खुशखबरीः अब कोहरे की वजह से बिलकुल लेट नहीं होंगी ट्रेनें
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सर्दियों में कोहरे की मार से ट्रेनों को बचाने के लिए थर्मल इमेजिंग कैमरे लगाने की योजना है। इनकी मदद से ड्राइवर को डेढ़ किलोमीटर आगे तक का रास्ता साफ नजर आएगा।
फिलहाल उत्तर रेलवे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर दिल्ली-पटना राजधानी एक्सप्रेस में इस कैमरे को इन सर्दियों में लगाएगा। प्रयोग सफल रहने के बाद अन्य ट्रेनों में भी इसका इस्तेमाल होगा।
प्रत्येक वर्ष जाड़े में कोहरा रेलवे के लिए मुसीबत लेकर आता है। बड़ी संख्या में ट्रेनें अपने गंतव्य पर समय से नहीं पहुंच पातीं। ऐसी दिक्कतों से निपटने के लिए अगले तीन महीनों के लिए थर्मल इमेजिंग कैमरे से गाड़ियों को लैस करने का निर्णय किया गया है।
राजधानी और शताब्दी जैसी प्रमुख ट्रेनें भी घने कोहरे में 30 से 40 की स्पीड से चलती हैं। थर्मल इमेजिंग कैमरा युक्त इंजन लग जाने से ये ट्रेनें 80 किलोमीटर प्रतिघंटा तक की स्पीड से चल सकेंगी।
उत्तर रेलवे के एक अधिकारी के मुताबिक इंजन के दोनों ड्राइवरों के लिए अलग-अलग दो कैमरे रहेंगे। इनकी मदद से इंजन में बैठे ड्राइवर को करीब डेढ़ किलोमीटर आगे की हर गतिविधि और सिग्नल की स्थिति की साफ जानकारी हो जाएगी और उसे स्पीड कम नहीं करनी पड़ेगी।
फॉग सेफ डिवाइस के भरोसे चल रही हैं ट्रेनें
उत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल में कोहरे से निपटने के लिए फिलहाल फॉग सेफ डिवाइस का इस्तेमाल हो रहा है। यह पोर्टेबल डिवाइस ड्राइवर के साथ रहती है। लखनऊ मंडल की 198 गाड़ियों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे लगभग 400 मीटर पहले सिग्नल पोस्ट की जानकारी मिल जाती है।
पहले एंटी फॉग एंड कोलिजन डिवाइस के प्रयोग की बात तय हुई थी, जिससे भीषण कोहरे के दौरान भी ट्रेन ड्राइवर के लिए 400 मीटर तक ट्रैक जांचना संभव होता है। इसमें यह व्यवस्था भी थी कि अवरोध की स्थिति में ट्रेन में ऑटोमेटिक ब्रेक लग जाते हैं।
यह डिवाइस ड्राइवर को यह भी बताती है कि सिग्नल कितनी दूर है। इसके मुताबिक वह ट्रेन की रफ्तार तय कर सकता है। इससे कोहरे में ट्रेनों को अनावश्यक तौर पर धीमा रखने से बचने में मदद मिलती है। इसके अलावा अन्य सावधानियों पर भी पूरा ध्यान दिया जा सकता है।
रेलवे सूत्रों के मुताबिक परीक्षण में करोड़ों खर्च के अलावा सिग्नल सिस्टम में समन्वय न बन पाने के कारण ये उपकरण ट्रेनों में उपयोग नहीं हो पा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस उपकरण को कम खर्च में तैयार करने का प्रयोग किया जा रहा है। ट्रेनों में इस डिवाइस का परीक्षण किया गया था, लेकिन इसकी लागत करोड़ों में होने के चलते रेलवे बोर्ड ने प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिया।