लखनऊ: साहित्य की मिठास, सियासत की गर्माहट पर ताला, 88 साल पुराना इंडियन कॉफी हाउस तीन माह से बंद
देश-प्रदेश की राजनीति के साथ लखनऊ की साहित्यिक और सामाजिक विरासत को 88 वर्षों से संजोकर रखने वाले काफी हाउस पर पिछले तीन माह से ताला लटक रहा है। ये जगह पंडित नेहरू से लेकर अटल बिहारी तक को काफी पसंद थी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
एक दौर था जब लखनऊ में खबरें सिर्फ अखबारों के दफ्तरों से नहीं निकलती थीं। कुछ खबरें हजरतगंज के उस इंडियन कॉफी हाउस की मेजों पर बनती थीं, जहां एक कप कॉफी के साथ घंटों राजनीति पर बहस होती थी। कोई नेता अपनी अगली रणनीति पर चर्चा करता तो बगल की मेज पर साहित्यकार नई कहानी पर बहस कर रहे होते। पत्रकार सुनते, सवाल करते और फिर यही बातचीत अगले दिन की खबरों का हिस्सा बन जाती थी। आज वही कॉफी हाउस खामोश है। देश-प्रदेश की राजनीति के साथ लखनऊ की साहित्यिक और सामाजिक विरासत को 88 वर्षों से संजोकर रखने वाले काफी हाउस पर पिछले तीन माह से ताला लटक रहा है।
ब्रिटिश काल में 1938 से स्थापित कॉफी हाउस के बाहर अब सिर्फ खामोशी बची है। दरवाजे पर लटका ताला उन हजारों मुलाकातों, बहसों और किस्सों को जैसे रोककर खड़ा है, जिन्होंने इस जगह को महज कॉफी पीने की जगह नहीं रहने दिया। यहां कुर्सियां छोटी-बड़ी नहीं थीं। यहां कुर्सी पर बैठते ही पद और प्रतिष्ठा का फर्क कुछ कम हो जाता था। मुख्यमंत्री हो या छात्र, वरिष्ठ पत्रकार हो या नया लेखक, बहस की मेज पर सबकी अपनी जगह थी।
मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर से पहले यह जगह लोगों के लिए सूचना और विचारों का अनौपचारिक नेटवर्क भी थी। एक समय यहां कॉफी सिर्फ चार रुपये की मिलती थी। कीमत बढ़ती गई और यह पचास रुपये तक पहुंची। चर्चा है कि कॉफी हाउस का प्रबंधन पिछले कुछ समय से वित्तीय घाटे और स्टाफ की कमी से गुजर रहा था।
यहां सजती थीं साहित्य की महफिलें
राजनीति के साथ साहित्य ने भी यहां खूब करवटें लीं। यशपाल, भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर की त्रिवेणी के साथ ही शायर मजाज लखनवी, अली सरदार जाफरी और हसन कमाल जैसे साहित्यकारों से जुड़ी यादें कॉफी हाउस के इतिहास का हिस्सा हैं। युवा लेखक यहां वरिष्ठ साहित्यकारों को सुनने पहुंचते थे। कविता, कहानी, भाषा और समाज पर होने वाली बहसें कई बार घंटों चलतीं। किसी मेज पर कविता सुनाई जाती तो दूसरी मेज पर उसकी आलोचना शुरू हो जाती। पुराने लोग इसे लखनऊ की 'विचार पाठशाला' भी कहते थे।
पंडित नेहरू से अटल बिहारी जैसे नेताओं के यहां आने की यादें जुड़ी हैं
लखनऊ के इस ऐतिहासिक ठिकाने पर देश की राजनीति के कई बड़े चेहरे पहुंचे। पंडित जवाहरलाल नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, डॉ. राम मनोहर लोहिया, फिरोज गांधी, वीपी सिंह, नारायण दत्त तिवारी, वीर बहादुर सिंह और लालजी टंडन जैसे नेताओं के यहां आने की यादें जुड़ी हैं। समाजवादी आंदोलन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी कॉफी हाउस महत्त्वपूर्ण जगह रहा। मुलायम सिंह यादव और भगवती बाबू समेत कई समाजवादी नेताओं की बैठकों और राजनीतिक चर्चाओं की यादें इससे जुड़ी रही हैं। यहां आने वाले नेताओं की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि बड़े-बड़े नेता यहां बैठते थे, बाकी को सुनते थे और बहस में हिस्सा लेते थे। 70 वर्षीय प्रदीप कपूर ने तो लखनऊ का कॉफी हाउस नाम की एक पुस्तक भी लिखी है जिसमें यहां के कई किस्सों को शामिल किया गया है।
...जब सीएम इस्तीफा देकर सीधे पहुंचे कॉफी हाउस
लेखक विचारक प्रदीप कपूर की ओर से इंडियन कॉफी वर्कर्स कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड की ओर से कॉफी हाउस का संचालन किया जा रहा था। कुछ वर्षों से इसका संचालन अरुणा सिंह कर रही थीं। काफी समय से यहां अव्यवस्थाओं की भरमार थी, कभी कॉफी नहीं तो कभी स्टाफ की कमी के चलते लोगों को परेशानी होती थी। हम लोगों ने भी कॉफी हाउस के बंद होने के बाद बैठने के लिए दूसरा ठिकाना खोज लिया है।