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Doctor's Day: कोरोना को हराने के लिए इन डॉक्टरों ने दफन कर दिए अपने दर्द, दे रहे ऐसी कुर्बानियां

Wed, 01 Jul 2020 04:49 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 01 Jul 2020 04:49 PM IST
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Story of doctors who are working to defeat Corona Virus.
कोरोना वॉर्ड में टीम के सदस्य डॉ. जसमीत सिंह व डॉ. फरमान के साथ ड्यूटी करते डॉ. डी हिमाशु (बीच में)) - फोटो : amar ujala

जिंदगी भी एक जंग ही है। हर कोई अपने-अपने हिस्से की जंग लड़ता है। कोई बहादुरी से। कोई उत्साह से। तो कई ऐसे भी हैं जो जिंदगी से शिकवा करते हैं। किस्मत को कोसते हैं पर ये जिंदगी कितनी अनमोल है जानिए उनसे जो जिंदगी बचाने की जंग लड़ते हैं। कोरोना की जंग भी बड़ी मुस्तैदी से लड़ रहे हैं। जानिए उन्हीं के शब्दों में कि इस जंग में उन्हें क्या कुर्बानियां देनी पड़ रही हैं। पेश है चंद्रभान यादव व हिमांशु अवस्थी की खास रिपोर्ट:

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तीन दिन तक नींद नहीं आई... फिर भी बना रहा हौसला
डॉ. डी हिमांशु, संक्रामक रोग नियंत्रण यूनिट प्रभारी, केजीएमयू
11 मार्च को कनाडा से लौटीं महिला डॉक्टर कोरोना पॉजिटिव पाई गईं। यह वो वक्त था जब ज्यादातर चिकित्सा संस्थान कोरोना के मरीजों को भर्ती करने की तैयारी ही कर रहे थे। वह केजीएमयू में भर्ती की गईं।  इलाज में लगी पहली टीम की जिम्मेदारी यूनिट के प्रभारी के रूप में मैंने संभाली। शुरुआती दौर में सभी व्यवस्थाएं मुकम्मल करनी थी। तीन दिन तक टीम के साथ हम रात-दिन जुटे रहे। चौथे दिन शरीर पूरी तरह से जवाब देने लगा, लेकिन मन में इतनी हलचल थी कि नींद नहीं आती थी। सोने का प्रयास करता। पर, एक घंटे की नींद के बाद फिर से आंख खुल जाती। ऐसे में फिर वार्ड में पहुंच जाता। पर, धीरे- धीरे टीम बढ़ती गई और सभी चीजें पटरी पर आती चली गईं।
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हमारे लिए था चुनौतियों भरा दौर...
यकीनन यह वक्त हमारे लिए चुनौतियों से भरा दौर था। चुनौती इसलिए भी थी कि पूरी टीम को भी संक्रमण से बचाना था। क्योंकि किसी एक के चपेट में आने से अन्य सदस्यों का हौसला टूटने का खतरा था। पर, टीम का एक सदस्य संक्रमण की चपेट में आ गया। ऐसे में पूरी टीम को क्वारंटीन करना पड़ा। पर, सबका हौसला बुलंद रहा। क्वारंटीन का वक्त पूरा होने के बाद वह फिर से ड्यूटी पर डटे हैं।
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अब भी बमुश्किल चार घंटे ही सो पाते हैं
विभाग के दूसरे सदस्यों का सहयोग मिला और अब हालात पूरी तरह से कंट्रोल में है। फिर भी इन दिनों बमुश्किल चार घंटे की ही नींद ले पाता हूं। क्योंकि निरंतर गाइडलाइन बदल रही है। ट्रायल चल रहे हैं। पूरे प्रदेश से गंभीर मरीज आ रहे हैं। इन सभी जिम्मेदारियों के साथ ही वार्ड में लगी टीम को फोन कॉल, व्हाट्सएप के जरिए लगातार मोटिवेट करते रहना पड़ता है। डॉ. डी हिमांशु कहते हैं कि संक्रमण नियंत्रण यूनिट संभालने के बाद यह पहला मौका मिला है कि अपनी जानकारी के जरिए दूसरों को फायदा पहुंचा सकें।

बच्चे को पिताजी के पास छोड़ा...
नोडल प्रभारी होने के साथ ही मैंने आइसोलेशन वार्ड की पहली टीम का भी नेतृत्व किया। उस वक्त कोरोना को लेकर हर परिवार में भय था। ऐसे में मैंने बच्चे को पिताजी के पास छोड़ा। घर जाने के बजाय अस्पताल में ही रहे। पत्नी डॉक्टर हैं और वे लगातार प्रोत्साहित करती रहीं। परिवार तनाव में था, लेकिन मैंने खुद को समझाया कि मेरे साथ तमाम डॉक्टर मरीजों के  इलाज में लगे हैं। ऐसे में खुद को आगे रखना मेरी पहली जिम्मेदारी है।

