सर्वे में खुलासा: पहले से ज्यादा हरा-भरा हुआ लखनऊ
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राजधानी में बड़े पैमाने पर हो रहे विकास के बीच बीते सालों की बनिस्बत हरियाली में बढ़ोतरी हुई है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ में करीब 17 वर्ग किमी. ग्रीनकवर में इजाफा हुआ है। लेकिन, अभी भी इसे काफी नहीं कहा जा सकता।
मानकों के मुताबिक, शहरी क्षेत्र में न्यूनतम ग्रीनकवर 33 प्रतिशत के मुकाबले राजधानी की गोद में अभी भी 12.2 फीसदी ही हरियाली है। इससे हालात बिगड़ रहे हैं।
डीएफओ श्रद्धा यादव के मुताबिक, राजधानी में प्रभावी रूप से पौधों के संरक्षण और खाली जगहों में व्यापक रूप से पौधरोपण के चलते ग्रीनकवर बढ़ाने में कामयाबी मिली है। आंकड़ों के आइने में देखें तो 2013 की तुलना में 2015 की रिपोर्ट में 17 वर्ग किमी. वनक्षेत्र बढ़ा है। जबकि इस दौरान लखनऊ विकास के दौर में हैं और कई बड़े प्रोजेक्ट निर्माणाधीन हैं।
इस ग्रीनकवर को बढ़ाने में कुकरैल वन क्षेत्र, मूसाबाग और आमपट्टी का बड़ा योगदान है। लखनऊ में इस समय 321 वर्ग किमी. ग्रीनकवर है। 2005 के आंकड़ों के मुकाबले यह 19 वर्ग किमी. बढ़ा है। 2013 तक हरियाली का यह दायरा सिमटकर 237 वर्ग किमी. तक आ गया था। अब पिछले दो साल में हरियाली फिर बढ़त की तरफ जा रही है।
विकास की वजह से कम हुई हरियाली
इस वक्त गोमती नदी के चैनलाइजेशन और सीजी सिटी में नए निर्माण की वजह से काफी संख्या में पेड़ कटे। इनकी वजह से ग्रीनकवर बढ़ाने में मदद नहीं मिल सकी। हालांकि, जनेश्वर मिश्र पार्क, लोहिया पार्क जैसी जगहों ने शहर के अंदर स्थिति को बेहतर करने में मदद की।
अधिकारियों का कहना है कि विकास के बाद यहां ग्रीनकवर को बढ़ाने के और प्रयास शुरू किए जाएंगे। सीजी सिटी तो अब धूल से भरा इलाका नजर आता है। पहले कभी यहां जंगल हुआ करता था।
ये है फैक्ट फाइल
- 2005 में 302 वर्ग किमी.
- 2013 में 237 वर्ग किमी.
- 2016 में 321 वर्ग किमी.
प्रदूषण को कम करने के लिए पेड़-पौधे जरूरी
अर्बन फॉरेस्ट्री नेटवर्क की स्टडी के मुताबिक 10 एकड़ के औसत पार्क की हरियाली से करीब 72 किलोग्राम धूल और दूसरे प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
इसमें 24 किलो धूल के कण, 4.5 किलो नाइट्रोजनडाई ऑक्साइड, 3 किलो सल्फरडाई ऑक्साइड, 250 ग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 50 किलो कार्बन रोजाना कम की जा सकती है।
कई पौधों में तो हेवी मेटल्स को भी सोखने की क्षमता होती है। एक एकड़ में उगे पेड़ इतनी कार्बन सोख सकते हैं, जितनी किसी कार के 26 हजार मील चलने पर पैदा होती है।
ये है इन मोहल्लों की हालत
त्रिवेणीनगर- कोई बड़ा हरियाली भरा पार्क नहीं
विकासनगर- कॉलोनी के पार्कों में हरियाली का स्तर बहुत कम।
अलीगंज- बुद्धा पार्क, सेक्टर क्यू पार्क, कामायनी पार्क, मधुबन उद्यान मौजूद लेकिन हरियाली नाकाफी।
रविंद्रपल्ली- कोई प्रमुख पार्क नहीं।
इंदिरानगर- लिबर्टी कॉलोनी पार्क, सेक्टर ए कॉलोनी पार्क नाकाफी। हरियाली की कमी।
जानकीपुरम- सचिवालय कॉलोनी के पीछे पार्क की जगह लेकिन हरियाली नहीं।
गोमतीनगर- विनीतखंड-3 के पार्क की तरह कॉलोनी के पार्क बदहाल। लोहिया पार्क की वजह से स्थिति बेहतर।
साइकिल ट्रेक भी सुधार रहे पर्यावरण
लखनऊ में बनाए गए साइकिल ट्रेक भी लोगों की सेहत बनाने में योगदान दे रहे हैं। अब तक करीब 100 किमी लंबाई में साइकिल ट्रेक एलडीए और पीडब्ल्यूडी बना चुके हैं। इनमें अधिकतर जगह कोशिश की गई है कि पेड़ों की छांव के बीच से ट्रेक गुजरे।
इससे लोगों को सुविधा के अलावा हरियाली के बीच शुद्ध हवा भी मिल सकेगी। जिला प्रशासन भी लोगों को साइकिल का उपयोग बढ़ाने के लिए जागरूकता पैदा कर रहा है।
बसावट के साथ जरूरी हो ग्रीन कवर
इस पर बीबीएयू के पर्यावरण अध्ययन विभाग की फैकल्टी डॉ. वेंकटेश दत्ता का कहना है कि नए बसे इलाकों में फोकस किया जाना चाहिए। इसकी वजह यह कि यहां बसावट शुरू होने के साथ ग्रीनकवर को जरूरी बनाया जा सकता है।
दूसरी वजह यह है कि यहां पहले से ही ग्रीनरी है। इसे रियल एस्टेट के विकास के नाम पर खत्म न होने दिया जाए। लोगों को समझाना होगा कि शहर का तापमान नियंत्रित रखना है तो पेड़-पौधे बहुत जरूरी हैं।
हवा को साफ करते पेड़-पौधे
वहीं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी कुलदीप मिश्र का कहना है कि पौधों की पत्तियों में फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया के चलते कार्बन सोखने की क्षमता होती है। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन रिलीज होती है।
इसके अलावा पौधों की जड़ों में जहां मिट्टी को बांधने का गुण होता है, वहीं पत्तियों में नमी के चलते धूल और धुंए के कण भी जमा करने का गुण होता है। 33 प्रतिशत ग्रीनकवर के मानक के पीछे वजह यह है कि इतनी हरियाली होने पर शहर की हवा को 60 प्रतिशत तक साफ किया जा सकता है। इससे हमारा शहर रहने लायक बनता है।