7 बड़ी वजहें, न चेती तो और भुगतेगी भाजपा
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16 मई को लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो भाजपा जीत की खुमारी में डूब गई। पार्टी बड़े-बड़े दावे करने लगी।
2017 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माने जा रहे उपचुनाव को लेकर भी यही बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन ठीक चार महीने बाद विधानसभा की 11 व लोकसभा की मैनपुरी सीट के उपचुनाव के आए नतीजों से उसकी नीति, रणनीति व दावों की पोल खुल गई।
प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटों में गठबंधन के अपना दल सहित 73 सीटें जीतने वाली पार्टी विधानसभा की अपनी सीटें भी नहीं बचा पाई।
पार्टी के कब्जे वाली 10 में से आठ सीटें समाजवादी पार्टी ने अपनी झोली में डाल ली। सहयोगी दल अपना दल भी भाजपा के साथ होने के बावजूद अपनी सीट नहीं बचा पाया।
वह भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क्षेत्र में। भाजपा को सिर्फ तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा।
दूसरी वजह: जमीनी सच्चाई से दूर
उपचुनाव के नतीजे भगवा खेमे के लिए कड़े संदेश व सबक लेकर आए हैं। प्रदेश भाजपा को बयान बहादुरों से मुक्ति दिलानी होगी।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी यूपी को लेकर नए सिरे से और ईमानदारी से आत्ममंथन करना होगा, क्योंकि उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी दिलाने में अगर यूपी के लोकसभा चुनाव के नतीजों का योगदान रहा है तो विधानसभा उपचुनाव के हार की जिम्मेदारी भी उन्हें लेनी ही होगी।
शाह या भाजपा ने सबक न लिया तो आगे भाजपा को इससे भी बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी और पार्टी के अन्य नेता तर्क दे रहे हैं कि उपचुनाव में तो सत्तारूढ़ दल की जीत होती ही है।
पर, पूरे उपचुनाव के दौरान भाजपा नेता पार्टी की जीत के दावे करते रहे थे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से लेकर प्रदेश अध्यक्ष डॉ. वाजपेयी तक ने विधानसभा उपचुनाव में सपा का सूपड़ा साफ कर देने का दावा किया था। जमीनी सच्चाई से दूर बड़े दावे करने की ये फितरत नुकसानदेह हो सकती है।
तीसरी वजह: ले डूबेगा लालच और अंतर्कलह
उपचुनाव के दौरान प्रचार से लेकर चुनाव प्रबंधन तक भाजपा गंभीर नहीं दिखी। इससे ही लग रहा था कि लोकसभा चुनाव में मिली भारी जीत की खुमारी पार्टी नेताओं के सिर से जल्द उतरने वाली नहीं है।
उपचुनाव के टिकट तय करने के लिए न तो चुनाव समिति की बैठक की गई और न कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करने के दावे पूरे किए गए।
सपा ने जहां काफी पहले से ही अपने उम्मीदवार उतार दिए थे, वहीं भाजपा के टिकट नामांकन प्रक्रिया खत्म होने से एक दिन पहले घोषित हो पाए। इनमें भी कई अनजान व अनाम चेहरे दिखे।
रही-सही कसर पूरी कर दी नेताओं व सांसदों की खींचतान ने। कई सांसद अपने त्यागपत्र से खाली सीटों पर परिवार या अपने किसी नजदीकी को टिकट दिलाना चाहते थे।
टिकट नहीं मिला तो सांसद चुनाव में लगे ही नहीं। निघासन (खीरी) में उपचुनाव हारने वाले रामकुमार वर्मा पटेल ने खीरी से सांसद अजय मिश्र टेनी पर इसी तरह का आरोप लगाया है।
चौथी वजह: बड़े नेताओं की बेरुखी
पार्टी ने सांसदों को उनकी सीट का प्रभारी तो बना दिया लेकिन इस बात की चिंता किसी ने नहीं की कि सांसद पहुंच भी रहे हैं या नहीं।
नतीजतन सांसद या तो क्षेत्र में गए ही नहीं या फिर औपचारिकता निभाकर लौट आए। इनमें राजनाथ सिंह व उमा भारती जैसे बड़े नेता भी शामिल हैं। भाजपा ने लखनऊ पूरब सीट भले ही जीत ली, लेकिन यहां भी यही हुआ।
