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...जग को अपना कुछ दिए चले। भगवती चरण वर्मा की जयंती पर विशेष
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लखनऊ। किस ओर चले? मत ये पूछो, बस, चलना है इसलिए चले। जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले। मधुकाव्य धारा के एक प्रमुख आधार स्तंभ भगवती चरण वर्मा की लिखी इन पंक्तियों के साथ आइए नमन करते हैं हम उन्हें, उनकी जयंती पर। हमारे साहित्यिक खजाने की अनमोल धरोहर भगवती बाबू के बारे में न जाने कितने वर्षों से कितना कुछ लिखा जा रहा है, पर उनकी साहित्य साधना, उनकी साहित्यिक विरासत के आगे सब अति सूक्ष्म है। अभी तो कई पीढ़ियों को बहुत लंबा सफर तय करना होगा उन्हें जानने के लिए, समझने के लिए। वे खुशनसीब हैं, जो उनके करीबी है, जो उनके अपने हैं, उनकी स्मृतियों के खजाने से कुछ अनुभव, कुछ यादें चुराकर हम लाएं हैं अपने पाठकों के लिए।
दीवानगी, मस्ती का अलग ही फलसफा
लखनऊ विवि में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने एक लंबा वक्त उनके साथ बिताया है। वे कहते हैं कि विभागाध्यक्ष रहते मैंने कई बार उन्हें आमंत्रित किया। हम भी उन्हें बाबूजी ही कहा करते थे। वे कवि, कथाकार, नाटककार, पत्रकार और समीक्षक थे। इतनी विधाओं में बहुत कम लोगों को महारत हासिल होती है। अब बात करते हैं छायावाद के परवर्ती काल की, जिसमें मधुमय काव्य की एक अलग ही अंतरधारा चल रही थी। इसकी अगुवाई तो हरिवंश राय बच्चन मधुशाला के माध्यम से कर रहे थे। उनके साथ-साथ सुमित्रानंद पंत, भगवती चरण वर्मा और मैथिलीशरण गुप्त भी शामिल थे। सभी रूबाइयत के अनुवाद अपने-अपने तरीके से कर रहे थे लोग। इसी दौरान वर्मा जी का भी एक मधुमय काव्य प्रकाशित हुआ। उन्होंने लिखा ‘हम दीवानों की क्या हस्ती..., मस्ती का आलम साथ लिए।’ यह मस्ती का आलम उसी मधुकाव्य परंपरा से आया था।
यथार्थ की स्वीकारोक्ति और नियतिवाद से परिचय
प्रोफेसर दीक्षित कहते हैं कि इसी बीच उनकी दृष्टि यथार्थवाद की ओर मुड़ी। गांव की दुर्दशा, किसानों की विवशता और गरीबों की दयनीयता को उन्होंने कविता में चित्रित किया। वे लिखते हैं कि इधर तरफ गांव है, सामने नगर है, जहां पशुता व बर्बरता का नृत्य हो रहा है। दोनों के बीच ये किसान चरमर चरमर चू चररमरर...जा रही चली भैंसा गाड़ी। उन्होंने ग्रामीण व्यवस्था का दयनीय दृश्य उकेरा। कविता में उन्होंने अपनी जीवन गाथा लिखी और कविता में विभिन्न प्रकार की शैलियां अपनाई। कवि रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त तो थे ही, उसी तरह कथाकार और उपन्यासकार के रूप में भी उनका जवाब नहीं था। कहानियों में व्यंग्य के माध्यम से उन्होंने कुरोतियों पर प्रहार किया, नूरानी कुश्ती लड़ने वालों का व्यंग्यात्मक लेखन भी किया।
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चित्रलेखा तो क्लाइमेक्स...19वीं सदी में समझाई नियति की भूमिका
