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बहुगुणा परिवार की विरासत में कांग्रेस से बगावत

Thu, 20 Oct 2016 05:34 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 20 Oct 2016 05:34 PM IST
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रीता बहुगुणा - फोटो : twitter
कांग्रेस से बगावत बहुगुणा परिवार की फितरत रही है। रीता बहुगुणा जोशी ने आज कांग्रेस छोड़कर इस व‌िरासत को आगे बढ़ाया है।  यूपी में पहले सी ही खस्ताहाल चल रही कांग्रेस को छोड़कर उन्होंने भाजपा का दामन थाम ल‌िया।
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बता दें क‌ि कुछ महीनों पहले उनके भाई विजय बहुगुणा जब कांग्रेस छोड़ी थी तो इसे बहुगुणा परिवार की तीसरी बगावत के तौर पर देखा जा रहा था। रीता के कांग्रेस छोड़ने को लोग चौथी बगावत के तौर पर ले रहे हैं।

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हेमवती नंदन बहुगुणा के सियासी सफर में दो मौके ऐसे आए जब उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। हालांकि वे फिर लौटकर कांग्रेस में आ गए। आपातकाल के दौरान 1977 में हेमवती नदंन ने जगजीवन राम के साथ कांग्रेस के विरोध में एक मोर्चा बनाया जिसे कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी का नाम दिया। यह मोर्चा बहुत दिनों तक नहीं चला तो उन्होंने मोरारजी देसाई के साथ दलित किसान मजदूर संघ बनाकर राजनीति की।

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वर्ष 1980 में हेमवती पौढ़ी गढ़वाल से चुनाव जीत गए थे, लेकिन इंदिरा से विवाद होने पर न सिर्फ सांसदी बल्कि पार्टी भी छोड़ दी। 82 में उपचुनाव हुए तो इसी सीट से फिर जीतकर अपनी धाक दिखाई। हेमवती की इंदिरा गांधी ही नहीं, राजीव से भी नहीं बनी। 1984 में राजीव ने इलाहाबाद से बहुगुणा के मुकाबले अमिताभ बच्चन को चुनाव लड़ाया। हेमवती को करीब दो लाख वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया। इस सदमे से फिर उबर नहीं पाए।

प‌िता के नक्शेकदम पर चले व‌िजय

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विजय बहुगुणा - फोटो : AmarUjala
व‌िजय बहुगुणा भी प‌िता के नक्शेकदम पर चलते द‌िखाई।  सीएम की कुर्सी जाने के बाद उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार से लगातार टकराव के चलते आखिरकार विजय बहुगुणा मई 2016 में भाजपा में शामिल हो गए। हेमवती व उनके बेटे विजय की बगावत में बुनियादी फर्क यह है कि हेमवती ने जब-जब कांग्रेस छोड़ी उनके साथ जनसमर्थन था जो विजय बहुगुणा के कांग्रेस छोड़ने के वक्त नजर नहीं आया। हेमवती का लोगों से सीधा जुड़ाव था जिसके  चलते बगावत के बावजूद वे अपनी अहमियत बनाए रखने में कामयाब रहे जबकि विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बनने के बाद भी आम लोगों से किसी तरह का सीधा संवाद नहीं बना सके। यही वजह है कि उनके साथ लोग खड़े नहीं दिखाई दिए।

बहुगुणा परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाली रीता जोशी भी भाई की राह पर  हैं। जानकारों की मानें तो वह दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को यूपी में सीएम का चेहरा बनाए जाने से आहत हैं। रीता को राजनीति अपने पिता हेमवती से विरासत में मिली। हेमवती यूपी के मुख्यमंत्री रहे हैं जबकि मां कमला बहुगुणा सांसद। रीता जोशी ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की अध्यक्ष के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।

उत्तराखंड में हरीश रावत की सरकार गिराने की कोशिश में जुटे विजय को मनाने का जिम्मा भी कांग्रेस आलाकमान ने रीता को सौंपा था। वह सफल नहीं हुईं तो कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें पहले जैसी अहम‌ियत नहीं दे रहा था।

देखें रीता की राजनीत‌िक पारी

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रीता बहुगुणा
इलाहाबाद विवि में इतिहास की प्रोफेसर रही डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने अपनी राजनीतिक पारी संयुक्त मोर्चे के झंडे तले शुरू की और इलाहाबाद की मेयर बनीं।

इसके बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी जॅाइन कर ली। रीता ने 1991 में सुल्तानपुर लोक सभा से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सकी। उसके बाद सपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गईं। रीता ने इलाहाबाद से डॉ. मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ  भी चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

2007 में उन्होंने इलाहाबाद पश्चिमी से विधानसभा का चुनाव लड़ा जिसमें बसपा के नंद गोपाल नंदी से हार र्गईं। इसके बाद उन्होंने लखनऊ को चुनावी राजनीति का केंद्र बनाया और 2012 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ की कैंट विधान सभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बनीं।
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