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यूनीसेफ ने जारी किया बाल विवाह का आंकड़ा : हर दूसरे घर में बेटियां बन रहीं बाल वधु
Wed, 27 Mar 2019 01:22 AM IST
दुष्यंत शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला श्रावस्ती
न्यूज डेस्क, अमर उजाला श्रावस्ती
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 27 Mar 2019 01:22 AM IST
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बाल विवाह
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वोट के लिए सामाजिक कलंक कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बना। यही कारण है कि हर दूसरे घर में एक बेटी बाल वधु बन कर ससुराल जा रही है। यूनीसेफ द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार श्रावस्ती बाल विवाह के मामले में विश्व के दूसरे स्थान पर तो प्रदेश में पहले पायदान पर है। यहां 69 प्रतिशत बेटियों का विवाह कम उम्र में ही हो जाता है।
श्रावस्ती की पहचान अब भगवान बुद्ध के ज्ञान या फिर भगवान राम के पुत्र लव की राजधानी के रूप में न होकर बाल विवाह जैसे सामाजिक कलंक के रूप में हो रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह कुप्रथा आज की नहीं है बल्कि वर्षों से तराई वाले क्षेत्र में अपना घर जमाए बैठा है। लेकिन इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए किसी भी चुनाव में कभी भी मुद्दा नहीं बना।
यहां तक कि किसी भी बड़े मंच से आवाज भी नहीं उठी। देखा जाए तो 69 प्रतिशत बेटियों का विवाह बाल वधु के रूप में होता है। यूनीसेफ इस कुप्रथा का कारण अशिक्षा को मान रहा है। शिक्षा का आंकड़ा भी इस जिले में चौंकाने वाला है। यहां मात्र 43.89 प्रतिशत महिलाएं ही साक्षर हैं। जबकि पुरुष की साक्षरता दर 59.55 प्रतिशत है। यह वह लोग हैं जो राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत किसी तरह से अपना नाम लिख लेते हैं।
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इनमें से अधिकांश साक्षर न तो ठीक से कुछ पढ़ सकते हैं और न लिख सकते हैं। जिले में यह कुप्रथा की जड़ें कितनी गहराई तक फैली हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मुद्दे पर जागरूकता कर रही महिला सामाख्या को अप्रैल 2018 से मार्च 2019 के बीच कुल 84 स्थानों से बाल विवाह होने की सूचना मिली। 45 स्थानों पर महिला सामाख्या ने बाल विवाह रुकवाया। जबकि तीन स्थानों पर जिला प्रोवेशन को मिली सूचना के बाद उन्होंने भी बाल विवाह को रुकवाया।
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श्रावस्ती की पहचान अब भगवान बुद्ध के ज्ञान या फिर भगवान राम के पुत्र लव की राजधानी के रूप में न होकर बाल विवाह जैसे सामाजिक कलंक के रूप में हो रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह कुप्रथा आज की नहीं है बल्कि वर्षों से तराई वाले क्षेत्र में अपना घर जमाए बैठा है। लेकिन इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए किसी भी चुनाव में कभी भी मुद्दा नहीं बना।
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यहां तक कि किसी भी बड़े मंच से आवाज भी नहीं उठी। देखा जाए तो 69 प्रतिशत बेटियों का विवाह बाल वधु के रूप में होता है। यूनीसेफ इस कुप्रथा का कारण अशिक्षा को मान रहा है। शिक्षा का आंकड़ा भी इस जिले में चौंकाने वाला है। यहां मात्र 43.89 प्रतिशत महिलाएं ही साक्षर हैं। जबकि पुरुष की साक्षरता दर 59.55 प्रतिशत है। यह वह लोग हैं जो राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत किसी तरह से अपना नाम लिख लेते हैं।
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इनमें से अधिकांश साक्षर न तो ठीक से कुछ पढ़ सकते हैं और न लिख सकते हैं। जिले में यह कुप्रथा की जड़ें कितनी गहराई तक फैली हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मुद्दे पर जागरूकता कर रही महिला सामाख्या को अप्रैल 2018 से मार्च 2019 के बीच कुल 84 स्थानों से बाल विवाह होने की सूचना मिली। 45 स्थानों पर महिला सामाख्या ने बाल विवाह रुकवाया। जबकि तीन स्थानों पर जिला प्रोवेशन को मिली सूचना के बाद उन्होंने भी बाल विवाह को रुकवाया।
आंकड़े एक नजर में
- जिले की कुल जनसंख्या - 1373731
- साक्षरता - 51.72 प्रतिशत
- महिला साक्षरता - 43.89
- पुरुष साक्षरता - 59.55
- बाल विवाह - 69 फीसदी
इन इलाकों से ज्यादा मिलती सूचनाएं
बाल विवाह रोकने की सबसे ज्यादा सूचना सिरसिया, जमुनहा व हरिहरपुररानी से मिलती हैं। यह वह इलाके हैं जहां की साक्षरता दर भी कम है।
श्रावस्ती के लिए बाल विवाह एक बड़ा मुद्दा है। इस पर काफी दिनों से काम भी हो रहा है। लेकिन बिना जन जागरूकता व शिक्षा के कुछ भी हो पाना आसान नहीं है। इस मुद्दे को यदि धार्मिक व राजनीतिक तौर पर भी लिया जाए तो परिवर्तन की रफ्तार बढ़ेगी।
- इंदू, जिला समन्वयक महिला सामाख्या