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कैग रिपोर्ट के हर पन्ने ने खोली घोटाले की एक दास्तां

Tue, 17 Sep 2013 12:59 PM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
टीम डिजिटल/लखनऊ Updated Tue, 17 Sep 2013 12:59 PM IST
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scams of thousand of crores exposed

मनरेगा के अंतर्गत पिछले पांच सालों में जमकर मनमानी हुई। यह मनमानी मजदूरों के काम से लेकर उनके भुगतान, नियुक्तियों से लेकर प्रशिक्षण और प्रचार से लेकर प्रबंधन तक हर स्तर पर नजर आई।

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51 जिलों में वास्तविक खर्च से 2560.63 करोड़ रुपये ज्यादा का उपभोग प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर दिया गया।

जिन मजदूरों को समय से काम नहीं मिला, सरकार उनका बेरोजगारी भत्ता भी दबा गई। 5.12 करोड़ रुपये (2009-12) के भत्ते का सरकार ने भुगतान नहीं किया।

मनरेगी की मनमानी

चौंकाने वाला खुलासा किया गया है कि अफसरों ने मनरेगा के मूल्यांकन में जुटी कैग के ऑडिट तक को प्रभावित करने का काम किया। सोमवार को विधानमंडल सत्र के पहले दिन राज्य सरकार की ओर से नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2007-12 के बीच प्रदेश में मनरेगा के हुए कार्यों की ऑडिट रिपोर्ट पेश की गई।
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इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि आगरा की 79 ग्राम पंचायतों में बिना मजदूरों से काम लिए ही 1.38 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। नियमों के विरुद्ध प्रदेश की 1990 ग्राम पंचायतों को अगली किस्त जारी कर दी गई। 130 खाते डुप्लीकेट पाए गए।
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2011-12 में 29401 ऐसी ग्राम पंचायतें थीं, जिनके द्वारा 2284 करोड़ रुपये की ही मांग की गई थी लेकिन उन्हें काम के लिए 1322.24 करोड़ रुपये ज्यादा दे दिया गया।

4834 ग्राम पंचायतें ऐसी थीं, जिन्हें अवमुक्त रकम श्रम बजट से भी ज्यादा थी। 1312 ऐसी ग्राम पंचायतें थीं, जिनका स्वीकृत श्रम बजट पिछले साल खर्च न हो सके श्रम बजट से ज्यादा था। इसके बावजूद उन्हें 21.75 करोड़ रुपये अधिक दिए गए।

अनियमितताओं का आरईएस
कैग की रिपोर्ट में ग्रामीण अभियंत्रण सेवा (आरईएस) की कार्यप्रणाली और कामों में अनियमितताएं उजागर हुई हैं। कैग ने वर्ष 2007-2012 के बीच आरईएस की कार्यप्रणाली के मूल्यांकन के दौरान जाली सिक्योरिटी डिपाजिट से काम सौंपने व कम सिक्योरिटी डिपाजिट कर ठेकेदारों को लाभ देने का राज-फाश किया।

साथ ही प्रशासनिक स्वीकृति के पहले ही तकनीकी स्वीकृति जारी करने और बिना तकनीकी स्वीकृति के काम शुरू कराने जैसे मामलों का खुलासा किया है। निर्माण में अनियमितता और अनियमित भुगतान के साथ ही सवालों से घिरी टेंडर प्रणाली की भी बखिया उधेड़ी है।

एक अन्य तथ्य गंभीर तथ्य उजागर किया गया है कि वर्ष 2008 से 2012 के बीच विभाग ने सीसी रोड व केसी ड्रेन के कार्यों के लिए मिले 4550.61 करोड़ रुपये में से 4276.91 करोड़ रुपये खर्च किए लेकिन उपयोगिता प्रमाणपत्र नहीं दिया। नियमानुसार वित्तीय वर्ष के अंत तक ही यह प्रमाणपत्र दे दिया जाना चाहिए।

19 हजार करोड़ है वाणिज्यकर का बकाया
वाणिज्य कर विभाग का 18,960 करोड़ बकाया है जिसकी वसूली नहीं हो रही है। इसमें से 11,803 करोड़ की वसूली तो विगत पांच वर्षों से लटकी हुई है। वाणिज्य कर विभाग यदि इसकी वसूली कर ले तो प्रदेश के विकास की तस्वीर बदल सकती है। यह खुलासा कैग की रिपोर्ट में हुआ है।

प्रदेश का वाणिज्य कर विभाग राज्य की आय के स्रोत का दूसरा सबसे बड़ा विभाग है। प्रदेश में व्यापार करने वालों को वैट के तहत कर अदा करना होता है।

कैग की आपत्तियों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2007-08 से 2011-12 तक बकाये वसूली की कार्यवाही तो की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली है।

कैग रिपोर्ट के मुताबिक विभागीय तर्कों को मानें तो भू-राजस्व से 1,57,623 करोड़ रुपये की वसूली के लिए मांग पत्र जारी किया। 4,26,046 करोड़ की वसूली न्यायालय व शासन ने रोक दी।

495.62 करोड़ की वसूली सरकारी व अर्द्धसरकारी विभागों, दूसरे राज्यों से संबंधित 913.17 करोड़, प्रदेश के ट्रांसपोर्टरों से 69.93 करोड़, 1,498.03 करोड़ बट्टे खाते में डालने तथा 10,146.84 करोड़ विभागीय कार्यवाही से रुका हुआ है।

यूपीएसआईडीसी में 263 करोड़ की धांधली
उद्योग लगाने केनाम केलिए ली गई जमीन औने-पौने दामों में प्राइवेट बिल्डरों को सौंप कर यूपीएसआईडीसी ने 263 करोड़ से ज्यादा राशि का घोटाला किया है। कैग रिपोर्ट खुलासा करती है कि गाजियाबाद की ट्रॉनिका सिटी में ग्रुप हाउसिंग के आठ और कॉमर्शियल प्लॉटों को अपने ही नियमों को दरकिनार अलॉट किया गया जिससे 152.29 करोड़ की चपत लगी।


इसी तरह, सूरजपुर औद्योगिक क्षेत्र में ग्रुप हाउसिंग के पांच प्लॉटों को रिजर्व प्राइस के कायदों की अनदेखी कर आवंटित कर दिया गया।

इससे कॉरपोरेशन को 110.10 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। ट्रॉनिका सिटी में सर्किल रेट पर हुए 24.50 करोड़ रुपये केअतिरिक्त नुकसान को जोड़ें, तो यह घोटाला 300 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।

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