नाव की बेटी की हालत बेहद गंभीर थी। उसे बचाने के लिए हर संभव प्रयास डॉक्टरों की ओर से किए गए थे लेकिन चिकित्सा विज्ञान भी अत्यधिक फीसदी बर्न केस में लाचार हो जाता है। वहीं बर्न विभागाध्यक्ष डॉ. शलभ कुमार का कहना था कि उन्नाव की बेटी का दर्द न सिर्फ उनके विभाग, बल्कि अस्पताल में मौजूद हर कर्मचारी, डॉक्टर और नर्स महसूस कर रहा था।

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