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सोनभद्र जमीन घोटाला : पांच गांव का रिकॉर्ड ही पूरा खेल समझने के लिए काफी

Mon, 29 Jul 2019 03:30 PM IST
Amulya Rastogi अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Mon, 29 Jul 2019 03:30 PM IST
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sonbhadra land scam : to understand whole game records of five villages are enough
सोनभद्र जमीन विवाद - फोटो : अमर उजाला

सोनभद्र में जमीन घोटाले की हकीकत जानने के लिए सिर्फ पांच गांवों का रिकॉर्ड ही काफी है। शासन और सरकार में शामिल राजनेताओं और अधिकारियों ने सारे नियम-कानून ताक पर रखकर यहां की वन भूमि को गैर वन भूमि में बदल दिया। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तक ने इस पर आपत्ति जताई, पर यहां के ‘होशियार’ अफसरों ने संबंधित फाइलों को इस तरह से दबाया कि आज तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।

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सोनभद्र जिले के पांच गांव कोटा, पडरच, पनारी, मकड़ीबारी और मरकुंडी की जमीन को वन भूमि घोषित कर दिया गया था। नियमानुसार, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना इन गांवों की जमीन को न तो गैर वन भूमि घोषित किया जा सकता था और न ही इसे गैर वन कार्यों के लिए उपयोग में दिया जा सकता था। 
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लेकिन 2008 में कोटा, पनारी और मकड़ीबारी की जमीन को गैर वन भूमि करार दे दिया गया। घपले का अंदाजा इससे ही लगा सकते हैं कि, मकड़ीबारी की जमीन को 1987 में तत्कालीन सचिव, वन कमल पांडेय ने अंतिम रूप से वन विभाग में निहित कर दिया था। इस जमीन को कभी भी वन क्षेत्र से बाहर नहीं रखा जा सकता।

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इन फैसलों पर कई बार आपत्तियां उठीं, पर अधिकारियों ने बच निकलने का कोई न कोई तरीका निकाल ही लिया। इसमें सरकार में अहम पदों पर बैठे लोगों का संरक्षण भी किसी से छिपा नहीं है।

वन विभाग के एक सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष ने नाम न छापने के अनुरोध के साथ कहा कि अमर उजाला में सोनभद्र के जमीन घोटाले से संबंधित प्रकाशित हो रहे समाचार काफी गंभीर किस्म के हैं। संबंधित फाइल शासन में हैं। अगर इन्हें ठीक से चेक कर लिया जाए तो हकीकत सामने आते देर नहीं लगेगी। यह भी सामने आ जाएगा कि किस तरह से सोनभद्र में वन भूमि की गैर आदिवासियों ने लूट मचाई है।

बता दें कि, 29 दिसंबर 2014 को उच्चाधिकारियों को भेजे अपने पत्र में तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने भी लिखा था, ‘पूर्व में सोनभद्र में 25 हजार हेक्टेयर भूमि को भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध वन क्षेत्र से अलग कर गैर आदिवासियों तथा अन्य संस्थाओं के पक्ष में करने का अनुमान लगाया गया था। वर्तमान में प्राप्त जानकारी के अनुसार, जनपद सोनभद्र में यह आंकड़ा एक लाख हेक्टेयर का है और लगातार बढ़ता जा रहा है, जोकि गंभीर चिंता का विषय है।’

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