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UP: ट्रेंड सेटर बनीं लखनऊ की काजल, गोरखपुर की मंसा और सहेलियां; खुद का जीवन बदला...अब गांव में बदलाव का प्रयास
Sun, 30 Mar 2025 12:36 PM IST
भूपेन्द्र सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: भूपेन्द्र सिंह
Updated Sun, 30 Mar 2025 12:36 PM IST
सार
काजल बताती हैं कि वह सात बहनें हैं। गांव के लोग मेरे पिता से अक्सर बेटियों की दी आजादी पर सवाल करते हैं। लेकिन, मेरे पिता उनको कहते हैं कि मेरी बेटियां आगे बढ़ेंगी। 2023 में हमारे गांव में ब्रेक थ्रू कार्यक्रम शुरू हुआ। इसे जॉइन करने के लिए मेरे परिवार ने मेरा साथ दिया। उम्मीद है कि हमें देखकर बहुत कुछ बदलेगा।
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लखनऊ की काजल व गोरखपुर की मंसा और उनकी सहेलियों की कहानी।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
संकल्प से ही सिद्धि संभव है। उत्तर प्रदेश की बेटियां यह साबित करके भी दिखा रही हैं। हमारी बेटियां लगातार बदलाव की कोशिशों में जुटी हैं। छोटे-छोटे सहयोग और प्रोत्साहन से उनके हौसलों को पंख मिल रहे हैं। इससे वे उड़ान भर रही हैं।
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आज की इस कड़ी में कहानी है लखनऊ की काजल, गोरखपुर की मंसा, मनीषा, संजना और अनुराधा की। ब्रेक थ्रू संस्था से इन्हें सहयोग मिला। सहयोग ने उन्हें साहस दिया, एक नई राह दिखाई। उस पर वे चल पड़ीं और आगे बढ़ रही हैं। आइए जानते हैं बदलाव की कहानी... उन्हीं की जुबानी।
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पहले परिवार... फिर गांव के लोगों को दिखाई राह
काजल एयरपोर्ट पर फूड चेन आउलटेड चलाती हैं। उनका यहां तक का सफर आसान नहीं था। उनके माता-पिता, अन्य दो बेटियों की तरह ही काजल की शादी करने का विचार बना चुके थे। लेकिन, काजल के मन में तो कुछ और ही चल रहा था। वह बताती हैं कि अगर मेरे गांव में जीवन बदलने वाला ब्रेक थ्रू कार्यक्रम शुरू नहीं हुआ होता, तो मेरी भी शादी हो गई होती।ज्योति दीदी (ब्रेक थ्रू कम्युनिटी डेवलपर) की बैठकों, सत्रों और मेरे घर आने-जाने से मेरे पूरे परिवार के विचार बदल गए। जब मैंने काम शुरू किया तो मेरे पिता मुझे जॉइनिंग के लिए एयरपोर्ट छोड़ने आए। उस दिन वे बहुत रोमांचित थे। काजल बताती हैं कि कुढ़ा गांव के अनुसूचित जाति के टोले के ज़्यादातर अभिभावकों की मानसिकता अब बदल चुकी है। मेरे पिता कहते हैं कि जागरुकता नहीं थी, इसलिए मेरी दो बहनों की शादी जल्दी कर दी। मेरी एक बहन नर्सिंग की ट्रेनिंग ले रही है।
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पहले तो लोगों को नहीं हुआ यकीन, लेकिन आज हम हैं किसान बेटियां
किसान शब्द सुनते ही अक्सर लोगों के दिमाग में एक पुरुष की तस्वीर उभरती है। अब यह सोच बदल चुकी है। अब महिलाएं भी खेती में ना सिर्फ सहयोग कर रही हैं, बल्कि उड़ान भर रही हैं। मनसा, मनीषा, संजना और अनुराधा गोरखपुर की बेटियां इसका उदाहरण हैं। मनसा बताती हैं कि यह सब तब शुरू हुआ, जब ब्रेक थ्रू कार्यक्रम उनके गांव में शुरू हुआ। टीम ने हमें राह दिखाई और हमारे अंदर वो आत्मविश्वास भरा कि हम सभी अपने परिवार की मदद के लिए खेतों में काम कर सकते हैं।मनसा बताती हैं कि बिंदु और सिंधु (दो बहनें) ने सबसे पहले अपने पिता को इस काम के लिए ज़मीन का एक टुकड़ा देने के लिए राजी किया। यह आसान नहीं था। लेकिन, बिंदु ने दृढ़ता दिखाई। उसके पिता ने थोड़ी अनिच्छा से सहमति जताई। फिर बिंदु ने अपनी चार सहेलियों और उनके माता-पिता को मनाया।
दूसरे लोगों के खेत भी पट्टे पर लेना शुरू कर दिया
इस तरह बिंदु और उसकी सहेलियों ने सामूहिक खेती शुरू की। उनकी सहेलियां मनीषा, संजना और अनुराधा भी उनके साथ जुड़ गईं। बिंदु के पिता द्वारा दी गई ज़मीन के एक टुकड़े पर लड़कियों ने सब्जियां उगाना शुरू कर दिया। खेती के सभी काम उन्होंने खुद संभालना शुरू कर दिया। अपने मुनाफे से लड़कियों ने सब्ज़ियां उगाने के लिए दूसरे लोगों के खेत भी पट्टे पर लेना शुरू कर दिया।वे अपनी सब्जियां स्थानीय ग्राहकों को बेचती थे। इनमें आसपास के स्कूलों में, उनके पूर्व शिक्षक और सब्जियां बेचने वाले स्थानीय लोग शामिल थे। बाद में बिंदु और सिंधु की शादी हो गई। वे गांव से बाहर चली गईं। लेकिन, बाकी लड़कियां खेत पट्टे पर लेकर खेती करती रहीं। लड़कियां खुशी-खुशी बताती हैं कि अब हम अपनी फीस खुद भरते हैं। कपड़े खरीदते हैं। अपने दोस्तों को उपहार देते हैं। अब हम किसी पर निर्भर नहीं हैं।