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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Ramlala will be seen in ram temple after 500 years in Ayodhya.

500 साल बाद भव्य राममंदिर में विराजेंगे रामलला, बाबर के आदेश पर तबाह हो गई थी अयोध्या

Fri, 07 Feb 2020 03:51 PM IST
ishwar ashish धीरेंद्र कुमार सिंह, अमर उजाला, अयोध्या
धीरेंद्र कुमार सिंह, अमर उजाला, अयोध्या Published by: ishwar ashish Updated Fri, 07 Feb 2020 03:51 PM IST
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Ramlala will be seen in ram temple after 500 years in Ayodhya.
अभी टाट में हैं रामलला। - फोटो : अमर उजाला

संबत सर वसु बान भर नभ, ग्रीष्म ऋतु अनुमानि।

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तुलसी अवधहिं जड़ भवन, अनरथ किए अनखानि।।

पांच सौ साल पुराने इस कालिमा को गोस्वामी तुलसीदास ने अपने दोहा सतक में वर्णन किया है। बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीरबाकी द्वारा श्रीरामजन्मभूमि मंदिर ढहाने और भीषण कत्लेआम से पूरी अयोध्या तबाह हुई थी। बाद में 134 साल तक अदालती मुकदमे में रामलला न्याय मांगते रहे।

23 मार्च 1528 से पहले श्रीरामजन्मस्थान मंदिर परिसर का व्यवस्थापन श्री पंचरामानंदीय निर्मोही अखाड़ा के पास था, लेकिन 1524 में महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) को हराकर बाबर दिल्ली में तख्तनशीं हुआ। बाबर ने 1528 में दल-बल के साथ अयोध्या के शेखा घाघरा संगम पर डेरा डाला था।
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फकीर फजल अब्बस कलंदर और मूसा आसिकान से दुआ मांगने गया तो उसे श्रीरामजन्मस्थान पर मंदिर बनाने के बाद ही दुआ कबूल करने की शर्त रखी गई थी। इसके बाद मीर बाकी ने बाबर का हुकुमनामा लेकर अयोध्या कूच किया। 17 दिन तक चले युद्ध में हिंदुओं की हार हुई। मंदिर बचाने में 1 लाख 72 हजार हिंदू शहीद हुए। इस दृश्य को गोस्वामी तुलसी दास ने कुछ यूं लिखा-
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बाबर बर्बर आईके, कर लीन्हे करवाल। हने पचारि पचारि जनतुलसी काल कराल।।
रामजन्म मंदिर महि तोरि मसीत बनाय। जबहिं बहु हिंदुन हते, तुलसी कीन्हो हाय।।
दल्यो मीरबाकी अवध, मंदिर राम समाज। तुलसी रोवत ह्रदय अति त्राहि-त्राहि रघुराज।।

तहस-नहस करने के बाद इसे हासिल करने के लिए तमाम संघर्ष हुए

Ramlala will be seen in ram temple after 500 years in Ayodhya.

इतिहासकार बताते हैं कि रामजन्मभूमि तहस-नहस करने के बाद इसे हासिल करने के लिए तमाम संघर्ष हुए। लेकिन अदालती लड़ाई शुरू हुई 1885 से। इसके पहले राजा मान सिंह के कहने पर नवाब वाजिद अली ने 1855 में मंदिर विवाद सुलझा लिया था।

रामजन्म स्थान पर मंदिर नहीं होने का निर्णय दिया था। मगर अंग्रेजों ने इसे फिर हिंदू-मुसलमान विवाद बनाते हुए रोटी सेंकनी शुरू कर दी। पहली बार बाबरी मस्जिद और श्रीरामजन्मभूमि का मामला जिला न्यायालय में दीवानी वाद के रूप में क्र.17/1885 प्रस्तुत हुआ।

19 मार्च 1949 को श्री पंचरामानंदीय निर्मोही अखाड़ा का पंजीकृत न्यास और उसके 15 ट्रस्टी बनने के बाद मामला नए सिरे से गर्म होने लगा। अक्तूबर 1949 में अयोध्या में रजवाड़े के सामने हुई एक सभा में दिगंबर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्र दास, बाबा अभिराम दास, ठा. गोपाल सिंह आदि की उपस्थिति में बाबा अभिराम दास और महंत रामचंद्र दास को जब रामजन्मस्थान पर बोलने का मौका नहीं मिला तो वे सभा छोड़कर चले गए।

इन संतों पर लगा मूर्तियां स्थापित करने का आरोप

Ramlala will be seen in ram temple after 500 years in Ayodhya.

23 दिसंबर 1949 को तड़के 4 बजे विराजमान रामलला में हुई घटना के बाद संत अभिराम दास, वृंदावन दास, रामशुभग दास, रामसकल दास, राम विलास दास, सुदर्शन दास पर मूर्तियां स्थापित करने का आरोप लगा।

डीआईजी सरदार सिंह ने जिलाधिकारी को मूर्ति हटाने का आदेश दिया गया। गर्भगृह में प्रशासन ने ताला जड़ दिया। डीएम ने विवादग्रस्त वास्तु घोषित करते हुए धारा 145 के अंतर्गत 29 दिसंबर 1949 को परिसर कुर्की के साथ 200 गज परिसर में गैर हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया। पूजा-भोग की व्यवस्था के लिए चार पुजारी नियुक्त कर लोहे के शिकंजे के बाहर से दर्शन की व्यवस्था की गई थी।

अदालत ने 1955 में दिए मूर्ति की यथास्थिति के निर्देश

Ramlala will be seen in ram temple after 500 years in Ayodhya.

हिंदू महासभा के जिलाध्यक्ष गोपाल सिंह विशारद ने दीवानी न्यायालय में 16 जनवरी 1950 को प्रतिबंध के खिलाफ अपील की। प्रशासन के अधिकारियों समेत जहूर अहमद, हाजी फेकू टेढ़ीबाजार के मो. फायत, रायगंज के मो. शमी, चूड़ी वाला कटरा के मो. अच्छन मियां को प्रतिवादी बनाया। कोर्ट ने 26 अप्रैल 1955 को अंतिम निर्णय तक मूर्ति आदि की व्यवस्था जैसी है वैसी ही सुरक्षित रखने और पूजा, उत्सव, दर्शन जैसे हो रहे हैं, वैसे होते रहने का आदेश दिया।

इसके बाद 1962 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने हिंदू महासभा और निर्मोही अखाड़ा द्वारा रखी गई मूर्तियां हटाने की याचिका दायर की। 7 अक्तूबर 1984 को मंदिर में लगे ताला को खोलने की मांग करते हुए सरयू किनारे जनसभा हुई। 31 जनवरी 1986 को जिला न्यायालय में ताला खोलने की मांग की गई। एक फरवरी 1986 को न्यायमूर्ति कृष्णमोहन पांडेय ने श्रीराम जन्ममंदिर में लगा ताला खोलने का आदेश दिया।

केंद्र में भाजपा सरकार आने पर 67.77 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ढहाया गया। मामले में 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया।

एक हिस्सा विराजमान रामलला पक्ष को, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने का आदेश हुआ। बाद में सभी पक्षों ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। जहां से 9 नवंबर 2019 को रामलला के पक्ष में आदेश आया।

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