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नखलऊवा पंच : एक राज जिसके चलते कहानीकार मनोहर श्याम जोशी को करनी पड़ी मास्टरी
Fri, 31 May 2019 06:04 PM IST
Amulya Rastogi
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Fri, 31 May 2019 06:04 PM IST
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मनोहर श्याम जोशी
- फोटो : अमर उजला
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वरिष्ठ पत्रकार और कहानीकार मनोहर श्याम जोशी बनना तो वैज्ञानिक चाहते थे, लेकिन सफल साहित्यकार बनने से पहले ही दिल और दिमाग में सामाजिक क्रांति करने के पैदा हुए जज्बे ने उनके कदम कम्युनिस्ट बनकर प्रगतिशील शख्स बनने की तरफ बढ़ा दिए। पर, इस बार भी वह मंजिल तक पहुंचने से पहले ही प्रेम की गलियों में विचरण करने लगे। नतीजा, बीएससी में द्वितीय श्रेणी ही आई। घर वालों ने रिजल्ट देखा तो घोषणा कर दी कि टेलीफोन विभाग में नौकरी के लिए अर्जी दे दो।
वहां बीएससी पास लड़कों को ट्रेनिंग देकर जूनियर इंजीनियर बनाया जा रहा है। पर, कामरेड बनने का संकल्प ले चुके जोशी जी ने एलान किया कि वह नौकरी नहीं करेंगे बल्कि लखनऊ जाकर आगे की पढ़ाई करेंगे। ‘लखनऊ मेरा लखनऊ’ में एक संस्मरण है, ‘जोशी व्याकुल। उन्हें लगा कि प्रेम कहानी अटक जाएगी। पर, घर से थोड़ी आर्थिक सहायता मिले बिना उनके लिए लखनऊ जाना संभव भी नहीं था। लिहाजा उन्होंने तय किया कि लखनऊ भागने से पहले अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं।
तभी उन्हें पता चला कि मुक्तेश्वर में आठवीं तक के एक स्कूल को हाईस्कूल बनाया जा रहा है, जिसमें प्रबंधकों को गणित और विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापक की जरूरत है। जोशी ने फौरन आवेदन भेज दिया। साथ ही घर वालों के बीच परिवार के आज्ञाकारी बालक की तरह घोषणा की, ‘अब मैंने फैसला किया है कि पूर्वजों की राह पर चलते हुए अध्यापन कार्य ही करूंगा।
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अध्यापन करते हुए अंग्रेजी से एमए भी कर लूंगा।’ घर वालों को खुशी हुई पर, जोशी जी तो इसलिए खुश थे कि स्कूल मास्टरी करते हुए उन्हें लखनऊ वाली सुंदरी को पत्र लिखने की आजादी जो रहेगी।
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वहां बीएससी पास लड़कों को ट्रेनिंग देकर जूनियर इंजीनियर बनाया जा रहा है। पर, कामरेड बनने का संकल्प ले चुके जोशी जी ने एलान किया कि वह नौकरी नहीं करेंगे बल्कि लखनऊ जाकर आगे की पढ़ाई करेंगे। ‘लखनऊ मेरा लखनऊ’ में एक संस्मरण है, ‘जोशी व्याकुल। उन्हें लगा कि प्रेम कहानी अटक जाएगी। पर, घर से थोड़ी आर्थिक सहायता मिले बिना उनके लिए लखनऊ जाना संभव भी नहीं था। लिहाजा उन्होंने तय किया कि लखनऊ भागने से पहले अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं।
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तभी उन्हें पता चला कि मुक्तेश्वर में आठवीं तक के एक स्कूल को हाईस्कूल बनाया जा रहा है, जिसमें प्रबंधकों को गणित और विज्ञान पढ़ाने वाले अध्यापक की जरूरत है। जोशी ने फौरन आवेदन भेज दिया। साथ ही घर वालों के बीच परिवार के आज्ञाकारी बालक की तरह घोषणा की, ‘अब मैंने फैसला किया है कि पूर्वजों की राह पर चलते हुए अध्यापन कार्य ही करूंगा।
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अध्यापन करते हुए अंग्रेजी से एमए भी कर लूंगा।’ घर वालों को खुशी हुई पर, जोशी जी तो इसलिए खुश थे कि स्कूल मास्टरी करते हुए उन्हें लखनऊ वाली सुंदरी को पत्र लिखने की आजादी जो रहेगी।