मोदी की शिक्षानीति में 'की प्लेयर' होंगे राज्य, मांगा जवाब
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देश की बनने वाली नई शिक्षा नीति में राज्यों की अहम भूमिका होगी। राज्यों के शिक्षाविदों व सरकारों के सुझावों को भी इसमें शामिल किया जाएगा। नई शिक्षा नीति कैसी होनी चाहिए और इसका बच्चों व छात्रों को कैसे फायदा मिलेगा इसके लिए शिक्षाविदों के सुझाव मांगे गए हैं।
प्रदेश स्तर पर इसके लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी। इसमें आने वाले सुझावों और विचारों को केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) ने नई शिक्षा नीति के लिए सुझावों का एक प्रारूप जारी किया है। इसमें कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया है।
नई शिक्षा नीति को ध्यान में रखकर पूछा गया है कि कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा को अनिवार्य रूप से मान्यता दी गई है। प्रारंभिक शिक्षा का लक्ष्य बच्चों को पढ़ने-लिखने और ज्ञानवर्धक जानकारियां देने की है। स्कूलों में इन आठ वर्षों में छात्रों ने कितनी जानकारियां प्राप्त की।
उनका ज्ञानात्मक विकास, तर्क, बुद्धि और सामाजिक कौशल के साथ-साथ कार्य स्थल में वह कितने निपुण हो रहे हैं। मौजूदा शिक्षा नीति प्रारंभिक शिक्षा के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। बच्चों को माध्यमिक शिक्षा के लिए तैयार करने में दी जाने वाली प्रारंभिक शिक्षा कितनी कारगर साबित हो रही है।
सरकारी योजनाओं का मिलता है कितना लाभ
शिक्षा के अधिकार के अनुसार स्कूलों में दाखिला पाने वाले बच्चों को फेल नहीं किया जा सकता और उन्हें पास करके आगे की कक्षा में भेज दिया जाता है। यह नीति बच्चों को शिक्षित करने में कितना कारगर साबित हो रही है।
नई शिक्षा नीति तैयार करने से पहले केंद्र सरकार के सहयोग से चल रही योजनाओं की जरूरतों के बारे में भी पूछा गया है। मध्याह्न भोजन योजना से स्कूलों में दाखिले के साथ ठहराव और स्वास्थ्य स्तर को सुधारने में कितनी सहायता मिल रही है। इस योजना में सुधार के लिए और क्या किया जा सकता है।
स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधारने के लिए आम लोगों की सहभागिता कितनी जरूरी है। आरटीई के मुताबिक सभी स्कूलों में विद्यालय प्रबंधन समिति कितनी महत्वपूर्ण है तथा इसे बेहतर बनाने के लिए और क्या किया जा सकता है।
माध्यमिक शिक्षा की अनिवार्यता पर भी मांगा सुझाव
नई शिक्षा नीति में यह भी सुझाव मांगा गया है कि कक्षा 8 तक के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया गया है। मांगे गए सुझाव में कहा गया है कि देश में माध्यमिक और उच्च शिक्षा की मांग बढ़ रही है। इसलिए 15 से 18 वर्ष की आयु तक के बच्चों की शिक्षा को अनिवार्य करना कितना जरूरी है।
इन मुद्दों पर भी ली जा रही है सलाह
मौजूदा समय कक्षा 10 तक सामान्य शिक्षा दी जा रही है, क्या इन कक्षाओं तक विशेषज्ञता या विषय चयन पर आधारित शिक्षा की सुविधा दी जानी चाहिए। दसवीं से बारहवीं तक के छात्र-छात्राओं का सौ फीसदी स्कूलों में दाखिला और स्कूलों में ठहराव के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
इंटर कॉलेजों में किशोरवय शिक्षा कितनी जरूरी
शिक्षाविदों से पूछा गया है कि इंटर कॉलेजों में किशोरवय शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा देना कितना जरूरी है। देश के सभी राज्यों में एक समान पाठ्यक्रम कितना जरूरी है? यदि है तो इसका कितना फायदा छात्रों को मिलेगा? स्कूली शिक्षा और डिग्री शिक्षा में कोई संबंध है?
यदि नहीं तो इन संबंधों की स्थापना तथा इसे बेहतर करने के लिए क्या किया जा सकता है? इसके साथ ही यह भी सुझाव मांगा गया है कि स्कूली शिक्षा में व्यावसायिक शिक्षा का कितना महत्व है? अगर इसे अनिवार्य किया जाता है तो छात्र-छात्राओं को कितना फायदा मिलेगा।