Ayodhya Ram Mandir Bhumi Pujan: मंदिर का सपना पूरा...अब रामराज की लड़ाई

अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 05 Aug 2020 09:40 AM IST
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उमा भारती
उमा भारती - फोटो : पीटीआई

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मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के ग्राम डुडा में एक खुशहाल लोधी राजपूत किसान परिवार में जन्म हुआ। छह भाई-बहनों में मैं सबसे छोटी एवं लाडली थी। मेरी याददाश्त बहुत अच्छी थी। गांव में रामायण व गीता के पाठ सुनाए तो वह भी याद हो गया। जब मैं 8 साल की थी, तब 1969 में अयोध्या के संतों ने प्रवचन सुनाने के लिए मुझे भी बुलाया। महंत रामचंद्र दास परमहंस मुझे राम जन्मभूमि दिखाने ले गए। वहां ताला लगा था। मैंने रामलला को दूर से देखा। मेरे बालमन में जो सवाल आए, मैंने महंतजी से पूछे तथा उन्होंने जो बताया, उससे मुझे लगा कि यह तो हिंदू समाज पर बड़ा अन्याय है।
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1970 में ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने मुझे अपनी छत्रछाया में ले लिया। इसी कारण मेरा संघ के स्वयंसेवकों एवं जनसंघ के नेताओं से आत्मीय संपर्क  हो गया। 1977 से 81 तक लगभग 60 प्रमुख देशों में मैंने हिंदू धर्म का प्रचार किया। संघ के स्वयंसेवकों एवं अब भाजपा बन चुकी जनसंघ के नेताओं से निरंतर संपर्क बना रहा।
फिर कोर्ट के आदेश से राम जन्मभूमि का ताला खुला। प्रतिक्रिया में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनी, जिसमें कई राजनीतिक दलों के नेता सदस्य थे। उन्होंने कोर्ट का आदेश मानने से इनकार करते हुए राम जन्मभूमि पर नमाज पढ़ने की घोषणा कर दी। तब विहिप ने मुझसे संपर्क  किया तथा घेराबंदी के लिए हम सब अयोध्या के आसपास के जिलों में एकत्रित हो गए। मैं तब तक भाजपा में आ चुकी थी। विहिप का राम जन्मभूमि आंदोलन भी जोर पकड़ने लगा था।
1989 में मैंने खजुराहो लोकसभा सीट से चुनाव जीता। जून 1990 में विहिप का मार्गदर्शक मंडल बना। मैं भी उसकी सदस्य बनी। 31 अक्तूबर 1990 को कारसेवा की घोषणा हुई। आडवाणीजी ने रथयात्रा की घोषणा की। हम सब 31 अक्तूबर 1990 को अयोध्या की ओर बढ़े। चित्रकूट में विजयाराजे सिंधिया के साथ गिरफ्तार करके हमें बांदा में 50 हजार कारसेवकों के साथ रखा गया। पूरे बांदा नगर को ही जेल मान लिया गया। पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस में हमें रखा गया। वहीं, टीवी पर 31 अक्तूबर को मैंने यह समाचार सुना कि अयोध्या में हजारों कारसेवक कर्फ्यू तोड़कर पहुंच गए। 

सिर मुंडवाकर जेल से अयोध्या पहुंच गई

अशोक सिंहल घायल हो गए एवं अयोध्या निवासी वासुदेव हलवाई (अग्रवाल) ने बाबरी ढांचे पर केसरिया पताका फहरा दी। पुलिस ने उन्हें गोली मारकर नीचे गिरा दिया किंतु केसरिया पताका फहराता रहा। मुझे लगा कि मैंने पूरे देश का भ्रमण करके जिनका आह्वान किया, वे तो अयोध्या पहुंच गए और मैं वीआईपी सुविधाओं वाली जेल में हूं।

इसलिए मैं अपना सिर मुंडवाकर, भेष बदल कर अपने बड़े भाई के साथ बांदा की जेल से रात 12 बजे अयोध्या के लिए निकल गई। हम सुबह 8 बजे मणिराम दास छावनी पहुंच गए। वहां पहले से ही अशोक सिंहल, महंत नृत्य गोपाल दास, स्वामी वामदेव, परमहंसजी मौजूद थे। इसके बाद 2 नवंबर 1990 की कारसेवा की तैयारी हुई।

