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मेडिकल की पढ़ाई बढ़ने के साथ घटती जाती है संवेदनाएं
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सचिन त्रिपाठी
डॉक्टर का अच्छा व्यवहार मरीज के लिए सबसे असरदार दवाई का काम करता है। डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिला लेते वक्त विद्यार्थी में मरीजों के प्रति समानुभूति का स्तर बहुत अच्छा होता है।
अगले साल इसमें थोड़ी कमी आती है। वहीं, एमबीबीएस की डिग्री पूरी होते-होते यह स्तर और खराब तथा पीजी की पढ़ाई खत्म होने के साथ इसमें और गिरावट आ जाती है।
इसकी वजह काम का दबाव, ड्यूटी के ज्यादा घंटे, विद्यार्थी की पृष्ठभूमि और संस्कार हो सकते हैं, लेकिन इसका खामियाजा मरीज भुगतते हैं।
केजीएमयू के एमबीबीएस के विद्यार्थी कौशल किशोर सिंह ने तीन साल के शोध में यह निष्कर्ष निकाला है। इसके लिए उसे देशभर के चुनिंदा विद्यार्थियों को मिलने वाली इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की छात्रवृत्ति भी मिली है।
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शोध में करीब 2600 मेडिकल छात्रों और शिक्षकों दोनों को शामिल किया गया। उनके व्यवहार में आए बदलाव के आकलन के लिए प्रश्नावली भरवाई। शोध में केजीएमयू के साथ यूपी, बिहार व दक्षिण भारत के मिलाकर कुल 20 मेडिकल कॉलेज थे।
सभी मेडिकल कॉलेजों के परिणाम लगभग एक समान ही आए। इसके अनुसार मेडिकल स्टूडेंट एमबीबीएस की पढ़ाई करते-करते ही चिल्लाना सीख जाते हैं।
पीजी की पढ़ाई के दौरान इसमें सुधार के बजाय बढ़ोत्तरी ही होती है। इसकी अलग-अलग वजहें हैं। ऐेसे में मेडिकल की पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों को समानुभूति का पाठ पढ़ाना भी बेहद जरूरी है। इससे मरीजों को ज्यादा बेहतर इलाज मिल सकेगा।
परिवार या आसपास दर्द देखने वाले ज्यादा संवेदनशील
शोध के अनुसार जिन विद्यार्थियों ने परिवार या फिर आसपास दर्द देखा है, वे ज्यादा संवेदनशील हैं। वहीं, ग्रामीण पृष्ठभूमि और दूर-दराज के विद्यार्थियों का समानुभूति स्तर भी बाकियों के मुकाबले बेहतर मिला। समानुभूति के खराब स्तर के लिए काम की अधिकता, पढ़ाई के लिए समय न मिलना, अमानवीय स्थिति, काम के हिसाब से कम वेतन आदि की भी बड़ी भूमिका होती है।
समानुभूति के स्तर में भारत का खराब प्रदर्शन
चिकित्सा के विद्यार्थियों में समानुभूति के स्तर के मामले में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब है। भारत को इसके लिए सिर्फ 88 अंक ही मिले। वहीं, श्रीलंका और अन्य पड़ोसी देशों के साथ पश्चिम के देशों की स्थिति इससे बहुत बेहतर है। भारत के अलावा किसी भी देश का समानुभूति स्तर सौ से कम नहीं मिला।
दो अन्य छात्रों को भी छात्रवृत्ति
केजीएमयू में कौशल किशोर के साथ शुभम त्रिपाठी और शुभोजित राय को भी आईसीएमआर की छात्रवृत्ति मिली है। शुभम को डिजिटल स्क्रीन की वजह से खराब होते स्वास्थ्य और विद्यार्थियों के बदलते व्यवहार पर काम करने के लिए छात्रवृत्ति मिली है। इसी तरह शुभोजित को नींद और भोजन के आपसी संबंध पर काम करने के लिए यह उपलब्धि मिली है। उन्होंने पाया कि पौष्टिक भोजन न करने से विद्यार्थियों की नींद और सेहत दोनों पर बुरा असर होता है।
केजीएमयू में पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों को शोध के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है। अच्छी बात है कि यहां के छात्रों को आईसीएमआर जैसी प्रतिष्ठित संस्था से छात्रवृत्ति मिल रही है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