अब रही बात उपन्यास की तो चित्रलेखा लिखकर वे क्लाइमेक्स पर पहुंच गए। यह हर दृष्टि से अनूठी पुस्तक बन गई। कुछ लोगों ने कहा था कि वर्मा जी फ्रांसीसी उपन्यास थाया से प्रभावित थे। पर विषय एक होकर भी दोनों के संदर्भ भिन्न हैं। थाया में दार्शनिकों का पैनल है, जबकि चित्रलेखा में मौर्य साम्राज्य है, चाणक्य जैसा विद्वान है, उसके मंत्री हैं, साथ ही चित्रलेखा व विलासी सामंत बीजगुप्त की जीवनशैली के आधार पर जीवन दर्शन की व्याख्या की गई है। नियति की व्याख्या उन्होंने 19वीं शताब्दी में ही कर दी थी और बताया कि आदमी के जीवन में उसकी क्या भूमिका है।
(जैसा कि रोली खन्ना से बातचीत में साझा किया।)
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दीवानगी, मस्ती का अलग ही फलसफा
लखनऊ विवि में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने एक लंबा वक्त उनके साथ बिताया है। वे कहते हैं कि विभागाध्यक्ष रहते मैंने कई बार उन्हें आमंत्रित किया। हम भी उन्हें बाबूजी ही कहा करते थे। वे कवि, कथाकार, नाटककार, पत्रकार और समीक्षक थे। इतनी विधाओं में बहुत कम लोगों को महारत हासिल होती है। अब बात करते हैं छायावाद के परवर्ती काल की, जिसमें मधुमय काव्य की एक अलग ही अंतरधारा चल रही थी। इसकी अगुवाई तो हरिवंश राय बच्चन मधुशाला के माध्यम से कर रहे थे। उनके साथ-साथ सुमित्रानंद पंत, भगवती चरण वर्मा और मैथिलीशरण गुप्त भी शामिल थे। सभी रूबाइयत के अनुवाद अपने-अपने तरीके से कर रहे थे लोग। इसी दौरान वर्मा जी का भी एक मधुमय काव्य प्रकाशित हुआ। उन्होंने लिखा ‘हम दीवानों की क्या हस्ती..., मस्ती का आलम साथ लिए।’ यह मस्ती का आलम उसी मधुकाव्य परंपरा से आया था।
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यथार्थ की स्वीकारोक्ति और नियतिवाद से परिचय
प्रोफेसर दीक्षित कहते हैं कि इसी बीच उनकी दृष्टि यथार्थवाद की ओर मुड़ी। गांव की दुर्दशा, किसानों की विवशता और गरीबों की दयनीयता को उन्होंने कविता में चित्रित किया। वे लिखते हैं कि इधर तरफ गांव है, सामने नगर है, जहां पशुता व बर्बरता का नृत्य हो रहा है। दोनों के बीच ये किसान चरमर चरमर चू चररमरर...जा रही चली भैंसा गाड़ी। उन्होंने ग्रामीण व्यवस्था का दयनीय दृश्य उकेरा। कविता में उन्होंने अपनी जीवन गाथा लिखी और कविता में विभिन्न प्रकार की शैलियां अपनाई। कवि रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त तो थे ही, उसी तरह कथाकार और उपन्यासकार के रूप में भी उनका जवाब नहीं था। कहानियों में व्यंग्य के माध्यम से उन्होंने कुरोतियों पर प्रहार किया, नूरानी कुश्ती लड़ने वालों का व्यंग्यात्मक लेखन भी किया।
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चित्रलेखा तो क्लाइमेक्स...19वीं सदी में समझाई नियति की भूमिका
अब रही बात उपन्यास की तो चित्रलेखा लिखकर वे क्लाइमेक्स पर पहुंच गए। यह हर दृष्टि से अनूठी पुस्तक बन गई। कुछ लोगों ने कहा था कि वर्मा जी फ्रांसीसी उपन्यास थाया से प्रभावित थे। पर विषय एक होकर भी दोनों के संदर्भ भिन्न हैं। थाया में दार्शनिकों का पैनल है, जबकि चित्रलेखा में मौर्य साम्राज्य है, चाणक्य जैसा विद्वान है, उसके मंत्री हैं, साथ ही चित्रलेखा व विलासी सामंत बीजगुप्त की जीवनशैली के आधार पर जीवन दर्शन की व्याख्या की गई है। नियति की व्याख्या उन्होंने 19वीं शताब्दी में ही कर दी थी और बताया कि आदमी के जीवन में उसकी क्या भूमिका है।
(जैसा कि रोली खन्ना से बातचीत में साझा किया।)