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NGO का कारनामा: मासूम बच्चों के नाम पर जबरदस्त लूट, रिकॉर्ड में 18 माह में तीन बार मां बनी महिला

Fri, 13 Oct 2017 11:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 13 Oct 2017 11:17 AM IST
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scam unfold in sachal palna grah scheme.
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : amar ujala

सचल पालनागृह योजना में मासूमों के नाम पर सरकारी धन की जमकर बंदरबांट हुई। न सेंटर का पता, न मजदूरों का लेकिन सचल पालना गृह योजना के मद में आया एक-एक पैसा खर्च हो गया। सीबीआई की शुरुआती जांच में ही घोटाले की परतें खुलने लगी हैं।

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इन एनजीओ ने तीन से छह माह के दुधमुहें बच्चों का पंजीरी और फल से पेट भरने का दावा कर करोड़ों रुपये हजम कर लिए। यही नहीं, पालना गृह में एक-एक महिला के पांच-पांच बच्चों को रखा गया। आश्चर्य तो यह कि इन बच्चों की उम्र में सिर्फ तीन से छह महीने का अंतर था।
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सपा शासन में केंद्र सरकार ने प्रदेश सरकार को 2013-14 में मजदूरों के छह साल के बच्चों के लिए सचल पालना गृह योजना शुरू की थी। प्रदेश सरकार को पहली किस्त के रूप में 68 करोड़ दिए गए थे। आरोप है कि इस योजना को जमीन पर शुरू ही नहीं किया गया और कागजों पर सचल पालना गृह बनाकर 68 करोड़ रुपये हड़प लिए गए।
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तत्कालीन श्रम मंत्री शाहिद मंजूर को जब इस घोटाले का पता चला तो उन्होंने जांच के आदेश दिए। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा। लखनऊ बेंच ने पूरे घोटाले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया। सीबीआई ने सारे दस्तावेज जुटाने के बाद समाज कल्याण बोर्ड के अज्ञात अधिकारियों, स्वयंसेवी संस्‍थाओं, श्रमिक कल्याण बोर्ड, निर्माण एजेंसी के अधिकारियों और अन्य के खिलाफ केस दर्ज किया था।

प्रदेश में चल रहे थे लगभग तीन हजार पालना गृह

scam unfold in sachal palna grah scheme.

सूत्रों की मानें तो एक पालना गृह पर छह साल तक के अधिकतम 25 बच्चों को रखा जा सकता था। प्रदेश भर में 280 एनजीओ मिलकर लगभग तीन हजार सचल पालना गृह चला रहे थे। यह इकलौती योजना थी जिसमें मजदूरों के बच्चों का रजिस्ट्रेशन धन के आवंटन के बाद किया गया।

पालना गृह में बच्चों के खाने के साथ-साथ उनकी देखरेख के लिए जिन लोगों को लगाया गया और बच्चों का परीक्षण करने के लिए जिन डॉक्टरों की सेवाएं ली गईं, उन्हें कैश में भुगतान दिखाया गया। एनजीओ ने लगभग सारे पैसों का भुगतान कैश में किया।

जिन मजदूरों के नाम रजिस्टर में दिखाए गए, उनका ऑनलाइन वेरिफिकेशन नहीं हो सका
पालना गृह के रिकॉर्ड के लिए बने रजिस्टर में सिर्फ खानापूरी की गई। एक ही मां-बाप के पांच-पांच बच्चों की एंट्री दिखाई गई। इसमें बच्चों का जो जन्मदिन दर्शाया गया उसमें डेढ़ साल के अंतराल में एक मां के तीन बच्चों की जन्म तिथि दर्ज कर दी गई। यानी एक ही मां के तीन बच्चों की उम्र में छह-छह माह का अंतर दिखाया गया।

सीबीआई के सूत्रों ने बताया कि सचल पालना गृह में कई ऐसे श्रमिकों के बच्चों का भी प्रवेश दर्शाया गया जो मनरेगा के तहत केंद्र सरकार की एक योजना का लाभ ले रहे हैं। जबकि इसमें मनरेगा श्रमिकों के बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जा सकता था।

लखनऊ समेत 11 जिलों का नहीं मिला रिकॉर्ड

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अब तक प्रदेश के 60 जिलों के जिला प्रोबेशन अधिकारी (डीपीओ) ने अपने-अपने जिले के दस्तावेज सीबीआई को सौंपे हैं। इनसे सीबीआई ने प्राथमिक पूछताछ भी की है। 11 जिलों ने अभी तक सचल पालना गृह से जुड़े दस्तावेज नहीं सौंपे हैं। इन्हें सीबीआई ने रिमांइडर भेजा है।

ये जिले हैं- लखनऊ, कानपुर नगर, इलाहाबाद, आगरा, गौतमबुद्ध नगर, चित्रकूट, बलरामपुर, गोंडा, मथुरा, शाहजहांपुर और सिद्धार्थनगर। सीबीआई ने महिला कल्याण विभाग के अधीन आने वाले जिला प्रोबेशन अधिकारी को दस्तावेजों के साथ तलब किया है। वहीं औरैया और फर्रुखाबाद के डीपीओ ने सीबीआई को बताया कि उनके यहां यह योजना चालू ही नहीं हुई। इस मामले में सभी 280 एनजीओ के पदाधिकारियों से भी सीबीआई जल्द पूछताछ करेगी।

लूट के लिए सारे नियम ताक पर
इस योजना में बच्चों के अलावा उनके मजदूर पिता का भी नाम दर्ज करना होता है, लेकिन अधिकतर पालना गृह में मजदूरों का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है।

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