भगवा टोली के लिए आसान नहीं दूसरे सिंघल की तलाश?
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राम मंदिर आंदोलन की जब-जब बात होगी, अशोक सिंहल चर्चा में आएंगे। राम मंदिर और सिंहल एक-दूसरे के पर्याय के रूप में ही याद किए जाएंगे। भगवा टोली के लिए सिंहल जैसे चेहरे की तलाश बहुत मुश्किल है।
पहले महंत अवैद्यनाथ, फिर रामचंद्र परमहंस और अब सिंहल के निधन के साथ ही भगवा टोली ने हिंदुत्व व राम मंदिर मुद्दे के उन प्रमुख चेहरों को खो दिया है, जिनमें मुद्दों को आंदोलन में बदल देने की क्षमता थी।
यह बात सही है कि अयोध्या और राम जन्मभूमि 1885 से ही चर्चा में रही है। तब यहां एक ढांचे के भीतर स्थित चबूतरे पर बने अस्थायी मंदिर को पक्का बनाने की इजाजत के लिए महंत रघुबर दास ने सब जज फैजाबाद के यहां अंग्रेजी सरकार के खिलाफ स्वामित्व को लेकर दीवानी मुकदमा दायर किया।
रघुबर दास के बाद गोपाल सिंह विशारद, मंहत रामचंद्र परमहंस, रामानंद संप्रदाय की तरफ से निर्मोही अखाड़े ने मुकदमे दायर करके इस मुद्दे की तरफ लोगों का ध्यान खींचा। लोगों तक यह बात पहुंची कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल को लेकर विवाद है।
जो लोग अयोध्या जाते उन्हें वहां संत-महात्माओं के आश्रमों में यह बताया जाता कि बाबर ने श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर बने मंदिर को तोड़कर यहां मस्जिद बनवा दी थी। यह हिंदू संस्कृति पर हमला है।
संत-महात्मा इसके खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। पर, इस मुद्दे को आंदोलन का स्वरूप मिला अशोक सिंहल के उभार के बाद। इंजीनियरिंग के छात्र और फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक रहे सिंहल प्रो. राजेंद्र सिंह रज्जू भैया के जरिये 1942 में संघ के संपर्क में आए।
भारत छोड़ो आंदोलन में लिया था हिस्सा
उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लिया। गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा तो वे इसके खिलाफ आंदोलन का भी हिस्सा बने। 1950 में वे संघ के प्रचारक बन गए।
पर, उनकी पहचान बनना शुरू हुई 1980 के आसपास धर्मांतरण, गोरक्षा, छुआछूत के खिलाफ आंदोलन के साथ। विहिप से जुड़े पुराने लोगों के मुताबिक उनके प्रयासों से ही 1983 में मुजफ्फरनगर में हिंदू जागरण मंच के बैनर तले हिंदू सम्मेलन में अयोध्या के राममंदिर, मथुरा के कृष्ण और काशी के काशी विश्वनाथ मंदिर पर विदेशियों के हमले को मुद्दा बनाया गया।
यही नहीं इन सबपर सरकारी हस्तक्षेप खत्म कर हिंदुओं को लौटाने की मांग के जरिये हिंदुत्व पर आंदोलन खड़ा करने की रणनीति बनाई गई।
यह सिंहल की ही क्षमता थी कि पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा और कांग्रेस के तत्कालीन बड़े नेताओं में शुमार दाऊदयाल खन्ना इस सम्मेलन में केवल शामिल ही नहीं हुए, इस मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर भी किए।
अपनों पर भी साधा निशाना
वर्ष 1991 में सूबे की तत्कालीन भाजपा सरकार के मुखिया कल्याण सिंह ने जब मंदिर मुक्ति के लिए सरकारी स्तर से कुछ करने में असमर्थता जताई तो सिंहल उन पर सार्वजनिक रूप से बरस पड़े।
उन्होंने छह दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे के स्थल पर नए मंदिर के निर्माण का एलान कर दिया। संघ परिवार से लेकर भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने मामला संभालने की कोशिश की लेकिन सिंहल ने किसी की एक न सुनी और देश भर के लोगों को अयोध्या में जुटा लिया। इसकी परिणति छह दिसंबर को ढांचा विध्वंस के रूप में सामने आई।
कारसेवा के दौरान खून-खराबे को लेकर सिंहल की आलोचना तो हुई, पर शायद इस बात से कोई ही इन्कार करे कि उनके मंदिर मुद्दे को धार देने से उपजे आंदोलन का ही नतीजा था कि देश की राजनीति में कई उलटफेर हुए।
अप्रासंगिक-सी मानी जाने वाली भारतीय जनता पार्टी लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गई तो विपक्षियों के लिए चिंता का सबब। इसकी काट के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह को आनन-फानन में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लानी पड़ी।
राम जन्मभूमि मुद्दे पर आंदोलन खड़ा करने के लिए पहली अप्रैल 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद के नाम पर देश के प्रमुख संतों को एक मंच पर बैठाना।
‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ की स्थापना। फिर इस स्थल का ताला खुलवाने के लिए बिहार के सीतामढ़ी से श्रीराम जानकी रथयात्रा, सरयू तट पर ताला खुलवाने का संकल्प और भी न जाने क्या-क्या।
धीरे-धीरे अयोध्या, मथुरा और काशी देश भर में बहस का हिस्सा बन गए। वे यह तर्क देते- ‘जो लोग हमें राम मंदिर अलग बनवा लेने की सलाह दे रहे हैं, उन्हें जन्मभूमि स्थल और सामान्य मंदिर में अंतर ही नहीं पता है।
राम का मंदिर तो कहीं भी बन सकता है। पर, श्रीराम की जन्मभूमि तो दूसरी जगह नहीं हो सकती। इसलिए रामजन्मभूमि मंदिर भी दूसरे स्थान पर नहीं बन सकता।’
...नहीं मिल पाया विकल्प
खासतौर से 1995 के बाद भाजपा सरकारों के साथ नरम रुख अपनाने के चलते सिंहल अपनों के भी निशाने पर आए।
धीरे-धीरे उनकी सभाओं में भीड़ कम होने लगी। चाहकर भी वे पहले की तरह लोगों को अपने आंदोलनों से जोड़ नहीं पाए। भगवा टोली के रणनीतिकारों ने प्रवीण भाई तोगड़िया सहित कई लोगों को आगे करके सिंहल का विकल्प तैयार करने की कोशिश की।
पर, ‘दूसरा सिंहल’ तैयार नहीं हो पाया। उल्टे हल्के बयानों से पूरी भगवा टोली की किरकिरी अलग हुई।
सिंहल की पहल पर जब 24 मई 1990 को हरिद्वार में 30 अक्तूूबर 1990 से अयोध्या में मंदिर निर्माण की कारसेवा शुरू करने की घोषणा की तो किसी को यह आभास ही नहीं था कि आंदोलन का स्वरूप गोली और लाठी चलने वाला हो जाएगा।
पर, यह शायद उनकी तरफ से ‘राम ज्योति’ को गांव-गांव पहुंचाने के अभियान का ही नतीजा था कि सरकार के तमाम प्रतिबंधों के बावजूद हजारों लोग अयोध्या पहुंच गए। 30 अक्तूबर और 2 नवंबर को अयोध्या में जो कुछ हुआ, जिस तरह बाहर से आए कई कारसेवकों को जान गंवानी पड़ी उसके चलते सिंहल की आलोचना भी खूब हुई।