योगी सरकार 2.0: छह माह के कार्यकाल में चुनौतियों के बीच सख्त तेवरों से और मजबूत हुई सरकार
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकार के छह माह बीतते-बीतते यह साफ कर दिया है कि जो अधिकारी सरकार और जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगा या सरकार की छवि के लिए सवाल बनेगा उसे बख्शा नहीं जाएगा। वहीं, मुख्यमंत्री ने विपक्षी दल की घेराबंदी को अपने एजेंडे और विकास के विजन से फेल कर दिया है।
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विस्तार
यूपी में 37 साल बाद किसी पार्टी को दोबारा सत्ता में लाने का इतिहास बनाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकार के छह माह बीतते-बीतते कई महत्वपूर्ण अधिकारियों को अपेक्षाकृत महत्वहीन पदों पर भेजकर तथा पुलिस महानिदेशक बदलकर साफ कर दिया है कि उन्होंने पहली सरकार के दौरान घटी घटनाओं से काफी कुछ सीखा है। जो अधिकारी सरकार और जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगा, सरकार की छवि के लिए सवाल बनेगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा।
सरकार ने मदरसा सर्वेक्षण एवं वक्फ संपत्तियों की जांच तथा वक्फ के कब्जे में दर्ज सरकारी भूमि को वापस लेकर राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त करने के अभियान, पुरोहित कल्याण बोर्ड का गठन, कुंभ की व्यवस्थाओं के लिए अभी से धन का इंतजाम जैसे फैसलों से एजेंडे पर मजबूती से आगे बढ़ने का इरादा भी साफ कर दिया है। साथ ही करीने से लोगों के दिल व दिमाग में यह बैठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि विपक्ष को जनता की अपेक्षाओं से ज्यादा मुस्लिम वोटों की गोलबंदी तथा तुष्टीकरण की नीति की चिंता है। यह काम भाजपा इस सावधानी से कर रही है कि मुस्लिम वोटों में बंटवारा भी हो जाए लेकिन उसकी हिंदुत्ववादी छवि पर कोई असर भी न पड़े। योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रदेश के विपक्षी दल मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी सत्तारूढ़ दल की मजबूत घेराबंदी करने में जिस तरह बहुत सफल नहीं रही है उससे सरकार को यह संदेश देने में भी मदद मिली कि विपक्ष में भाजपा का विकल्प बनने की क्षमता ही नहीं है।
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इस तरह सजाई बाजी: वजह चाहे पांच साल सरकार चलाने का अनुभव हो या लगातार दूसरी बार सत्ता पाकर कीर्तिमान रचने से उपजा आत्मविश्वास, मुख्यमंत्री ने इस बार सत्ता संभालते ही पिछली बार के विपरीत पूरी सरकार को जनता के बीच मैदान में उतार दिया। सभी 18 मंडलों के एक-एक जिले से सरकार के सीधे संपर्क व संवाद तथा लोगों की अपेक्षाओं व आवश्यकताओं की जानकारी के लिए मंत्रियों के समूह बनाना तथा बाद में इन समूहों के अलावा अपने तथा दोनों सहयोगी उप मुख्यमंत्रियों के साथ 25-25 जिलों के लिहाज से बंटवारा कर सभी 75 जिलों पर करीबी नजर रखने के फैसलों ने लोगों के बीच सरकार की तरफ से उनके सरोकारों का ख्याल रखने की चिंता तथा समस्याओं के निराकरण के संदेश को ही पुष्ट किया।
