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केजीएमयू में एक ही कंपनी के भरोसे २० हजार मरीज

Wed, 10 Jul 2019 01:42 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 10 Jul 2019 01:42 AM IST
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Serious patient have to wait atleast 2 weeks for medecine
दवाओं का इंतजार बढ़ा रहा मरीजों का दर्द
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आरोप- केजीएमयू में लोकल पर्चेज वाली दवाओं की आपूर्ति में देरी करती है निजी कंपनी
केजीएमयू में असाध्य, विपन्न मरीजों को दवाओं के लिए दो हफ्ते तक इंतजार करना पड़ रहा है, ऐसे में उनका दर्द कम होने के बजाय बढ़ रहा है। कई बार तो उन्हें दवाएं मिलती ही नहीं। यही नहीं दिल के ऑपरेशन में लगने वाले वॉल्व व हड्डी में लगने वाले इंप्लांट के लिए भी इंतजार कराया जाता है। आरोप है केजीएमयू प्रशासन ने एक ही कंपनी को लोकल पर्चेज वाली दवाएं व उपकरण की खरीद-फरोख्त का जिम्मा दे रखा है, जो समय से आपूर्ति नहीं कर पा रही। वहीं केजीएमयू प्रशासन का कहना है कि इस बार नए टेंडर के तहत अन्य कंपनियों को शामिल किया जाएगा।
केजीएमयू में असाध्य, विपन्न श्रेणी के करीब 20 हजार मरीज पंजीकृत हैं। इन्हें मुफ्त दवा मुहैया कराने की जिम्मेदारी केजीएमयू प्रशासन की है। केजीएमयू ने दवा आपूर्ति के लिए आमा मेडिकल स्टोर से अनुबंध कर रखा है, जिसके पास लोकल पर्चेज वाली करोड़ों रुपये की दवाएं-इप्लांट व वॉल्व समेत अन्य चिकित्सकीय उपकरण मुहैया कराने का ठेका है। आरोप है कि विभागों से दवाओं का मांग पत्र भेजे जाने के डेढ़ से दो हफ्ते बाद ही मरीजों को दवाएं मिल पाती हैं। ऐसे में कई मरीज को अपनी जेब से पैसा लगाना पड़ता है। केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बीके ओझा ने बताया कि मरीजों का बहुत अधिक लोड है, इस कारण दवा आपूर्ति में समय लगा जाता है। वैसे इस बार अनुबंध में अन्य कंपनियों को भी शामिल किया जाएगा। ताकि मरीजों को जल्द से दवाएं मिल सकें।
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दवाओं व उपकरणों के लिए 45 करोड़ रुपये का बजट
केजीएमयू में मरीजों की दवाएं व उपकरण की खरीद के लिए सालाना करीब 45 करोड़ रुपये का बजट है। इसमें करीब 15 करोड़ रुपये का बजट लोकल पर्चेज दवाओं का है। यह बजट निजी कंपनी आमा मेडिकल को दिया जाता है, जो अनुबंध के तहत सस्ती दर पर मरीजों को दवाएं खरीद कर मुहैया कराने का दावा करती है। कुछ अफसरों पर कमीशनखोरी के आरोप को लेकर पहले विवाद भी हो चुका है।
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पीएम-सीएम फंड से मिलने वाली दवाओं
केजीएमयू में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री फं ड से मिलने वाली दवाएं लेने के लिए मरीजों को लंबा इंतजार निजी कंपनी की लापरवाही से करना पड़ता है। असाध्य बीमारियों के उपचार के लिए दवाएं मुफ्त दी जाती हैं। वहीं अफसर मांग पत्र विभाग से न आने की बात कहकर मरीजों को टरकाते हैं।
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