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स्लीप एप्निया से डायबिटीज, बीपी और थायरॉइड की समस्या
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बैठे-बैठे या फिर अचानक सो जाने की बीमारी स्लीप एप्निया से पीड़ित मरीजों को डायबिटीज, बीपी और थायरॉइड की समस्या भी हो सकती है। इतना ही नहीं सोते समय सांस रुकने से इनकी जान तक जा सकती है, इसलिए श्वसन संबंधी रोगों के विशेषज्ञ इससे पीड़ित मरीजों को वजन कम करने के साथ ही अन्य जरूरी एहतियात बरतने की सलाह देते हैं।
केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति एक बार में करीब आधा लीटर ऑक्सीजन लेता है। नाक से गले के बीच रुकावट होने पर सोते समय खर्राटों की आवाज आने लगती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से ही डायबिटीज, थायरॉइड और बीपी जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। प्रो. सूर्यकांत के अनुसार 30 साल से अधिक उम्र वालों में से करीब 40 फीसदी लोगों को खर्राटों की समस्या होती है। हालांकि इनमें से सिर्फ तीन से चार फीसदी लोगों को ही स्लीप एप्निया की समस्या है। बीमारी से पीड़ित लोगों को ही ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।
स्लीप लैब में होता है अध्ययन
प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में स्लीप लैब है। यहां व्यक्ति की नींद की गुणवत्ता का अध्ययन किया जाता है। इसके आधार पर बीमारी से पीड़ित होने की आशंका के स्तर का पता लगाया जा सकता है।
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स्थायी समाधान भी मौजूद
प्रो. सूर्यकांत के अनुसार स्लीप एप्निया से पीड़ित लोगों के लिए सबसे जरूरी है कि वे अपने वजन पर नियंत्रण करें। इसके अलावा कम गंभीर लोगों के दांत में उपकरण लगाया जाता है। इससे सोते समय उनकी सांस रुकने की आशंका कम हो जाती है। इसके अलावा स्थायी इलाज के विकल्प के रूप में ऑटो सीपैप मशीन का सहारा लिया जाता है। इसका उपयोग करने पर खर्राटों की समस्या कम होने के साथ ही सांस रुकने की आशंका भी नहीं रहती है।
बीमारी के कुछ लक्षण
मोटापा, छोटी गर्दन, दोहरी ठुड्डी, खर्राटे, तुरंत सोने वाले, बैठे-बैठे सो जाने वाले।
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केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति एक बार में करीब आधा लीटर ऑक्सीजन लेता है। नाक से गले के बीच रुकावट होने पर सोते समय खर्राटों की आवाज आने लगती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से ही डायबिटीज, थायरॉइड और बीपी जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। प्रो. सूर्यकांत के अनुसार 30 साल से अधिक उम्र वालों में से करीब 40 फीसदी लोगों को खर्राटों की समस्या होती है। हालांकि इनमें से सिर्फ तीन से चार फीसदी लोगों को ही स्लीप एप्निया की समस्या है। बीमारी से पीड़ित लोगों को ही ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।
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स्लीप लैब में होता है अध्ययन
प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग में स्लीप लैब है। यहां व्यक्ति की नींद की गुणवत्ता का अध्ययन किया जाता है। इसके आधार पर बीमारी से पीड़ित होने की आशंका के स्तर का पता लगाया जा सकता है।
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स्थायी समाधान भी मौजूद
प्रो. सूर्यकांत के अनुसार स्लीप एप्निया से पीड़ित लोगों के लिए सबसे जरूरी है कि वे अपने वजन पर नियंत्रण करें। इसके अलावा कम गंभीर लोगों के दांत में उपकरण लगाया जाता है। इससे सोते समय उनकी सांस रुकने की आशंका कम हो जाती है। इसके अलावा स्थायी इलाज के विकल्प के रूप में ऑटो सीपैप मशीन का सहारा लिया जाता है। इसका उपयोग करने पर खर्राटों की समस्या कम होने के साथ ही सांस रुकने की आशंका भी नहीं रहती है।
बीमारी के कुछ लक्षण
मोटापा, छोटी गर्दन, दोहरी ठुड्डी, खर्राटे, तुरंत सोने वाले, बैठे-बैठे सो जाने वाले।