स्वामी प्रसाद मौर्य का इस्तीफा: सपाइयों में बढ़ेगा उत्साह, सियासी चर्चा हुई तेज
स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में शामिल होने की संभावना से पार्टी के कार्यकर्ता उत्साहित हैं। इसके साथ ही चुनाव के लिए प्रदेश में जातीय गोलबंदी और तेज होने के आसार हैं।
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भाजपा से इस्तीफा देकर स्वामी प्रसाद मौर्य व अन्य विधायकों ने प्रदेश में सियासी हलचल बढ़ा दी है। इसके बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से स्वामी प्रसाद की हुई मुलाकात से जहां भाजपा में हलचल बढ़ी है, वहीं सपा कार्यकर्ताओं को खुद के मजबूत होने का धैर्य भी मिला है। मौर्य के बहाने सपा ने कई निशाने भी साधे हैं। इस घटनाक्रम से सपाइयों का उत्साह तो बढ़ेगा ही, साथ ही जातीय गोलबंदी भी तेज होगी।
कोविड की वजह से चुनाव आयोग ने रैलियों पर रोक लगा रखी है। ऐसे में पार्टियों की ओर से वर्चुअल चुनाव प्रचार की रणनीति अपनाई जा रही है। इस बीच होने वाली सियासी घटनाएं प्रदेशभर में हलचल बढ़ा रही हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद सपाइयों में उत्साह है। उनका कहना है कि जमीनी जनाधार वाले नेता के सपा के साथ जुड़ने से पार्टी का वोटबैंक बढ़ना तय है। क्योंकि मौर्य खुद के साथ दूसरे विधायकों को भी लेकर सपा में आ रहे हैं। सपाई इन घटनाओं को रैली पर लगी रोक की भरपाई के तौर पर देख रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सपा मजबूत होगी।
प्रदेश में करीब पांच फीसदी से अधिक मौर्य व कुशवाहा बिरादरी का वोटबैंक माना जाता है लेकिन अब तक इस वोटबैंक का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ रहा है। मौर्य व उनके साथ आने वाले पिछड़ी जाति के अन्य विधायक भी किसी न किसी रूप में अपने समाज की हिस्सेदारी लेकर आएंगे। इसे सपा खुद के लिए फायदेमंद मान रही है।
नए व पुरानों की लामबंदी की बढ़ी चुनौती
सपा में भाजपा एवं बसपा के विधायकों के आने का सिलसिला जारी है। इससे पार्टी में उत्साह तो है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है इन सभी को लामबंद रखना पार्टी के लिए चुनौती होगी। दूसरे दल से सपा में आने वाले विधायक 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ने की बात पक्की करके ही आए होंगे।
पूर्व के चुनाव में सपा के प्रत्याशी रहे सहित अन्य पार्टी नेता भी संबंधित सीट पर दावेदार हैं। ऐसे में आपसी टकराव बढ़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि टिकट वितरण के बाद सपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए इस टकराव को रोकना और सभी को लामबंद रखना चुनौती होगी।