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Lucknow News: पितृ पक्ष में इस बार तृतीया व चतुर्थी का श्राद्ध एक ही दिन
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लखनऊ। पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से होती है। यह तिथि इस बार सात सितंबर को है। इसका समापन अश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर 21 सितंबर को होगा। खास बात यह है कि इस बार तृतीया और चतुर्थी का श्राद्ध एक ही दिन 10 सितंबर को पड़ेगा।
मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पूर्वज अपने परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। पितृपक्ष में किए दान-धर्म के कार्यों से पूर्वजों की आत्मा को तो शांति मिलती है, पितृ ऋण से भी मुक्ति मिलती है।
अश्विन कृष्ण प्रतिपदा को नाना-नानी का श्राद्ध, पंचमी को जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध करना चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप तिवारी ने बताया कि जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है तो उसी दौरान पितृ पक्ष पड़ते हैं। सूर्य जब हस्त नक्षत्र को स्पर्श करता है तो उस काल में गया जाकर पितरों का श्राद्ध करना सबसे उत्तम माना गया है।
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ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि सात सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध , आठ को प्रतिपदा का श्राद्ध, नौ को द्वितीया का श्राद्ध, 10 को तृतीया और चतुर्थी का श्राद्ध होगा। 11 को पंचमी, 12 को षष्ठी, 13 को सप्तमी, 14 को अष्टमी, 15 को नवमी पर सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध किया जाएगा। 16 को दशमी, 17 को एकादशी, 18 को द्वादशी/सन्यासियों का श्राद्ध, 19 को त्रयोदशी, 20 को चतुर्दशी, 21 को अमावस्या के श्राद्ध के साथ सर्वपितृ अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध किया जाएगा।
पितृ कर्म के लिए उपयुक्त समय
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि पितृ कर्म के लिए दिन में 11:36 से 12:24 बजे तक कुतुप काल, 12:24 से 1:12 बजे तक रोहिण काल और दोपहर 1:12 बजे से 3:55 बजे तक के समय को उपयुक्त माना गया है।
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मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पूर्वज अपने परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। पितृपक्ष में किए दान-धर्म के कार्यों से पूर्वजों की आत्मा को तो शांति मिलती है, पितृ ऋण से भी मुक्ति मिलती है।
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अश्विन कृष्ण प्रतिपदा को नाना-नानी का श्राद्ध, पंचमी को जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध करना चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित प्रदीप तिवारी ने बताया कि जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है तो उसी दौरान पितृ पक्ष पड़ते हैं। सूर्य जब हस्त नक्षत्र को स्पर्श करता है तो उस काल में गया जाकर पितरों का श्राद्ध करना सबसे उत्तम माना गया है।
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ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि सात सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध , आठ को प्रतिपदा का श्राद्ध, नौ को द्वितीया का श्राद्ध, 10 को तृतीया और चतुर्थी का श्राद्ध होगा। 11 को पंचमी, 12 को षष्ठी, 13 को सप्तमी, 14 को अष्टमी, 15 को नवमी पर सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध किया जाएगा। 16 को दशमी, 17 को एकादशी, 18 को द्वादशी/सन्यासियों का श्राद्ध, 19 को त्रयोदशी, 20 को चतुर्दशी, 21 को अमावस्या के श्राद्ध के साथ सर्वपितृ अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध किया जाएगा।
पितृ कर्म के लिए उपयुक्त समय
ज्योतिषाचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि पितृ कर्म के लिए दिन में 11:36 से 12:24 बजे तक कुतुप काल, 12:24 से 1:12 बजे तक रोहिण काल और दोपहर 1:12 बजे से 3:55 बजे तक के समय को उपयुक्त माना गया है।