यही नहीं, उन्होंने प्रत्येक मंत्री से 100 दिन से लेकर पांच साल की कार्ययोजना बनाकर कार्य करने का निर्देश दिया। इसका सकारात्मक असर दिखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल यात्रा से दिल्ली वापसी के दौरान लखनऊ में मुख्यमंत्री निवास पर मंत्रियों के साथ बैठक ने सीएम योगी की मजबूती तथा सभी को एकजुट होकर कार्य करने का जो मंत्र दिया उसने भी सरकार को मनोवैज्ञानिक बढ़त दिला दी। लोगों के बीच संदेश गया कि केंद्र और प्रदेश सरकार पूरे समन्वय से एजेंडे पर काम कर रही है।
भाजपा की लगातार दूसरी जीत ने सपा गठबंधन में शामिल ओमप्रकाश राजभर जैसे नेताओं को असमंजस में तो पहले ही डाल दिया था। पर, बाद में कुछ ऐसे समीकरण बने कि गठबंधन के भीतर के असहमति के स्वर सार्वजनिक होने शुरू हो गए। इसने अखिलेश के लिए चुनौती बढ़ाई। भाजपा से अलग होकर अपने साथ आने पर सपा मुखिया ने जिन राजभर को लेकर बडे़-बड़े दावे किए थे वही ओमप्रकाश सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर ही हमलावर दिख रहे हैं। सपा के विधानसभा में नेता के सवाल पर अखिलेश के फैसले तथा रवैये से असहज चाचा शिवपाल भी जिस तरह अलग राह पर फिर चल दिए, उसने भी लोगों का भाजपा पर भरोसा बढ़ाने में मदद की।
सेंधमारी से भी मजबूती
रही-सही कसर पूरी कर दी राष्ट्रपति चुनाव ने। ओम प्रकाश राजभर भाजपा के पाले में दिखे। बसपा भी समर्थन में दिखी। सपा के टिकट पर जीते शिवपाल सहित कुछ अन्य वोटों के भी छिटकने के संकेत सामने आए। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को यूपी में अपेक्षा से ज्यादा मिले वोटों ने विपक्ष की साख को चोट पहुंचाई तो मुख्यमंत्री के रणनीतिक कौशल को साबित किया।
लोकसभा की दो सीटों के उपचुनाव सिर्फ अखिलेश या सपा को ही धक्का देने वाले नहीं थे बल्कि जेल से जमानत पर बाहर आए आजम खां को भी करारा झटका देने वाले रहे। रामपुर में भाजपा की जीत ने यह जता दिया कि योगी सरकार के कार्यों ने प्रदेश की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीट आजम के गढ़ रामपुर में भी लोगों में भाजपा का भरोसा बढ़ाया है। मुस्लिमों का भी आजम पर अब पहले जैसा भरोसा नहीं बचा है। विधान परिषद के एवं राज्यसभा के चुनाव में भाजपा की सफलता ने भी योगी को मजबूत किया ।
चुनौतियां से पाया पार
ऐसा नहीं है कि सीएम योगी, उनकी सरकार या सत्तारूढ़ दल भाजपा के लिए इन छह महीनों में सब अच्छा ही अच्छा रहा। नौकरशाही के रवैये एवं पुलिस की कार्यप्रणाली को योगी सरकार के पहले कार्यकाल में भी सवाल उठे थे। इस बार भी उठे। पिछली बार विधायकों में ही असंतोष सार्वजनिक हुआ था। इस बार मंत्रियों का असंतोष सामने आया। तबादलों को लेकर सरकार की अंतर्क लह सुनाई दी। उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का अपने ही विभाग के अपर मुख्य सचिव से सार्वजनिक हुए मतभेदों ने सरकार की साख पर सवाल भी उठाए।
जलशक्ति राज्य मंत्री दिनेश खटीक के पत्र और इस्तीफे की चर्चा ने भी सरकार के मुश्किलें खड़ी कीं और रक्षात्मक रुख अपनाने को मजबूर किया। पर, मुख्य विपक्षी दल सपा किसी को मुद्दा नहीं बना पाई। विपक्ष को सरकार और सत्तारूढ़ दल भाजपा को घेरने का मौका उस समय भी था जब एक दिन अचानक विधान परिषद में नेता सदन पद पर स्वतंत्रदेव सिंह के स्थान पर केशव प्रसाद मौर्य की नियुक्ति कर दी गई। पर, इस बार भी सपा कुछ खास नहीं कर पाई। उल्टे विधान परिषद से कांग्रेस की पूरी तरह विदाई तथा नेता प्रतिपक्ष पद की शर्ते पूरी करने में सपा की विफलता ने भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी।
