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UP Legislative Assembly : 113 साल बाद यूपी विधान परिषद में ‘शून्य’ होगी कांग्रेस, 1909 में मोती लाल नेहरू पहुंचे थे सदन
Wed, 18 May 2022 04:33 AM IST
ishwar ashish
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Wed, 18 May 2022 04:33 AM IST
सार
बीते 33 वर्षों में कांग्रेस विधानसभा में सिकुड़ती गई। इस बार हुए विधानसभा चुनाव में तो सदस्य संख्या के लिहाज से अपने सबसे निम्नतम स्थिति में पहुंच गई। उसके मात्र दो विधायक जीते और 2.5 फीसदी से भी कम मत मिले।
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राहुल गांधी और सोनिया गांधी (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
उत्तर प्रदेश के संसदीय इतिहास में 6 जुलाई को कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर में प्रवेश करेगी। 113 साल में पहली बार ऐसा होगा जब विधान परिषद में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व ही नहीं होगा। उसके एकमात्र सदस्य दीपक सिंह का उस दिन कार्यकाल समाप्त होगा। इस तरह से कांग्रेस के प्रमुख नेता रहे मोतीलाल नेहरू से प्रारंभ हुआ यह सिलसिला उनकी पांचवीं पीढ़ी के समय में खत्म हो रहा है।
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उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की स्थापना 5 जनवरी 1887 को हुई थी। तब इसके 9 सदस्य हुआ करते थे। 1909 में बनाए गए प्रावधानों के तहत सदस्य संख्या बढ़ाकर 46 कर दी गई, जिनमें गैर सरकारी सदस्यों की संख्या 26 रखी गई। इन सदस्यों में से 20 निर्वाचित और 6 मनोनीत होते थे। मोती लाल नेहरू ने 7 फरवरी 1909 को विधान परिषद की सदस्यता ली। उन्हें विधान परिषद में कांग्रेस का पहला सदस्य माना जाता है। हालांकि, 1920 में कांग्रेस की सरकार के साथ असहयोग की नीति के तहत उन्होंने सदस्यता त्याग दी थी। तब यूपी को संयुक्त प्रांत के नाम से जाना जाता था।
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आजादी के बाद 1989 तक विधान परिषद में नेता सदन कांग्रेस का ही रहा। इस अवधि में सिर्फ 1977 और 1979 ही अपवाद रहा, क्योंकि तब यह पद जनता पार्टी के पास था। विगत 33 वर्षों में कांग्रेस विधानसभा में सिकुड़ती गई। इस बार हुए विधानसभा चुनाव में तो सदस्य संख्या के लिहाज से अपने सबसे निम्नतम स्थिति में पहुंच गई। उसके मात्र दो विधायक जीते और 2.5 फीसदी से भी कम मत मिले। इसका असर विधान परिषद में उसकी सदस्य संख्या पर पड़ना लाजिमी था।
वर्तमान में विधान परिषद में कांग्रेस के एकमात्र सदस्य दीपक सिंह बचे हैं और उनका कार्यकाल 6 जुलाई 2022 को समाप्त हो रहा है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए निकट भविष्य में कांग्रेस के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व की उम्मीद भी किसी को दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है।