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कांग्रेस-भाजपा की जड़ें हिलाने की तैयारी में सपा
राजेन्द्र सिंह/लखनऊ
Updated Sat, 07 Sep 2013 01:52 AM IST
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कभी हिंदुस्तान की राजधानी रहे आगरा में समाजवादी पार्टी देश में तीसरे मोर्चे का तानाबाना बुनेगी। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आगरा बैठक में दिल्ली की सियासी मंजिल की रणनीति तय होगी।
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सपा की कोशिश थर्ड फ्रंट के ख्वाब को जिंदा करके क्षेत्रीय दलों को दिल्ली की सत्ता के लिए लामबंद करने की है। यूपी में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद दूसरे राज्यों में गठबंधन करके चुनावी जंग लड़ी जाए या अकेले, इस पर भी सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी मंथन करेगी।
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डॉ. लोहिया एक जमाने में कांग्रेस के मुकाबले सोशलिस्ट मूवमेंट को मजबूत करके दो धु्वीय राजनीति के पक्षधर थे। लेकिन तब के राजनीतिक हालात और मौजूदा दौर में भारी बदलाव आ चुका है।
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देश में कांग्रेस और भाजपा सियासत के दो मुख्य ध्रुव बने हुए हैं। करीब आधे हिंदुस्तान में क्षेत्रीय दलों की ताकत कांग्रेस और भाजपा से ज्यादा है।
सपा की कोशिश है कि भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ तीसरे मोर्चे के गठन की संभावना को न केवल तलाशा जाए बल्कि इसे तराश कर उनकी अगुवाई की ठोस भूमिका तैयार की जाए।
यूं तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव इसके लिए पहले से ही जुटे हैं लेकिन इसके संपूर्ण खाका आगरा में 11-12 सितंबर को होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ही तैयार किया जाएगा।
एकला चलो या गठबंधन: राजनीतिक प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सपा दिग्गज तीसरे मोर्चे के सभावित सहयोगियों को लेकर चर्चा करेंगे। मौजूदा राजनीतिक हालात में किस राज्य में किस दल से दोस्ती की जा सकती है ?
या यूं कहे कि किस राज्य में कौन सा दल कांग्रेस-भाजपा के खिलाफ लामबंदी में शामिल हो सकता है, इस पर देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले समाजवादी नेता अपनी राय रखेंगे मंथन करेंगे।
कर्नाटक में सपा की सक्रियता जगजाहिर है। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि में सपा अपने दम पर मैदान में उतरेगी या कुछ सहयोगियों के साथ चुनावी ताल ठोकेगी, सहयोगी ताकतें कौन सी हो सकती हैं, इसे लेकर भी कार्यकारिणी में विचार किया जाएगा।
राजस्थान में सपा वामपंथी दलों, जनता दल सेकुलर के साथ तीसरा मोर्चा बनाकर विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी में है। उत्तराखंड में सपा का अकेले चुनाव लड़ना लगभग तय है।
बंगाल-आंध्र को लेकर बनेगी रणनीति: दो प्रमुख राज्यों को लेकर सपा को रणनीतिक फैसला करना है। पश्चिमी बंगाल में किससे दोस्ती का हाथ बढ़ाया जाए, ममता बनर्जी या वामपंथियों से। फिलहाल मुलायम सिंह दोनों से ही नजदीकी बनाए हुए हैं।
इसी तरह आंध्र प्रदेश में भी स्थिति थोड़ी उलझी हुई है। मुलायम सिंह से चंद्रबाबू नायडू के नजदीकी रिश्ते हैं तो हाल में जगन रेड्डी से अखिलेश यादव के संबंध बेहतर होने के संकेत मिल रहे हैं। तेलंगाना राज्य के गठन के बाद वहां के जटिल राजनीतिक हालातों पर राष्ट्रीय नेता गौर करेंगे।
मोर्चा चुनाव पूर्व या बाद में: राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चर्चा का एक बिंदु यह भी रहेगा कि सपा जिस तीसरे मोर्चे की अगुवाई करना चाहती है वह चुनाव से पहले शक्ल ले या चुनाव बाद आकार ग्रहण करे।
वामपंथी दल चुनाव पूर्व मोर्चा बनाने केपक्षधर हैं तो कई क्षेत्रीय दल चुनाव बाद गैर कांग्रेस-गैर भाजपा विकल्प के नाम पर एकजुटता के पक्षधर हैं। थर्ड फ्रंट के पिछले प्रयोग विफल होने से सबक लेने पर भी जोर रहेगा।
आगरा से कैसे घटे दिल्ली का फासला: सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया जाएगा।
सपा नेताओं के मुताबिक जिस तरह ताज एक्सप्रेस-वे बन जाने के बाद यमुना के किनारे बसे आगरा और दिल्ली के बीच का फासला सिमट गया है उसी प्रकार समाजवादी पाटी भी ‘दीन ए इलाही’ की भूमि रही ताजनगरी से दिल्ली की सियासी दूसरी कम करने की रणनीति बनाएगी।
सपा निभाएगी अहम भूमिका: चौधरी
सपा के प्रदेश प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री राजेन्द्र चौधरी कहते हैं कि तीसरे मोर्चे की रूपरेखा तैयार करने के साथ ही सपा को देश की राजनीति में अहम भूमिका निभानी है। गैर भाजपा- गैर कांग्रेसी विकल्प की तरफ देश की जनता आशा भरी निगाहों से देख रही है।
कई राज्यों में सपा संगठन का विस्तार हुआ है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का झारखंड में भव्य स्वागत और विशाल सभा हुई। मुलायम सिह यादव आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश का दौरा कर वहां पार्टी को नई गति दे आए हैं।