संदेशों से बढ़ी साख
योगी सरकार 2.0 में जिस तरह विकास कार्यों में तेजी का संदेश दिया जा रहा है। सरकार बनने के तुरंत बाद तीसरी ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के जरिए 80 हजार करोड़ रुपये के निवेश का रास्ता तैयार किया गया। अर्थशास्त्री प्रो. एपी तिवारी कहते हैं कि प्रदेश के इतिहास का अब तक सबसे बड़ा बजट पारित कराकर, प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन, किसानों को बीज आदि की सहायता भाजपा के संकल्प पत्र के 97 वादों को पूरा करने के लिए 54,833 रुपये के प्रावधान भाजपा के लोककल्याण एजेंडे पर काम करने के दावे को पुष्ट करते हैं।
राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 8.3 प्रतिशत के विपरीत प्रदेश में बेरोजगारी की दर को 3.9 प्रतिशत पर थामे रहना भी योगी सरकार की सफलता है। सूखा एवं बाढ़ को लेकर मुख्यमंत्री की सक्रियता तथा बकाया बिजली बिलों एवं अन्य राजस्व देयों की वसूली पर रोक ने सरकार के कल्याणकारी छवि के दावे को ज्यादा मजबूती दी है। हालांकि बरसात के चलते बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के एक-दो स्थानों पर टूटने तथा गर्मी के दौरान कोयले की किल्लत से बिजली को लेकर कुछ दिन के लिए ही सही आई समस्या ने सरकार की रीतिनीति को लेकर कुछ सवाल भी उठाए। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति पर भी सवालिया निशान लगा लेकिन मुख्यमंत्री ने कठोर तेवरों से इनको व्यापक नहीं होने दिया।
बदलाव की उम्मीदों को उड़ान
वक्फ संपत्तियों की जांच एवं मदरसों के सर्वेक्षण के फैसलों के साथ अगर देशव्यापी पड़ रहे पीएफआई पर छापों को देखें, साथ ही इन कार्यों के तार उपद्रवियों पर शिकंजा कसने के लिए विधानसभा में पारित कराए गए विधेयक से जोड़ें, जिसमें किसी धरना-प्रदर्शन या उपद्रव के दौरान उपद्रवियों द्वारा सार्वजनिक संपत्तियों को पहुंचाए गए नुकसान की वसूली के प्रावधानों को और कठोर किया गया है तो सरकार से उम्मीदों को नई उड़ान मिलती दिख रही है।
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र भट्ट कहते हैं कि उपद्रव के दौरान किसी निर्दोष की मौत पर दंगाइयों से वसूली कर उसके परिवार को 5 लाख रुपये देने, दिव्यांग होने वालों को 1 लाख रुपये देने का प्रावधान तथा सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए पहले से ज्यादा कड़े किए गए प्रावधान तुष्टीकरण एवं वोट बैंक की राजनीति में बदलाव का संदेश दे रहे हैं। साथ ही सरकार ने जिस तरह 1989 के उस आदेश को रद्द करने का फैसला किया है जिसमें प्रदेश की ऊसर, बंजर, भीटा आदि भूमि पर बने कब्रिस्तान, ईदगाह एवं मस्जिद के नाम ही दर्ज करने का आदेश दिया गया था, उससे भी सरकार के एजेंडे पर और वोट देने वालों की अपेक्षाओं पर दृढ़ता से काम करने का संकेत निकल रहा है।
इसी के साथ जिस तरह विधानसभा सदन का एक दिन पूरी तरह महिला जनप्रतिनिधियों को समर्पित करते हुए पॉक्सो एक्ट व महिला यौन उत्पीड़न के मामलों में कानून को सख्त बनाने का फैसला किया है। उससे सरकार सभी को उनके सरोकारों के साथ साधते हुए ही नहीं दिख रही है बल्कि लोगों को नई उम्मीदें भी बंधाती नजर आ रही है।