Karhal Vidhan Sabha Seat: करहल के अखाड़े में मुलायम के बेटे अखिलेश यादव और शिष्य की परीक्षा
मैनपुरी की करहल सीट पर सपा से खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव मैदान में हैं तो भाजपा से केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल ताल ठोक रहे हैं।
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करहल सीट पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं। ये वही करहल है, जहां से मुलायम सिंह ने पहले शिक्षा प्राप्त की और फिर शिक्षण कार्य भी किया। इसी करहल के अखाड़े में उन्होंने पहलवानी के दांवपेच सीखे। वह पहलवान जिसने सियासी अखाड़े में सूरमाओं को धूल चटाई। करहल की सियासत का अखाड़ा वही है, लेकिन अब पहलवान बदल चुके हैं। एक ओर जहां मुलायम सिंह के बेटे पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हैं, तो दूसरी ओर मुलायम के शिष्य एसपी सिंह बघेल हैं। सभी को इस सियासी अखाड़े के विजेता पहलवान का इंतजार है।
करहल ऐसे ही सपा का गढ़ नहीं बना। मुलायम सिंह के जातिगत दांव ने यहां हर बार सियासी समीकरणों को पलटकर रख दिया। यह सीट यादव बहुल है। यही वजह है कि यहां सपा की मजबूत किलेबंदी है। वर्ष 1992 में मुलायम सिंह यादव के पार्टी बनाने के बाद से सपा ने इस सीट पर अब तक छह चुनाव लड़े हैं, जिसमें से पांच चुनाव जीते भी। वोटों के समीकरण की बात करें तो करहल विधानसभा सीट पर 3,71261 मतदाता हैं। इनमें यादव मतदाताओं की संख्या 1.25 लाख के करीब है। वर्ष 2017 में सपा के टिकट पर सोबरन सिंह यादव ने 1,04,221 वोट हासिल करके जीत हासिल की थी। उन्होंने यादव वोट बैंक के सहारे ही भाजपा प्रत्याशी रमा शाक्य को हराया था।
भाजपा की उम्मीदें ध्रुवीकरण पर टिकीं हैं। करहल सीट पर दूसरे स्थान पर शाक्य, बघेल और तीसरे स्थान पर क्षत्रिय मतदाता हैं। शाक्य और क्षत्रिय मतदाता को भाजपा अपना कोर वोटर मानती है। बघेल प्रत्याशी होने से 30 हजार बघेल मतदाताओं पर भी भाजपा की पकड़ बढ़ गई है। जातीय समीकरणों के लिहाज से ही भाजपा नेे एसपी सिंह बघेल को मैदान में उतारा है। भाजपा दलित वोट बैंक में भी सेंध लगाने में जुटी हुई है। वहीं, बसपा से कुलदीप नरायन चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। ऐसे में करहल सीट पर सिर्फ तीन प्रत्याशी मैदान में हैं, क्योंकि आठ प्रत्याशियों के नामांकन निरस्त हुए हैं। कुल मिलाकर करहल सीट का रण दिलचस्प है। यहां सपा और भाजपा दोनों ही दलों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। बहरहाल, किस दल का जातीय समीकरण सटीक बैठता है, इसका फैसला 10 मार्च को मतगणना के दिन होगा।
सिर्फ एक-एक बार कांग्रेस और भाजपा ने चखा जीत का स्वाद
करहल विधानसभा सीट का शुरू से सियासी मिजाज अलग ही रहा। जब देश में कांग्रेस की लहर चलती थी तब यहां प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी, भारतीय क्रांति दल और जनता पार्टी का सिक्का चलता रहा। पहली बार 1980 में कांग्रेस के शिवमंगल सिंह ने उलटफेर किया। पर, इसके बाद कांग्रेस फिर यहां लौटकर नहीं आई। 1985 से 1996 तक बाबूराम यादव यहां से लगातार पांच बार विधायक चुने गए। हालांकि, वे 1985 में लोकदल, 1989 में जनता दल, 1991 में जनता पार्टी (सेक्युलर), 1993 और 1996 में सपा से जीते। वर्ष 2002 में सोबरन सिंह यादव ने यहां भाजपा का खाता खोला। पर, इसके बाद उन्होंने पाला बदल लिया और सपा में चले गए। 2007, 2012 और 2017 में लगातार तीन बार वे सपा के टिकट पर विधायक चुने गए। अलबत्ता बसपा इस सीट पर कभी जीत का स्वाद का नहीं चख सकी।
क्या हैं प्रमुख मुद्दे
- फैक्टरी-उद्योग नहीं होने से क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ी है।
- किसान आलू आधारित उद्योग की मांग वर्षों से कर रहे हैं।
- विधानसभा क्षेत्र के कई गांवों में आज भी सड़कें कच्ची हैं।
- सीएचसी और पीएचसी पर इलाज की बेहतर सुविधा नहीं है।
- आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के किनारे बनी मंडी चालू नहीं हो सकी।
2017 का चुनाव परिणाम
सोबरन सिंह यादव, सपा - 1,04,221
रमा शाक्य, भाजपा - 65,816
दलवीर सिंह पाल, बसपा - 29,676
कौशल यादव, रालोद - 4,683