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फेफड़े से ज्यादा खतरनाक है दिमाग की टीबी
मनीष कुमार सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 15 Apr 2014 08:47 AM IST
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टीबी शरीर के किसी हिस्से में हो सकता है। लोग फेफड़े की टीबी से भय खाते हैं जबकि टीबी शरीर के किसी हिस्से में हो सकती है।
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शरीर के दूसरे अंग में टीबी की शिकायत होने पर पीड़ित अपंग हो सकता है और समय पर सही इलाज न मिलने के चलते उसकी जान भी जा सकती है।
इसके अलावा जो मरीज प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं उनकी सटीक जानकारी न मिल पाने से भी टीबी जैसे संक्रमित रोग को रोक पाना चुनौती बन गई है।
ये जानकारी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के महाप्रबंधक डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने केजीएमयू के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग की ओर से ‘यूपी स्टेट टास्क फोर्स’ की बैठक में दी।
उन्होंने कहा कि फेफड़े की टीबी से कहीं अधिक खतरनाक मस्तिष्क, हड्डी, पेट, आंख और दांत की टीबी है। ऐसी टीबी की शिकायत के बाद मरीज के अपंग होने की आशंका बढ़ जाती है।
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मौजूदा समय में प्रदेश के तीस मेडिकल कॉलेजों में टीबी के 18 से बीस फीसदी मरीजों का इलाज हो रहा है। सटीक डायग्नोस, सही दवा और निर्धारित समय पर इलाज न मिलने से टीबी के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं।
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इस अवसर पर स्टेट टीबी ऑफिसर डॉ. आलोक रंजन ने कहा कि पूरी जनसंख्या के चालीस फीसदी लोगों को संक्रमण की शिकायत है।
इस दौरान अगर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है तो सक्रिय जीवाणु पीड़ित की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाते हैं।
मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) के 1741 मरीज हैं जिनका इलाज बहुत मुश्किल है।
कोशिश की जाती है कि एमडीआर के मरीजों को रोका जा सके, लेकिन लापरवाही और अज्ञानता के अभाव में इलाज के बीच में दवा छोड़ने से ऐसे मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं जो चुनौती बन गए हैं।