सपा में यूं ही नहीं है जनता परिवार में विलय पर विरोध!
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
समाजवादी पार्टी के जनता परिवार में विलय का विरोध यूं ही नहीं है। दरअसल सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव समेत कुछ नेताओं को लगता है कि जिन दलों को मिलाकर नई पार्टी बनने जा रही है, उनका यूपी में कोई जनाधार ही नहीं है।
ऐसे में सपा को इससे कोई सियासी लाभ नहीं होगा। उल्टे सपा में इन दलों के नेताओं का अनावश्यक दखल बढ़ जाएगा। सपा के ये नेता मानते हैं कि बिहार में लालू-नीतीश की दोस्ती पर जनता की मुहर लगी तो इसका विस्तार यूपी में किया जा सकता है।
जनता दल परिवार का हिस्सा रहे सपा समेत छह राजनीतिक दल मुलायम सिंह यादव को प्रस्तावित नई पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन चुके हैं। इनमें जनता दल यू, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेकुलर, इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी शामिल हैं।
चर्चा में रहा सपा महासचिव का बयान
रविवार को सपा के महासचिव रामगोपाल यादव ने जनता परिवार के विलय को सपा के लिए आत्मघाती फैसला बताया था। सपा के हलकों में सोमवार को दिन भर उनका बयान चर्चा में रहा। इस पर किसी नेता ने अधिकृत तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की।
हालांकि एक नेता ने इतना जरूर कहा कि यदि इससे नुकसान की संभावना थी तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने प्रस्ताव पारित करके विलय संबंधी फैसला लेने के लिए मुलायम सिंह यादव को अधिकृत क्यों किया था? मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने से पहले इस पर ऐतराज जताया जाना चाहिए था।
दरअसल, रामगोपाल और सपा के कुछ नेताओं को लगता है कि जनता परिवार का हिस्सा बन जाने से यूपी में उनकी ब्रांडिंग कमजोर होगी। नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, एचडी देवगौड़ा, ओमप्रकाश चौटाला और कमल मोरारका की पार्टियों का यूपी में कोई जनाधार नहीं है। वे विधानसभा चुनाव 2017 में सपा को कोई राजनीतिक लाभ नहीं दिला पाएंगे।
उल्टे सपा के प्रदेश संगठन से लेकर सरकार तक में उनका हस्तक्षेप और अपेक्षाएं बढ़ जाएंगी। सपा के प्रदेश नेतृत्व के हाथों में ‘फ्री हैंड’ पार्टी की बागडोर नहीं रहेगी। उन्हें लगता है कि लालू और चौटाला की पार्टियों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। उनके शीर्ष नेता भ्रष्टाचार के मामलों में सजायाफ्ता हैं।
उनके साथ बैठने से सपा, खास तौर से अखिलेश यादव की छवि प्रभावित हो सकती है। वे सोचते हैं कि यदि सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर लालू और नीतीश का गठबंधन बिहार में हिट जाए तभी जनता परिवार के विलय का प्रयोग यूपी में आजमाया जाए।
मुलायम के अभियान को झटका
सपा नेताओं को लगता है कि रामगोपाल यादव के बयान से सबसे बड़ा झटका सपा मुखिया मुलायम की मुहिम को लगा है। वे भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक दलों की बड़ी लामबंदी चाहते हैं, ताकि उनकी अगुवाई में भाजपा व कांग्रेस का विकल्प पेश किया जाए।
जनता परिवार के विलय से मुलायम यूपी से बाहर निकलकर आधा दर्जन राज्यों के नेता बन जाएंगे। उनके दल को राष्ट्रीय स्वरूप हासिल हो जाएगा। मुलायम नए दल का स्वरूप जल्द सामने आने की बात कह चुके हैं।
एका टूटा तो सपा पर आएगा दोष
राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले मानते हैं कि जनता परिवार की प्रस्तावित एकता खंडित हुई तो दोष रामगोपाल यादव और सपा पर आएगा। यह स्थिति रामगोपाल के बयान के बाद बनी है।
उन्होंने बिहार में नीतीश और लालू को अपने-अपने सिंबल पर चुनाव लड़ने और सीटों का बंटवारा करने की सलाह दी। जब सीटों का बंटवारा और सिंबल अलग होंगे तो विलय किस बात का। उन्होंने विलय को यूपी के लिए आत्मघाती फैसला बताकर भी इस विलय के परवान न चढ़ने का संकेत दे दिया है।
महासचिव को है रुतबा कम होने का डर
सपा के ही कुछ लोग मानते हैं कि पार्टी और सपा संसदीय दल में अपने रुतबे को खतरा भांपते हुए रामगोपाल यादव ने जनता परिवार के विलय के खिलाफ आवाज उठाई है।
सपा में रामगोपाल का बड़ा कद है। विधायक, सांसद हों या मंत्री, उन्हें सभी विशेष सम्मान देते हैं। वे किसी भी नेता को डांटने-फटकारने से भी नहीं चूकते। राज्यसभा में वे सपा संसदीय दल के नेता हैं।
राज्यसभा में सपा के 17 सदस्य हैं। यदि जनता परिवार का विलय हुआ तो पार्टी और राज्यसभा में रामगोपाल यादव का रुतबा कम होगा।
मुमकिन है उनका राज्यसभा में दल के नेता का ओहदा छिन जाए। ये सब कारण भी विलय को लेकर उनके विरोध की वजह माने जा रहे हैं।