Report: विकास में पास तो प्रशासन में फेल हुए अखिलेश!
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तीन साल बाद उत्तर प्रदेश एक बार फिर खुद से यह सवाल कर रहा है कि 2012 में उसने जिस सरकार को बहुत उम्मीदों के साथ चुना था, उसने उसके लिए किया क्या?
पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यह बताने और जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी सरकार बेहतर काम कर रही है। प्रदेश विकास की पटरी पर सरपट दौड़ लगा रहा है।
एक्सप्रेस-वे, आईटी सिटी और मेट्रो के सपनों पर सवार प्रदेश की जनता विकास की दौड़ में दूसरे प्रदेशों को बहुत पीछे छोड़ चुकी है। लेकिन क्या यूपी में रहने वाले लोग भी सचमुच ऐसा ही महसूस कर रहे हैं, जैसा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का दावा है? इस सवाल का जवाब बहुत आसान नहीं है। न प्रदेश की सरकार के लिए, न यहां की जनता के लिए।
विकास दरअसल जुमला बनता जा रहा है। सियासत चलाने और सत्ता पाने के सबसे सुनहरे नारे के रूप में विकास शब्द का इस्तेमाल इसके वास्तविक अर्थ को बेमतलब बनाता जा रहा है।
विकास कहीं दिखता है तो नेताओं के बयान में और उससे भी अधिक चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंगों में। होर्डिंगों और पोस्टरों से परहेज करने वाली अखिलेश सरकार ने भी तीसरा साल आते-आते विकास को चौराहों के होर्डिंगों पर टांग दिया है।
विकास के साथ व्यवस्था पर संतुलन नहीं
पिछले साल लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की करारी हार के बाद से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी सभाओं और कार्यक्रमों में भी बार-बार यह दोहराते नजर आते हैं कि उनकी सरकार विकास के काम तो कर रही है, लेकिन उसका श्रेय उन्हें नहीं मिल पा रहा है।
उनके काम को पर्याप्त प्रचार नहीं मिल रहा है। सरकार के तीसरे साल की उपलब्धि यही दिख रही है कि काम के अलावा प्रचार पर भी अब पूरा जोर है।
वैसे सरकार ने केवल यहीं पर यू टर्न नहीं लिया। मुख्यमंत्री ने पहले और दूसरे साल में सरकार को मिली बदनामियों और नाकामियों को भुलाकर पूरे जोश के साथ विकास योजनाओं पर तेजी से काम किया।
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे योजना के प्रति दृढ़ता दिखाते हुए इसे सरकारी धन से पूरा करने की उनकी प्रतिबद्धता की सराहना तो करनी ही होगी। अगर केंद्र की पूरी मदद मिले तो लखनऊ में आईटी सिटी और मेट्रो योजनाओं की ओर सरकार के बढ़ते कदम जरूर अखिलेश सरकार की उपलब्धियों के रूप में याद किए जाएंगे।
लेकिन अखिलेश सरकार के ये सारे काम समाजवादी पार्टी का ग्राफ ऊपर ले जाते नहीं दिख रहे क्योंकि मुख्यमंत्री ने विकास के साथ व्यवस्था का संतुलन बनाने पर अपेक्षित जोर नहीं दिया।
खुद मुलायम के निशाने पर भी अखिलेश
प्रदेश में कानून-व्यवस्था का सवाल हमेशा नए रूपों में सिर उठाता रहा है। नजीर की कमी नहीं है। प्रशासन पर पकड़ को लेकर वह विपक्ष के साथ साथ अपनी ही पार्टी के मुखिया के निशाने पर रहे हैं।
सवाल एक बार फिर वही कि अगर कोई विद्यार्थी सारे विषय में पास हो और एक विषय में उसे न्यूनतम से भी कम अंक मिले हों तो उसे कैसे पास घोषित किया जाएगा। चौथे साल में प्रवेश कर रही अखिलेश सरकार के लिए यह सवाल बेहद मौजूं हैं।
कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार पर अंकुश और पार्टी में अनुशासन ऐसे विषय हैं जिस पर अखिलेश सरकार को आगे बेहद सख्ती से आगे बढ़ना होगा। उन्हें यह नहीं भूलना होगा कि भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची के खिलाफ उनके डटकर मुकाबले की वजह से ही 2012 में उन्हें ऐतिहासिक जीत मिली थी।
अब जबकि उनके मंत्रियों पर वैसे ही आरोप लग रहे हैं उनकी चुप्पी खुद उनके और उनकी पार्टी के लिए घातक साबित हो सकते हैं।
सत्ताधारी पार्टी के भीतर की अनुशासनहीनता भी संवेदनशील विषय है, जिस पर उन्हें गौर करना ही होगा। आने वाले साल में यह सवाल और तीखा हो जाएगा कि कानून व्यवस्था को लेकर अखिलेश सरकार ने क्या किया?