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Lucknow News: नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक की साक्षी रही रिफा-ए-आम इमारत अब बदहाल
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नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक की साक्षी रही रिफा-ए-आम इमारत अब बदहाल
अभिषेक सहज
लखनऊ। शहर के गोलागंज इलाके में सिटी रेलवे स्टेशन के करीब एक ऐतिहासिक इमारत ‘रिफा-ए-आम’ जो कभी अवध की बौद्धिक संपदा कही जाती थी, आज अपनी आखिरी सांसें गिन रही है। भारतीय गणतंत्र की गवाह यह 165 साल से ज्यादा पुरानी इमारत आज बदहाल है। शायर मुशीर झंझानवी का एक शेर इस ऐतिहासिक इमारत पर बिल्कुल सटीक बैठता है- कांटा समझ के मुझसे न दामन बचाइए, गुजरी हुई बहार की एक यादगार हूं...।
नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक और आजाद भारत की शान रही इस इमारत का ज्यादातर हिस्सा गिर चुका है। यह इमारत कांग्रेस और मुस्लिम लीग की बैठकों के साथ प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक की भी साक्षी रही है। अवध के रजवाड़ों ने मिलकर इसी इमारत में अंग्रेजों से बदला लेने के लिए रिफा-ए-आम क्लब की स्थापना की थी। यह क्लब अपनी स्थापना के पीछे एक बेहद रोचक कहानी समेटे हुए है।
इतिहासकार रवि भट्ट बताते हैं कि 19वीं सदी की शुरुआत में लखनऊ और आसपास के रजवाड़ों को कैंट के एमबी क्लब और हजरतगंज स्थित रिंक थियेटर समेत अन्य क्लबों में प्रवेश से रोकने के लिए अंग्रेजों ने ‘इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट अलाउड’ का बोर्ड लगा दिया था। इस अपमान से आहत महमूदाबाद एस्टेट और मनकापुर एस्टेट समेत कई राजाओं ने मिलकर रिफा-ए-आम इमारत में क्लब की स्थापना की। यह क्लब न केवल रजवाड़ों की आरामगाह था, बल्कि खेल, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बना। यहां कुछ साल पहले तक बैडमिंटन कोर्ट था। साहित्यकारों की बैठकी हुआ करती थी। रवि भट्ट ने बताया कि इस इमारत को किसने बनवाया, इस पर मतभेद हैं लेकिन यह सच है कि इसका निर्माण नवाब वाजिद अली शाह के लखनऊ से जाने के बाद ही करीब 1860 के आसपास हुआ था। संभवत: इस इमारत को अवध के रजवाड़ों ने मिलकर ही बनवाया होगा।
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यहीं हुई थी प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक
रिफा-ए-आम क्लब का इतिहास भारतीय राष्ट्रवाद से भी गहराई से जुड़ा है। कहा जाता है कि यहीं पर 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच वह ऐतिहासिक लखनऊ समझौता भी हुआ था, जिसने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। इस समझौते में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने अहम भूमिका निभाई थी। कुछ इतिहासकार यहां 1920 में महात्मा गांधी के आने की भी पुष्टि करते हैं। कहा जाता है कि पटेल और नेहरू ने भी 1922 को यहां स्वेदशी आंदोलन तेज करने को लेकर भाषण दिया था। हालांकि मशहूर दास्तानगो हिमांशु बाजपेई का कहना है कि इस इमारत में लखनऊ समझौता नहीं हुआ था, हां यह जरूर है कि प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक 1936 में यहीं पर हुई थी जिसमें मुंशी प्रेमचंद समेत हिंदी-उर्दू के देश के बड़े लेखक शामिल हुए थे। मुंशी प्रेमचंद ने अपने भाषण में यहां कहा था कि हमें हुस्न का मयार बदलना होगा।
ऐतिहासिक धरोहर का खोया वैभव आएगा वापस
इमारत पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है और इसका काफी हिस्सा गिर चुका है। जिला प्रशासन ने इसे अपने कब्जे में ले लिया है और यहां आमजन के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। सुरक्षा के लिए केवल गार्डों की ड्यूटी लगाई गई है। लखनऊ विकास प्राधिकरण ने इसके चारों ओर बाउंड्रीवॉल करवा दी है। एलडीए प्रशासन ने पिछले साल यहां से अवैध कब्जे हटवाए थे और यह आश्वासन भी दिया था कि निकट भविष्य में क्लब का विकास कार्य शुरू किया जाएगा और इसे एक नया स्वरूप प्रदान किया जाएगा जिससे इस ऐतिहासिक धरोहर का खोया गौरव वापस लौट सके। एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने बताया कि इंटेक इस इमारत में सर्वे का काम कर रहा है और इस इमारत को संवारने के लिए प्रोजेक्ट भी तैयार कर रहा है। उम्मीद है जल्द इमारत का सुंदरीकरण होगा।