- डॉ. सुधीर सिंह, प्रवक्ता केजीएमयू
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डॉक्टर का अच्छा व्यवहार मरीज के लिए सबसे असरदार दवाई का काम करता है। डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिला लेते वक्त विद्यार्थी में मरीजों के प्रति समानुभूति का स्तर बहुत अच्छा होता है।
अगले साल इसमें थोड़ी कमी आती है। वहीं, एमबीबीएस की डिग्री पूरी होते-होते यह स्तर और खराब तथा पीजी की पढ़ाई खत्म होने के साथ इसमें और गिरावट आ जाती है।
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इसकी वजह काम का दबाव, ड्यूटी के ज्यादा घंटे, विद्यार्थी की पृष्ठभूमि और संस्कार हो सकते हैं, लेकिन इसका खामियाजा मरीज भुगतते हैं।
केजीएमयू के एमबीबीएस के विद्यार्थी कौशल किशोर सिंह ने तीन साल के शोध में यह निष्कर्ष निकाला है। इसके लिए उसे देशभर के चुनिंदा विद्यार्थियों को मिलने वाली इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की छात्रवृत्ति भी मिली है।
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शोध में करीब 2600 मेडिकल छात्रों और शिक्षकों दोनों को शामिल किया गया। उनके व्यवहार में आए बदलाव के आकलन के लिए प्रश्नावली भरवाई। शोध में केजीएमयू के साथ यूपी, बिहार व दक्षिण भारत के मिलाकर कुल 20 मेडिकल कॉलेज थे।
सभी मेडिकल कॉलेजों के परिणाम लगभग एक समान ही आए। इसके अनुसार मेडिकल स्टूडेंट एमबीबीएस की पढ़ाई करते-करते ही चिल्लाना सीख जाते हैं।
पीजी की पढ़ाई के दौरान इसमें सुधार के बजाय बढ़ोत्तरी ही होती है। इसकी अलग-अलग वजहें हैं। ऐेसे में मेडिकल की पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों को समानुभूति का पाठ पढ़ाना भी बेहद जरूरी है। इससे मरीजों को ज्यादा बेहतर इलाज मिल सकेगा।
परिवार या आसपास दर्द देखने वाले ज्यादा संवेदनशील
शोध के अनुसार जिन विद्यार्थियों ने परिवार या फिर आसपास दर्द देखा है, वे ज्यादा संवेदनशील हैं। वहीं, ग्रामीण पृष्ठभूमि और दूर-दराज के विद्यार्थियों का समानुभूति स्तर भी बाकियों के मुकाबले बेहतर मिला। समानुभूति के खराब स्तर के लिए काम की अधिकता, पढ़ाई के लिए समय न मिलना, अमानवीय स्थिति, काम के हिसाब से कम वेतन आदि की भी बड़ी भूमिका होती है।
समानुभूति के स्तर में भारत का खराब प्रदर्शन
चिकित्सा के विद्यार्थियों में समानुभूति के स्तर के मामले में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब है। भारत को इसके लिए सिर्फ 88 अंक ही मिले। वहीं, श्रीलंका और अन्य पड़ोसी देशों के साथ पश्चिम के देशों की स्थिति इससे बहुत बेहतर है। भारत के अलावा किसी भी देश का समानुभूति स्तर सौ से कम नहीं मिला।
दो अन्य छात्रों को भी छात्रवृत्ति
केजीएमयू में कौशल किशोर के साथ शुभम त्रिपाठी और शुभोजित राय को भी आईसीएमआर की छात्रवृत्ति मिली है। शुभम को डिजिटल स्क्रीन की वजह से खराब होते स्वास्थ्य और विद्यार्थियों के बदलते व्यवहार पर काम करने के लिए छात्रवृत्ति मिली है। इसी तरह शुभोजित को नींद और भोजन के आपसी संबंध पर काम करने के लिए यह उपलब्धि मिली है। उन्होंने पाया कि पौष्टिक भोजन न करने से विद्यार्थियों की नींद और सेहत दोनों पर बुरा असर होता है।
केजीएमयू में पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों को शोध के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है। अच्छी बात है कि यहां के छात्रों को आईसीएमआर जैसी प्रतिष्ठित संस्था से छात्रवृत्ति मिल रही है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
- डॉ. सुधीर सिंह, प्रवक्ता केजीएमयू