यूपी चुनाव: जाटलैंड में होगा भगवा ब्रिगेड का लिटमस टेस्ट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गंगा-यमुना के दोआबे में पडऩे वाली जिन 73 विधानसभा सीटों पर 11 फरवरी को पहले चरण में वोट पड़ेंगे, वे सपा-कांग्रेस गठबंधन, बसपा और भाजपा के साथ ही रालोद के लिए भी काफी अहम हैं।
पिछली बार सर्वाधिक सीट जीतने वाले सपा और बसपा के सामने जहां बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है। भाजपा की प्रयोगशाला के कच्चे माल का इम्तिहान भी पहले चरण में ही होगा।
वेस्ट यूपी की जाट लैंड में चौधरी अजित सिंह का दमखम भी पहला चरण ही तय करेगा। पश्चिमी यूपी के मेरठ, सहारनपुर, अलीगढ़ और आगरा मंडल के 15 जिलों की 73 सीटों पर वोटरों का शुरुआती रुझान अगले चरणों के मतदान पर असर डालेगा, इसलिए सभी दलों ने 11 फरवरी को वोटिंग वाली सीटों पर ताकत झोंक रखी है।
सीएम अखिलेश यादव, की धुआंधार सभाएं हो रही हैं। शुक्रवार को आगरा में राहुल-अखिलेश ने रोड शो व साझी सभा की तो उसी समय मेरठ शहर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पदयात्रा होनी थी, हालांकि एक व्यापारी की हत्या के चलते इसे स्थगित कर दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 4 फरवरी को मेरठ व 5 को अलीगढ़ में सभाओं को संबोधित कर रहे हैं। मायावती कई जिलों में रैलियां कर चुकी हैं। अजित सिंह व जयंत चौधरी भी लगातार चुनावी सभाएं कर रहे हैं।
कुल मिलाकर चुनावी माहौल शबाब पर पहुंच गया है। सभी दल अपने एजेंडे को धार दे रहे हैं, एक-दूसरे पर वार कर रहे हैं। प्रचार के मुद्दों ने उनकी चुनावी दिशा भी साफ कर दी है। मतदाता जाति, धर्म के आधार पर बंटे लग रहे हैं, किसी भी दल के पक्ष में कोई लहर उठती नहीं दिख रही है, लिहाजा मुकाबला अभी चतुष्कोणीय बना हुआ है।
भाजपा: लोकसभा के नतीजे दोहराने के टोटके
भाजपा को वर्ष 2012 में पहले चरण की 73 में से 12 सीटें मिली थी लेकिन लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद को छोड़कर शेष सभी सीटों पर भाजपा ने जीती थी। उसने 60 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल की थी।
भाजपा की कोशिश 2017 के विधानसभा चुनाव में 2014 को दोहराने की है। इसके लिए वोटों के ध्रुवीकरण व हिंदुत्व को धार देने वाले मुद्दे प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ध्रुवीकरण कराने में सफल रही थी।
भाजपा ने चुनाव प्रचार की शुरुआत फायरब्रांड सांसद महंत आदित्यनाथ से कराकर अपना एजेंडा सामने रख दिया। वह हिंदुओं के पलायन से लेकर छेड़छाड़, पशुओं के अवैध कटान, गौकशी जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं।
पश्चिमी यूपी के हालात कश्मीर जैसे बता रहे हैं। दरअसल, ये ही मुद्दे वोटों के ध्रुवीकरण के लिए भाजपा की प्रयोगशाला में कच्चे माल का काम करते हैं। असली परीक्षा भाजपा के कच्चे माल की है कि वह कितना असर दिखाता है।
सपा-कांग्रेस: युवाओं, मुस्लिमों को साधने की कोशिश
वर्ष 2012 के लोकसभा चुनाव में सपा को 24 और कांग्रेस को 5 सीटों पर कामयाबी मिली थी। इस समय सपा अकेले चुनाव मैदान में थी। कांग्रेस का राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन था।
इस बार सपा और कांग्रेस गठबंधन करके चुनाव मैदान में हैं। राहुल गांधी और अखिलेश यादव प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प का संदेश देने की कोशिश कर रही है ताकि भाजपा विरोधी मतों का रुझान उनके पक्ष में हो सके।
अखिलेश विकास के एजेंडे को सामने रख रहे हैं। वह अपने काम और केंद्र सरकार की नाकामी गिना रहे हैं। यूपी से भेदभाव के आरोप लगा रहे हैं। पूछते हैं कि अच्छे दिन आए क्या ? वह नोटबंदी को भी मुद्दा बना रहे हैं।
सपा-कांग्रेस गठबंधन की कोशिश है कि राहुल-अखिलेश की दोस्ती का उपयोग युवाओं, मुस्लिमों, ब्राह्मणों, यादवों समेत किसानों जातियों को साधने के लिए किया जाए। कांग्रेस के मुद्दे भी लगभग वहीं हैं जो सपा के हैं। कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को 27 साल बाद सत्ता में वापसी का सपना दिखा रही है।
बसपा: दलित-मुस्लिम समीकरण पर भरोसा
पहले चरण की सीटों पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने दलित-मुस्लिम समीकरण बनाने के साथ ही सर्वसमाज को जोडऩे की कोशिश की है। उन्होंने टिकट वितरण में इसका ख्याल रखा है।
चुनावी मुद्दों को देखें तो बसपा प्रदेश और केंद्र, दोनों ही सरकारों पर तीखे हमले कर रहे हैं। नोटबंदी और बड़े पूंजीपतियों की मदद से लेकर सांप्रदायिकता फैलाने तक के सवालों पर पीएम नरेन्द्र मोदी व भाजपा की घेराबंदी कर रहे हैं।
नोटबंदी को वह प्रमुखता से उठाती है इसे गांव, गरीब व किसान विरोधी बताती हैं। कानून व्यवस्था के मुद्दे पर वह प्रदेश सरकार को कोई रियायत नहीं देती है। वह मुलायम परिवार के अंदरूनी झगड़े पर भी बोलती है।
वह मुलायम सिंह पर पुत्र मोह में शिवपाल का अपमान करने का आरोप भी लगा रही हैं। वह अखिलेश सरकार की कई विकास योजनाओं को अपनी बताकर उनका श्रेय भी ले रही हैं।
रालोद: जाटों के भरोसे, मुस्लिमों की वापसी की परीक्षा
2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से रालोद को बहुत नुकसान हुआ था। उसका जाट-मुसलमान समीकरण टूटा था। नतीजतन 2014 के लोकसभा चुनाव में अजित सिंह बागपत और जयंत चौधरी मथुरा से चुनाव हार गए। अब स्थिति बदली है।
रालोद ने कई मुस्लिम प्रत्याशी उतारे हैं। उनकी हार-जीत से पता लगेगा कि रालोद के पुराने समीकरण कितने दुरुस्त हुए। हालांकि पश्चिमी यूपी समेत प्रदेश भर में बड़ी संख्या में दूसरे दलों के लोग रालोद में शामिल हुए हैं। मुस्लिम नेताओं की वापसी भी हुई है।