बहुगुणा परिवार की विरासत में कांग्रेस से बगावत
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बता दें कि कुछ महीनों पहले उनके भाई विजय बहुगुणा जब कांग्रेस छोड़ी थी तो इसे बहुगुणा परिवार की तीसरी बगावत के तौर पर देखा जा रहा था। रीता के कांग्रेस छोड़ने को लोग चौथी बगावत के तौर पर ले रहे हैं।
हेमवती नंदन बहुगुणा के सियासी सफर में दो मौके ऐसे आए जब उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। हालांकि वे फिर लौटकर कांग्रेस में आ गए। आपातकाल के दौरान 1977 में हेमवती नदंन ने जगजीवन राम के साथ कांग्रेस के विरोध में एक मोर्चा बनाया जिसे कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी का नाम दिया। यह मोर्चा बहुत दिनों तक नहीं चला तो उन्होंने मोरारजी देसाई के साथ दलित किसान मजदूर संघ बनाकर राजनीति की।
वर्ष 1980 में हेमवती पौढ़ी गढ़वाल से चुनाव जीत गए थे, लेकिन इंदिरा से विवाद होने पर न सिर्फ सांसदी बल्कि पार्टी भी छोड़ दी। 82 में उपचुनाव हुए तो इसी सीट से फिर जीतकर अपनी धाक दिखाई। हेमवती की इंदिरा गांधी ही नहीं, राजीव से भी नहीं बनी। 1984 में राजीव ने इलाहाबाद से बहुगुणा के मुकाबले अमिताभ बच्चन को चुनाव लड़ाया। हेमवती को करीब दो लाख वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया। इस सदमे से फिर उबर नहीं पाए।
पिता के नक्शेकदम पर चले विजय
बहुगुणा परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाली रीता जोशी भी भाई की राह पर हैं। जानकारों की मानें तो वह दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को यूपी में सीएम का चेहरा बनाए जाने से आहत हैं। रीता को राजनीति अपने पिता हेमवती से विरासत में मिली। हेमवती यूपी के मुख्यमंत्री रहे हैं जबकि मां कमला बहुगुणा सांसद। रीता जोशी ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की अध्यक्ष के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
उत्तराखंड में हरीश रावत की सरकार गिराने की कोशिश में जुटे विजय को मनाने का जिम्मा भी कांग्रेस आलाकमान ने रीता को सौंपा था। वह सफल नहीं हुईं तो कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें पहले जैसी अहमियत नहीं दे रहा था।
देखें रीता की राजनीतिक पारी
इसके बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी जॅाइन कर ली। रीता ने 1991 में सुल्तानपुर लोक सभा से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सकी। उसके बाद सपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गईं। रीता ने इलाहाबाद से डॉ. मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ भी चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
2007 में उन्होंने इलाहाबाद पश्चिमी से विधानसभा का चुनाव लड़ा जिसमें बसपा के नंद गोपाल नंदी से हार र्गईं। इसके बाद उन्होंने लखनऊ को चुनावी राजनीति का केंद्र बनाया और 2012 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ की कैंट विधान सभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बनीं।