अब तो सौ बच्चों के पिता की निभानी पड़ रही है जिम्मेदारी

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डॉ. पी के दास। - फोटो : amar ujala

हमारे अस्पताल में 100 बेड पर मरीज भर्ती हैं। इनमें दो माह और छह माह के बच्चे भी हैं। कभी मां भर्ती हो रही है तो कभी पिता...। ये हालात विचलित करते हैं। जिस तरह से पिता अपने बच्चों का ख्याल रखता है, उसी तरह नोडल प्रभारी होने के नाते सभी मरीजों की देखरेख करना मेरी जिम्मेदारी है। ऐसे में एक, दो नहीं बल्कि सौ बच्चों के पिता की भूमिका निभानी पड़ती है।

मां दूर से ही आशीर्वाद देती है...मन तड़प उठता है कि पास होकर कितने दूर हो गए हम
घर में अलग कमरे में रहता हूं। इस कमरे में बुजुर्ग माता-पिता को भी आने से मना कर रखा है। घर पहुंचता हूं तो अपने कमरे से ही मां आवाज देती हैं। सब बढ़िया है...ये कहकर सोने की कोशिश करता हूं, लेकिन जिम्मेदारी इतनी है कि नींद नहीं आती। सुबह निकलता हूं तो मां दूर से ही आशीर्वाद देती हैं।

कहती हैं, हम लोगों की चिंता किए बगैर डटे रहो। घर में रहकर भी कितने दूर हो गए हैं हम। कई बार जब वह आशीर्वाद देती है तो ये सोच कर मन तड़प उठता है। पर, आंखों को नम नहीं होने देते। क्योंकि हमें पता है कि सेनापति का हौसला टूटने का मतलब क्या होता है। हौसला टूटा नहीं कि हार निश्चित है। इसलिए अपनी टीम को इरादों से मजबूत बनाए रखने के लिए हर दर्द को सीने में दफन करता रहता हूं।

एक डर तो बना रहता है...पर माता-पिता की सीख देती है हौसला
हमारा फोन 24 घंटे ऑन रहता है। वक्त-बेवक्त हमारे लिए कुछ नहीं। पत्नी हाउस वाइफ हैं। दोनों बच्चे छोटे हैं। माता-पिता बुजुर्ग हो गए हैं। ऐसे में खुद को लेकर भी एक डर बना रहता है कि कहीं कुछ हो गया तो पूरा परिवार बिखर जाएगा। कई तरह की शंकाएं मन में आती हैं, लेकिन कर्तव्यमार्ग पर डटे रहने की माता-पिता की सीख हौसला बढ़ाती रहती है।

मशीन सी नजर आती है जिंदगी, बमुश्किल चार घंटे की नींद ही मिल पाती है

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कोरोना से जंग जीतने वाले मरीज का स्वागत करते एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. आरके धीमान व संस्थान के अन्य चिकित्सक। - फोटो : amar ujala

एसजीपीजीआई को राजधानी कोविड अस्पताल बनाने की घोषणा होने से लेकर अब तक 24 घंटे में बमुश्किल चार घंटे की नींद ही मिल पाती है। ऐसा लगता है जैसे जिंदगी मशीन से भी तेज हो गई है। पूरी दिनचर्या बदल गई है।  शरीर में दर्द बना रहता है। फिर भी हम निरंतर काम कर रहे हैं।

अब तो घर आने पर भी 100-100 कॉल हो जाती हैं
ऑफिस से घर आने पर भी मोबाइल पर कॉल आती रहती हैं। पहले जहां प्रतिदिन 24 घंटे में 10 कॉल रिसीव करते थे, अब 100-100 कॉल हो जाती हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, बायो मेडिकल वेस्ट, किचन, ट्रांसपोर्टेशन सहित सभी बातों पर गौर करना होता है। टीम को निर्देश देना ही काफी नहीं होता। काम पूरा हुआ या नहीं, इस सब पर लगातार फोकस करना होता है। मुख्यमंत्री सहित शासन के अधिकारियों, पीजीआई के निदेशक सहित अन्य को पूरी जानकारी देनी होती है।

घर सिर्फ सोने के लिए जाते हैं...सो भी नहीं पाते...बच्चों को भी नहीं दे पाते समय
हर साल गर्मी के दिनों में अवकाश पर चले जाते थे। इस बार कोई अवकाश नहीं। घर में सिर्फ सोने के लिए जाते हैं। उस दौरान भी मोबाइल बजता रहता है। पूरा परिवार डिस्टर्ब न हो, इसलिए अलग कमरे में रहते हैं। पत्नी डॉक्टर हैं। वह भी व्यस्त रहती हैं। ऐसे में दोनों बच्चों की देखभाल नहीं हो पाती है। उनके लिए हम दोनों वक्त नहीं निकाल पाते हैं। लेकिन यह समझा दिया है कि कोरोना काल में जिस तरह से आप दोनों मेरी जिम्मेदारी हो, उसी तरह से यहां आने वाले हर मरीज की जान बचाना भी जिम्मेदारी है।

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