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दंगों में हुआ था महिलाओं से दुराचार

Wed, 09 Oct 2013 12:22 PM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
टीम डिजिटल/लखनऊ Updated Wed, 09 Oct 2013 12:22 PM IST
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rape in muzaffarnagar riots

मुजफ्फरनगर-शामली के दंगों में न केवल 62 लोग मारे गए बल्कि बलवाइयों ने बड़ी संख्या में महिलाओं से दुराचार भी किया।

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इनमें से सिर्फ पांच महिलाओं ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई है। अधिकतर महिलाएं और लड़कियां रिपोर्ट नहीं लिखवा रहीं।

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) की लखनऊ और दिल्ली इकाई की छह सदस्यीय टीम के सामने दंगा प्रभावित विस्थापितों के कैंपों में ऐसी कई दर्दनाक हकीकत बयां की गईं।

पढ़ें-आयोग ने शुरू की मुजफ्फरनगर दंगे की जांच
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टीम का कहना है कि दंगों में मरने वालों की संख्या कई गुना अधिक हो सकती है। बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों के बिछुड़ जाने की रिपोर्ट दर्ज करवाई है।
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टीम में एडवा की प्रांतीय अध्यक्ष मधु गर्ग के अलावा एडवा दिल्ली महासचिव सहबा फारूखी, उपाध्यक्ष मैमूना मुल्ला, कोषाध्यक्ष अंजना झा, कार्यकारी अध्यक्ष आशा शर्मा और लखनऊ जिला सचिव सीमा राणा शामिल थे।

स्टडी रिपोर्ट जारी करते हुए मधु गर्ग ने बताया कि टीम ने बुढ़ाना तहसील के जोगियाखेड़ा और लोई गांवों के राहत शिविरों का दौरा किया। यहां करीब 5,200 लोग शरण लिए हुए हैं।

प्रभावित लोगों से बातचीत में सामने आया कि 8 सितंबर को सुबह बड़ी संख्या में बलवाई आए और गांवों पर हमले किए।

गांव वालों ने फोन करके फुगाना थाना के एसएचओ ओमवीर सिंह से मदद मांगनी चाही, लेकिन उनका फोन नहीं उठा। इस थाने पर फुगाना, खरड़, लाक, लिसाड़, बहावड़ी आदि गांवों की सुरक्षा का जिम्मा था।

पीड़ितों ने बताया कि कई पीढ़ियों से जो परिवार साथ रह रहे थे, वही आपस में दुश्मन हो गए।

जिन पांच लड़कियों और महिलाओं ने अपने साथ दुराचार की रिपोर्ट दर्ज करवाई, उनका कहना था कि दुराचार करने वाले उन्हीं के गांव के लड़के थे जो 5 से 8 के समूह में हथियारों के साथ आए थे।

किसी पर कार्रवाई नहीं
घटना के एक महीने बाद भी रिपोर्ट दर्ज करवाने वाली पीड़ितों में से सिर्फ तीन का मेडिकल करवाया गया। किसी का भी 164 का बयान दर्ज नहीं हुआ है। दुराचार करने वाले गांव में खुलेआम घूम रहे हैं।

एफआईआर में नाम होने के बावजूद पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर रही है। कैंपों में हजारों लोग, लड़कियां और अधिकतर परिवार सिर्फ आलू, चावल खाकर दिन काट रहे हैं।

बलवाइयों के डर से वे अपने घर नहीं जाना चाहते। जो बच्चे, लड़कियां और बुजुर्ग लापता हुए थे, उनकी कोई खबर नहीं है। आशंका है कि उनकी हत्या की जा चुकी है। सभी पीड़ित कमजोर तबके से हैं।

 
मदद करने वालों पर कयामत टूटी
बलवाई बेहद सुनियोजित तरीके से हमले कर रहे थे। जिस गांव में जो समुदाय अल्पसंख्यक था, अगर बहुसंख्यक समुदाय के किसी परिवार ने उसकी मदद की तो उस परिवार पर भी कयामत टूटी।

फुगाना के कुछ पीड़ितों ने आस मोहम्मद की कहानी सुनाई कि जब उन पर हमला हुआ तो उसने भाग कर एक जाट परिवार के पास शरण ली।

बलवाई वहां पहुंच गए और उसे बचाने वाले परिवार के नवजात बच्चे को छत से नीचे फेंक दिया और आस मोहम्मद की हत्या कर दी।

लोई बना मिसाल
आसपास के करीब 42 गांवों के 3,500 लोग फिलहाल लोई में बने राहत शिविर में रह रहे हैं। यहां दोनों प्रमुख समुदायों के लोग राहत समिति बनाकर उनकी मदद कर रहे हैं। अधिकतर शिविर बांस और पॉलीथिन के बने हैं।

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