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लखनऊ। शहर के गोलागंज इलाके में सिटी रेलवे स्टेशन के करीब एक ऐतिहासिक इमारत ‘रिफा-ए-आम’ जो कभी अवध की बौद्धिक संपदा कही जाती थी, आज अपनी आखिरी सांसें गिन रही है। भारतीय गणतंत्र की गवाह यह 165 साल से ज्यादा पुरानी इमारत आज बदहाल है। शायर मुशीर झंझानवी का एक शेर इस ऐतिहासिक इमारत पर बिल्कुल सटीक बैठता है- कांटा समझ के मुझसे न दामन बचाइए, गुजरी हुई बहार की एक यादगार हूं...।
नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक और आजाद भारत की शान रही इस इमारत का ज्यादातर हिस्सा गिर चुका है। यह इमारत कांग्रेस और मुस्लिम लीग की बैठकों के साथ प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक की भी साक्षी रही है। अवध के रजवाड़ों ने मिलकर इसी इमारत में अंग्रेजों से बदला लेने के लिए रिफा-ए-आम क्लब की स्थापना की थी। यह क्लब अपनी स्थापना के पीछे एक बेहद रोचक कहानी समेटे हुए है।
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इतिहासकार रवि भट्ट बताते हैं कि 19वीं सदी की शुरुआत में लखनऊ और आसपास के रजवाड़ों को कैंट के एमबी क्लब और हजरतगंज स्थित रिंक थियेटर समेत अन्य क्लबों में प्रवेश से रोकने के लिए अंग्रेजों ने ‘इंडियंस एंड डॉग्स आर नॉट अलाउड’ का बोर्ड लगा दिया था। इस अपमान से आहत महमूदाबाद एस्टेट और मनकापुर एस्टेट समेत कई राजाओं ने मिलकर रिफा-ए-आम इमारत में क्लब की स्थापना की। यह क्लब न केवल रजवाड़ों की आरामगाह था, बल्कि खेल, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बना। यहां कुछ साल पहले तक बैडमिंटन कोर्ट था। साहित्यकारों की बैठकी हुआ करती थी। रवि भट्ट ने बताया कि इस इमारत को किसने बनवाया, इस पर मतभेद हैं लेकिन यह सच है कि इसका निर्माण नवाब वाजिद अली शाह के लखनऊ से जाने के बाद ही करीब 1860 के आसपास हुआ था। संभवत: इस इमारत को अवध के रजवाड़ों ने मिलकर ही बनवाया होगा।
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यहीं हुई थी प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक
रिफा-ए-आम क्लब का इतिहास भारतीय राष्ट्रवाद से भी गहराई से जुड़ा है। कहा जाता है कि यहीं पर 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच वह ऐतिहासिक लखनऊ समझौता भी हुआ था, जिसने स्वतंत्रता संग्राम की दिशा को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। इस समझौते में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने अहम भूमिका निभाई थी। कुछ इतिहासकार यहां 1920 में महात्मा गांधी के आने की भी पुष्टि करते हैं। कहा जाता है कि पटेल और नेहरू ने भी 1922 को यहां स्वेदशी आंदोलन तेज करने को लेकर भाषण दिया था। हालांकि मशहूर दास्तानगो हिमांशु बाजपेई का कहना है कि इस इमारत में लखनऊ समझौता नहीं हुआ था, हां यह जरूर है कि प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक 1936 में यहीं पर हुई थी जिसमें मुंशी प्रेमचंद समेत हिंदी-उर्दू के देश के बड़े लेखक शामिल हुए थे। मुंशी प्रेमचंद ने अपने भाषण में यहां कहा था कि हमें हुस्न का मयार बदलना होगा।
ऐतिहासिक धरोहर का खोया वैभव आएगा वापस
इमारत पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है और इसका काफी हिस्सा गिर चुका है। जिला प्रशासन ने इसे अपने कब्जे में ले लिया है और यहां आमजन के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। सुरक्षा के लिए केवल गार्डों की ड्यूटी लगाई गई है। लखनऊ विकास प्राधिकरण ने इसके चारों ओर बाउंड्रीवॉल करवा दी है। एलडीए प्रशासन ने पिछले साल यहां से अवैध कब्जे हटवाए थे और यह आश्वासन भी दिया था कि निकट भविष्य में क्लब का विकास कार्य शुरू किया जाएगा और इसे एक नया स्वरूप प्रदान किया जाएगा जिससे इस ऐतिहासिक धरोहर का खोया गौरव वापस लौट सके। एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने बताया कि इंटेक इस इमारत में सर्वे का काम कर रहा है और इस इमारत को संवारने के लिए प्रोजेक्ट भी तैयार कर रहा है। उम्मीद है जल्द इमारत का सुंदरीकरण होगा।

नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक की साक्षी रही रिफा-ए-आम इमारत अब बदहाल

नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक की साक्षी रही रिफा-ए-आम इमारत अब बदहाल

नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक की साक्षी रही रिफा-ए-आम इमारत अब बदहाल

नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक की साक्षी रही रिफा-ए-आम इमारत अब बदहाल

नवाबी दौर से स्वतंत्रता संग्राम तक की साक्षी रही रिफा-ए-आम इमारत अब बदहाल