हजारों कारसेवकों का जत्था जानकी कुटीर के मार्ग से हनुमानगढ़ी होते हुए राम जन्मभूमि के लिए चल पड़ा। पूरी अयोध्या में कर्फ्यू था। हनुमानगढ़ी से पहले पुलिस थाने के पास भीषण संघर्ष हुआ, मेरे साथ हजारों लोग घायल हुए। हमें गिरफ्तार कर अयोध्या थाने में रखा गया तथा हमारे साथ के कारसेवकों को बसों में भरकर विभिन्न जेलों में भेज दिया गया। मुख्य सड़क पर आने से पहले पुलिस से उनका भारी संघर्ष हुआ, जिसमें कोलकाता के दो नौजवान राम एवं शरद कोठारी तथा कुछ कारसेवक शहीद हो गए। 

मुझे मरा मान महिलाओं ने जेल घेर लिया

थाने से मुझे फैजाबाद जेल लाया गया। वहां से नैनी जेल की महिला बैरक में शिफ्ट कर दिया गया। नैनी ले जाने वाली सीआरपीएफ की महिला कमांडेंट ने जानकारी दी कि फैजाबाद नगर की महिलाओं ने जेल को घेर लिया था। उन्हें भय था कि मुझे जेल के अंदर मरा हुआ लाया गया है, इसलिए मुझे शिफ्ट कराकर वहां की महिला जेलर से मेरे जीवित होने की तस्दीक करा दी गई। जेल में बंद किए गए कल्याण सिंह एवं कलराज मिश्र से मेरी मुलाकात कराई गई। कुछ दिन नैनी जेल में रहने के बाद हम सब रिहा करके सरकारी हवाई जहाज से दिल्ली भेजे गए।

राजनीति का केंद्र बिंदु बना मंदिर मुद्दा

इसके बाद तो जैसे पूरे देश और दुनिया में राम भक्ति की ज्वाला भड़क उठी। फिर लोकसभा के चुनाव हुए। मैं खजुराहो से फिर जीती। वीपी सिंह की सरकार गिरी। प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार गिरी। कल्याण सिंह की सरकार बनी। इसके बाद संसद के अंदर तथा पूरे देश में राजनीति का केंद्र बिंदु जैसे यही विषय हो गया। मैंने 17 नवंबर 1992 को संन्यास की दीक्षा ली तथा अशोक सिंहल के आह्वान पर 1 दिसंबर से 6 दिसंबर, 1992 तक मैं अयोध्या में रही। 7 दिसंबर को हम दिल्ली पहुंचे एवं 8 दिसंबर को आडवाणीजी एवं जोशीजी के साथ मुझे भी गिरफ्तार कर पहले आगरा, फिर नैनी और बाद में माताटीला (ललितपुर) जेल में रखा गया। माताटीला को जेल का दर्जा देकर सिंहल, आडवाणी, जोशी, विष्णु हरि डालमिया, मुझे एवं विनय कटियार को एक माह तक बंदी बनाकर रखा गया। 

कांग्रेस ने देश को 71 वर्षों तक तनाव में रखा

देश के मुसलमानों की आस्था खुदा, कुरान, मक्का-मदीना, हजरत मोहम्मद और इस्लाम पर है। बाबर या उसकी बनाई हुई किसी यादगार पर नहीं। हिंदू-मुसलमान, सबकी नजर में बाबर एक विदेशी हमलावर था। इसको तो नेहरू ने अपने समय पर जब रामलला वहां प्रकट हुए 1949 में, तब राजनीतिक मंतव्य से विवादग्रस्त बना दिया, जिससे कि मुसलमानों का ध्यान उसकी तरफ गया। जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो पूरे देश के सभी धर्मावलंबियों ने उसे एकात्मता के साथ स्वीकार किया। ऐसा नेहरू के समय में भी हो सकता था किंतु कांग्रेस की वोट बैंक की भूख ने ऐसा नहीं होने दिया तथा देश को 71 वर्ष तक तनाव में रखा। मुझे इस अभियान में भागीदारी का कभी कोई अफसोस नहीं रहा। अब आगे रामराज की लड़ाई है।

( जैसा कि कल्याण सिंह,  विनय कटियार और उमा भारती ने अखिलेश वाजपेयी  को बताया )
 
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