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दंगा: ये हाल न होते, गर उस अफसर को वोट से न तौलते!
राजेंद्र सिंह/लखनऊ
Updated Tue, 10 Sep 2013 05:49 PM IST
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केस-1 मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में 27 अगस्त को छेड़छाड़ के विवाद के बाद दो पक्षों के तीन युवाओं की हत्या के बाद सपा नेताओं की शिकायत पर वहां के डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी को हटा दिया जाता है।
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केस-2 लखीमपुर खीरी की डीएम डॉ. मनीषा त्रिघाटिया का यह कहकर तबादला कर दिया जाता है कि वे लेखपालों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में नाकाम रही हैं, जबकि राजधानी समेत सभी जिलों में दागी लेखपाल चिह्नित हैं।
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केस-3 इलाहाबाद के कमिश्नर बनाए गए हिमांशु कुमार ने खनन माफिया के खिलाफ सख्ती क्या की, एक सप्ताह से पहले ही उन्हें वहां से हटा दिया गया।
पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में सांप्रदायिक हिंसा को लेकर सियासी चश्मे से लिए जाने वाले फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे फैसले हालात को बिगाड़ने में खाद-पानी का काम करते हैं।
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अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में भी मेरिट के बजाय वोटों का गुणा-भाग लगाया जाने लगा है। सत्ता पक्ष के नेता अफसरों का हटाने-लगाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।
तभी तो नोएडा की एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन पर दर्जा प्राप्त मंत्री नरेंद्र भाटी ने दावा किया था कि उन्होंने 42 मिनट में महिला आईएएस अफसर पर गाज गिरवा दी।
मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत में हिंसक वारदातों के बाद सरकार के और फैसलों के साथ ही अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग पर भी नुक्ताचीनी हो रही है।
27 अगस्त को कवाल में तीन युवकों की हत्या के बाद उसी दिन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी को हटा दिया गया था।
माना गया कि स्थानीय सपा नेताओं के कहने पर यह फैसला लिया गया ताकि वे इसका राजनीतिक लाभ ले सकें। सरकार के प्रशासनिक फैसले पर सियासत हावी हो गई।
नतीजतन मुजफ्फरनगर-शामली का माहौल सबके सामने है। सोमवार को मुजफ्फरनगर, शामली के एसपी तथा सहारनपुर के कमिश्नर और डीआईजी भी हटा दिए गए। नए अफसर स्थिति को संभालने में तो कमिश्नर, डीआईजी हालात की गंभीरता को भांपने में नाकाम रहे।
दरअसल डीएम-एसएसपी केतबादले के अगले ही दिन नए अफसर भेज दिए गए थे। हालात नहीं सुधरे तो पुलिस महानिदेशक देवराज नागर समेत कई वरिष्ठ पुलिस अफसर भी मुजफ्फरनगर पहुंचे। लेकिन वे न तो पंचायतों में जुटने वाली भीड़ और न ही उसके असर का आकलन कर सके।
पंचायत से लौटते वक्त भीड़ को जिन मुस्लिम बहुल गांवों से गुजरना था, वहां सुरक्षा बंदोबस्तों के बारे में सोचा ही नहीं नहीं गया। मारे गए जिन दो युवकों के परिवार के खिलाफ हत्या का फर्जी केस दर्ज करने पर गुस्सा भड़का था उसे नए पुलिस कप्तान सुभाष चंद दुबे वापस नहीं करा सके। इसके पीछे भी सियासी कारण रहे। सोमवार को दुबे को भी हटा दिया गया।
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव कहते रहे हैं कि कानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए बड़े अफसरों पर गाज गिरनी चाहिए। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते रहे हैं कि सांप्रदायिक दंगे होने पर डीएम-एसपी को जिम्मेदार माना जाएगा।
लेकिन ये पैमाने कार्रवाई के वक्त ध्यान में नहीं रखे जाते। तब बड़े आरोपों के बावजूद कुछ अफसर बच जाते हैं और हल्के मामलों पर कुछ पर गाज गिर जाती है। दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला अभी ताजा है। उन्हें सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आंशका के मद्देनदर निलंबित कर दिया गया।
मुजफ्फरनगर-शामली में बड़े पैमाने पर दंगों पर रोक लगा पाने में नाकाम रहने पर सरकार क्या बड़े अफसरों पर कार्रवाई करेगी ? ऐसे मामलों की लंबी फेहरिस्त है जहां ट्रांसफर-पोस्टिंग के फैसले सियासत या अन्य वजहों से प्रभावित होते दिखे। कानपुर की कमिश्नर शालिनी प्रसाद को फर्रुखाबाद में लैपटॉप वितरण समारोह के दौरान अव्यवस्था के चलते हटा गिया गया था जबकि इसकी जिम्मेदारी डीएम की थी।