सज गई यूपी की सियासी रणभूमि
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नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के 53 प्रत्याशियों की घोषणा के साथ प्रदेश के दो तिहाई हिस्से में चुनावी महासमर की स्थिति साफ होती नजर आ रही है।
दिलचस्प बात है कि बसपा छोड़ शेष सभी दलों में टिकट वितरण को लेकर असंतोष की लपटें हर खेमे में दिखाई दे रही हैं। कहीं कम, कहीं ज्यादा।
एक जगह पढ़िए, यूपी के सारे सियासी योद्धाओं के नाम
पर सबसे दिलचस्प चुनाव वाराणसी में होगा जहां भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को जेल में बंद बाहुबली मुख्तार अंसारी भी चुनौती देते नजर आएंगे।
वहीं आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी यहां से मैदान में उतरने को बेताब हैं। हालांकि उन्होंने अभी इस बाबत साफ नहीं किया। देखना यह होगा कि यहां बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार होगा या सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण।
बड़े चेहरे जो हैं यूपी से मैदान में
खास यह भी होगा कि देश की राजनीति के तमाम चर्चित चेहरे इसी प्रदेश की जनता की अदालत में खड़े नजर आएंगे।
मसलन नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा, मुलायम सिंह यादव, डिम्पल यादव, अजित सिंह, जयंत चौधरी और अमर सिंह।
कुमार विश्वास व शाजिया इल्मी भी यहीं से मैदान में होंगे। अरविंद केजरीवाल भी मूड में दिख रहे हैं।
कभी भाजपा के तारणहार की भूमिका में रहे और कभी उसको जमींदोज करने की बात करने वाले कल्याण सिंह संभवत: स्वास्थ्य कारणों से मैदान से बाहर रहेंगे।
ये ग्लैमर छोड़ अब करने चले नेतागीरी
ग्लैमर की दुनिया से वास्ता रखने वाले कई लोगों ने भी देश के सबसे बड़े राज्य में किस्मत आजमाना पसंद किया है।
जौनपुर में भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार अभिनेता रविकिशन, मेरठ में अभिनेत्री नगमा, बिजनौर में जयाप्रदा और गाजियाबाद में राजबब्बर अपनी अदाएं दिखाते नजर आएंगे।
क्रिकेट खिलाड़ी मो. कैफ फूलपुर में सियासी पिच पर बैटिंग करते दिखेंगे।
खास बात यह है कि हर बार अपने चुनावी रंग को बॉलीवुड का तड़का देने वाली समाजवादी पार्टी में इस बार फिल्मी दुनिया का कोई चेहरा लाल टोपी पहने नहीं दिखेगा।
सभी दलों को अपनों से चुनौती
पिछले चुनाव से अलग इस बार मोदी फैक्टर के कारण हाशिये से निकलकर भाजपा तकरीबन हर सीट पर चुनौती देती नजर आएगी।
यह भी निश्चित है कि नरेंद्र मोदी के वाराणसी से चुनाव लडऩे के कारण भाजपा अतिरिक्त उत्साह के साथ मैदान पर होगी।
पर सिक्के का दूसरा पहलू भी है। सियासी ऊफान पर खड़ी भाजपा सहित सभी दलों को पहली चुनौती अपनों से मिल रही है।
भाजपा को जौनपुर, बलिया, गाजीपुर व देवरिया में प्रत्याशी घोषित होने के साथ उनका विरोध प्रारंभ हो गया है। जबकि लखनऊ व वाराणसी में आक्रोश भीतर-भीतर ही सुलग रहा है।
सपा ने बदल दिए 38 प्रत्याशी
एक साल पहले प्रत्याशी घोषित कर चुकी सपा अब तक करीब 38 प्रत्याशी बदल चुकी है। सूबे में बहुमत सरकार होने के बावजूद सोमपाल शास्त्री बागपत, बृजभूषण शरण सिंह कैसरगंज तथा कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव कानपुर से टिकट लौटा चुके हैं।
फर्रुखाबाद व संभल सहित कई सीटों पर सपा प्रत्याशियों को अपनों का खुले विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि कांग्रेस का ग्राफ आज की तारीख में चढ़ता नजर नहीं आ रहा है इसके बावजूद सीतापुर, फूलपुर व मोहनलालगंज सहित कई सीटों पर प्रत्याशियों को लेकर टकराव की स्थिति पैदा हो गई है।
बसपा में भी कई सीटों पर कार्यकर्ताओं की एकजुटता नहीं है पर विरोध व्यापक स्तर पर सार्वजनिक तौर से उजागर नहीं हो रहा है।
मुजफ्फरनगर दंगा बना बड़ा मुद्दा
अमूमन राष्ट्रीय मुद्दों पर होने वाला लोकसभा चुनाव इस बार भ्रष्टाचार के अलावा मुजफ्फरगनर खास मुद्दा होगा।
तकरीबन सभी दल इस मुद्दे को लेकर एक दूसरे को सवालों के कठघरे में खड़ा करते नजर आएंगे।
गौरतलब है कि इस दंगे में 55 से अधिक लोगों की जानें गई थीं और इसने लोकसभा व प्रदेश की विधानसभा को भी झकझोरा था।
दंगे की राजनीतिक गंभीरता को इस तथ्य से भी आंका जा सकता है कि खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि विधानसभा में कहा था कि यह दंगा मेरे राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा दाग होगा।
किसी को बाहुबलियों से परहेज नहीं
हर बार की तरह इस बार भी राजनीतिक दलों ने बाहुबलियों से परहेज नहीं किया। ऐसे लोगों की चुनाव जिताऊ क्षमता ने किसी को अपने संकल्प पर अडिग न रहने को मजबूर किया।
भाजपा से रमांकात यादव, सपा से अतीक अहमद इस बात की खास मिसाल हैं। बसपा ने भी जितेंद्र सिंह बबलू व पवन पांडेय सरीखों को प्रत्याशी बनाने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई।
कांग्रेस ने अभी किसी ऐसे पर हाथ नहीं लगाया। कौमी एकता दल से मुख्तार अंसारी व डीपी यादव भी लोकतंत्र के इस मेले में करतब दिखाते नजर आएंगे।