पार्टी ने पहले कलराज मिश्र को यहां प्रभारी बनाया, बाद में उन्हें सभी सीटों पर प्रचार के लिए भेजना शुरू कर दिया। नतीजतन कलराज मिश्र ने लखनऊ पूरब में सिर्फ एक ही दिन दिया।
उमा भारती अपने क्षेत्र चरखारी गईं ही नहीं। राजनाथ सिंह भी लखनऊ से दूर रहे। बलहा, निघासन जैसी सीटों पर भी यही हुआ।
दूसरे क्षेत्रों के जो सांसद लगाए गए, उनमें भी कई ने तो औपचारिकता निभाने की भी जरूरत नहीं समझी। यूपी को लक्ष्य मान रहे अमित शाह भी नहीं आए। ऐसे में इस तरह के नतीजे तो आने ही थे।
पांचवीं वजह: रणनीतिकार फेल हुए
जिन सीटों पर भाजपा को धूल चाटनी पड़ी है उन सभी पर 2012 के चुनाव में पार्टी के ही विधायक जीते थे। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि जिन सीटों पर चुनाव हुआ है, उन सीटों से विधायक चुने गए सभी भाजपा नेता सांसद हैं।
इनमें कलराज मिश्र, उमाभारती व साध्वी निरंजन ज्योति को छोड़कर शेष सभी लोकसभा के जिन क्षेत्रों से सांसद चुने गए हैं, उनमें ही विधानसभा उपचुनाव वाली वह सीटें भी आती हैं, जिनसे वह 2012 में विधायक चुने गए थे।
सभी पर लोकसभा चुनाव की अपेक्षा काफी कम वोट मिले हैं। उपचुनाव नतीजों को अगर भाजपा के लिए भविष्य का संकेत मानें तो जनता ने साफ कर दिया है कि उसने जिन अपेक्षाओं के साथ भाजपा को लोकसभा चुनाव में समर्थन दिया था, उस कसौटी पर केंद्र सरकार या भगवा दल के रणनीतिकार कहीं न कहीं फेल हुए हैं।
छठी वजह: सामाजिक समीकरणों की अनदेखी
प्रत्याशी उतारने में सामाजिक समीकरणों की अनदेखी भी भाजपा पर भारी पड़ी है। हमीरपुर से 2012 में विधायक चुनी गईं साध्वी निरंजन ज्योति निषाद हंै।
पर, पार्टी ने यहां एक अनाम से चेहरे जगदीश व्यास के रूप में ब्राह्मण को मैदान में उतारा। इसके विपरीत जिन चार सीटों पर 2012 में ब्राह्मण विधायक जीते थे, वहां से दूसरे वर्गों के उम्मीदवार उतारे गए।
भाजपा नेताओं ने इसी का नहीं दूसरे समीकरणों का भी ध्यान नहीं रखा। उदाहरण के लिए चरखारी में लोध के खिलाफ लोध तो पटेल के विरुद्ध पटेल उतार दिया।
नतीजों से साफ हो गया है कि भाजपा को बड़े बदलाव करने पड़ेंगे। रणनीति से लेकर संगठन तक। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि भाजपा यह समझ ही नहीं पाई कि लोकसभा चुनाव में पार्टी को उत्तर प्रदेश में मिली भारी जीत सपा, बसपा और कांग्रेस की नीतियों से उकताहट की विजय थी।
वह विजय न तो भाजपा के प्रदेश नेताओं की मेहनत की जीत थी और न रणनीति की। लोगों ने मोदी के चेहरे पर भरोसा करके वोट दिया था। यही वजह रही कि जब प्रदेश नेताओं की परीक्षा आई तो वे फेल हो गए। भाजपा की रणनीति के सारे दावे सिर्फ कागजों में ही सिमटकर रह गए।
सातवीं वजह: विकास से जिहाद का सफर
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक समीक्षक रतनमणि लाल कहते हैं कि भाजपा ने चुनाव लड़ने का मॉडल बदला तो जनता ने मूड बदल लिया।
लोकसभा चुनाव में सपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे लड़ रही थी और भाजपा विकास के सपने दिखा रही थी। इसके विपरीत उपचुनाव में भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे मैदान मारने की कोशिश की तो सपा ने लोकसभा नतीजों से सबक लेते हुए विकास की बातें कीं।
सिर्फ एक मुसलमान उम्मीदवार उतारा। मो. आजम खां को भी ज्यादा जगह नहीं भेजा। इसके विपरीत भाजपा शुरू में तो प्रचार को लेकर हाथ पर हाथ धरे बैठी रही।
बाद में उसने योगी आदित्यनाथ के जरिये ध्रुवीकरण की कोशिश की। नतीजा सामने है। भाजपा को नीतियों में बदलाव करना होगा। ऐसे नेताओं को आगे करना होगा जो खोखले दावे करने के बजाय जनता के बीच विश्वसनीय छवि के लिए जाने-जाते हों।