यूपी के नए लोकायुक्त संजय मिश्र ने ली शपथ
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आखिरकार यूपी को 22 महीने बाद लोकायुक्त मिल गया। पूर्व जस्टिस संजय मिश्र ने यूपी के लोकायुक्त के रूप में शपथ ली। उन्हें राज्यपाल राम नाईक ने राजभवन में शपथ दिलाई। इस दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मौजूद थे।
विशेषाधिकार का प्रयोग कर शीर्ष अदालत ने की नियुक्ति
यूपी में लोकायुक्त के नाम पर मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बीच सहमति नहीं बन पाने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने विशेषाधिकार (संविधान के अनुच्छेद-142) का प्रयोग करते हुए इस पद के लिए राज्य सरकार की ओर से भेजे गए पांच नामों में से जस्टिस संजय मिश्रा के नाम पर मुहर लगा दी।
16 दिसंबर को भी अदालत ने इन्हीं पांच नामों में शामिल जस्टिस विरेंद्र सिंह के नाम पर मुहर लगाई थी लेकिन बाद में उसे पता चला कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को जस्टिस सिंह के नाम पर आपत्ति थी।
नए लोकायुक्त संजय मिश्र का सफरनामा
यूपी के नए लोकायुक्त जस्टिस संजय मिश्र इलाहाबाद के मूल निवासी हैं। उनका जन्म 19 नवंबर 1952 को हुआ। उनकी छवि साफ-सुथरी मानी जाती है। उन्होंने दिसंबर 1977 में अपना कॅरिअर शुरू किया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में 24 सितंबर 2004 को उनकी जॉइनिंग हुई थी। उन्हें पहले एडिशनल जज बनाया गया। 18 अगस्त 2005 को वे पूर्णकालिक जज बन गए।
यहां 18 नवंबर 2014 तक सेवा दी। नवंबर 2014 में वे हाईकोर्ट से रिटायर हुए। वे बलरामपुर में एडमिनिस्ट्रेटिव जज भी रह चुके हैं।
एक जज के रूप में लिए गए जस्टिस मिश्रा के अहम फैसले
-यूपी में शिक्षामित्रों की नियुक्ति पर लगाई गई रोक को जायज ठहराने वाला फैसला जस्टिस संजय मिश्रा की ही बेंच ने सुनाया था। कोर्ट ने माना था कि साल 2009-10 में चयनित 355 शिक्षामित्रों को नियुक्ति पाने का वैधानिक अधिकार नहीं है।
-2014 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इंडियन प्रेस काउंसिल के तत्कालीन चेयरमैन मार्कंडेय काटजू के खिलाफ पीआईएल को खारिज कर दिया था। यह पीआईएल पीपुल्स फोरम की ओर से सोशल एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर ने दायर की थी। इसे जस्टिस संजय मिश्रा व जस्टिस बीके श्रीवास्तव की बेंच ने यह कहते हुए खारिज किया था कि इसमें जनहित या लोकहित जैसी कोई वजह नहीं है।
-जस्टिस संजय मिश्रा ने अपने एक फैसले में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को कड़ी फटकार लगाई थी। एमसीआई ने बिना किसी कारण के मौलाना अली मियां इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस कॉलेज में 2014-15 के लिए एमबीबीएस की 150 सीटों पर दाखिले की इजाजत देने से मना कर दिया था। इस मामले में जस्टिस संजय मिश्रा व बीके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने एमसीआई और केंद्र सरकार का आदेश रद्द कर दिया था।
लोकायुक्त के सामने ये होंगी चुनौतियां
नए लोकायुक्त जस्टिस संजय मिश्र के सामने लंबित मामलों का निपटारा करना एक चुनौती होगा। पिछले पांच वर्षों में अफसरों के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें आई हैं, जिनमें से 226 की जांच ही अभी तक नहीं हो पाई है। साथ ही, 29 नगर पालिका अध्यक्षों के खिलाफ शिकायतों की जांच अभी लंबित है।
लोकायुक्त कार्यालय को पिछले पांच वर्षों में 119 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ शिकायतें मिली थीं। इनमें से 88 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ ही जांच हो सकी है। अब भी 31 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जांच लंबित है, जबकि 259 अफसरों के खिलाफ शिकायतें मिली थीं।
इनमें से केवल 33 अफसरों के खिलाफ ही लोकायुक्त जांच कर सके हैं। यानी 226 मामलों की जांच होनी बाकी है। इस लिहाज से नए लोकायुक्त के सामने लंबित प्रकरणों को निपटाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी। अब तक कुल लंबित जांचों को देखा जाए तो इनकी संख्या करीब 3700 है।
ये शिकायतें लोकायुक्त कार्यालय में पड़ी हैं। इनका समय से निस्तारण करना नए लोकायुक्त के सामने किसी चुनौती से कम नहीं होगी।
हालांकि, ज्यादातर बड़े मामले खुद एनके मेहरोत्रा निपटा चुके हैं। सुबूतों के अभाव में मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ जांच को लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा पहले ही बंद कर चुके हैं। अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ मंत्री आजम खां के साथ ही मंत्री महबूब अली, ब्रह्माशंकर त्रिपाठी व नारद राय के खिलाफ भी जांच सुबूतों के अभाव में बंद हो चुकी है।
दादा ने ठुकराया था सुप्रीम कोर्ट जज का पद
सुप्रीमकोर्ट की ओर से नियुक्त इलाहाबाद हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति जस्टिस संजय मिश्र का विवादों से दूर-दूर तक भी नाता नहीं रहा। वह अपने सौम्य स्वभाव और न्यायप्रियता के लिए जाने जाते हैं।
जस्टिस संजय मिश्र का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसकी न्याय जगत में न सिर्फ प्रतिष्ठता है बल्कि उनका कुनबा, देश के उन चुनिन्दा परिवारों में से एक है, जहां लोगों ने विधि के क्षेत्र में एक अलग मुकाम हासिल किया और नजीर बन गए।
जस्टिस मिश्र के दादा स्व.पंडित कन्हैया लाल मिश्र पहले ऐसे अधिवक्ता रहे जिनको सीधे सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाने का प्रस्ताव दिया गया, मगर उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उन्होंने वकालत के पेशे को जो उंचाइयां दीं वह अपने आप में मिसाल है। जस्टिस मिश्र के चाचा न्यायमूर्ति एपी मिश्र सुप्रीमकोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति हैं। जस्टिस एपी मिश्र उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं।
इसके अतिरिक्त बार कौंसिल ऑफ इंडिया की विधिक शिक्षा समिति के अध्यक्ष के तौर पर भी उन्होंने देश में विधि शिक्षा की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दिया। जस्टिस संजय मिश्र के पिता वीपी मिश्र भी वकालत के पेशे में रहे और इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन्होंने लंबे समय तक वकालत की। उनके परिवार के कई अन्य सदस्य भी वकालत के पेशे में ही हैं।