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जमीन से शुरू की ‘जमीन’ की तलाश
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ
Updated Thu, 31 Oct 2013 02:41 AM IST
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समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने मंगलवार को आजमगढ़ में रैली के साथ लोकसभा चुनाव के सियासी समर का शंखनाद कर दिया।
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कांग्रेस और भाजपा पहले ही रैलियों का सिलसिला शुरू कर चुकी हैं।
प्रदेश के प्रमुख दलों में सिर्फ बसपा की तरफ से ही अभी चुनावी रैलियों का सिलसिला शुरू नहीं किया गया है।
भाजपा, कांग्रेस और सपा की रैली को देखने के बाद साफ हो गया कि नेता दावे चाहे जो करते हों लेकिन ‘जमीन’ की तलाश की शुरुआत उन्हें अपनी जमीन से ही करना ज्यादा मुफीद लगा।
साथ ही उन्होंने अपने एजेंडे को धार देने व वोट दिलाने वाले समीकरणों का भी ध्यान रखा है।
पिछले एक महीने में राजनीतिक दलों की सूबे में पांच चुनावी रैलियां हो चुकी हैं।
इनमें भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की दो, कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए संभावित चेहरा माने जा रहे राहुल गांधी की दो और सपा की एक रैली शामिल है।
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'सिर्फ किसान और मुसलमान ने किया देश का विकास'
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मोदी ने रैलियों की शुरुआत कानपुर से की। राहुल अलीगढ़ में रैली के साथ लोकसभा के चुनावी समर में उतरे।
अब मुलायम की रैलियों का आगाज आजमगढ़ से हुआ है। तीनों पार्टियों के पहली रैली स्थलों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि सारे समीकरणों को ध्यान में रखकर रैलियां शुरू की गई हैं।
सपा को ताकत देने वाला रहा है आजमगढ़
आजमगढ़ और उसके आसपास के जिलों को काफी पहले से समाजवादी चरित्र वाला माना जाता रहा है।
इस समय भी यह इलाका चुनावी समीकरणों के लिहाज से सपा के लिए काफी अनुकूल माना जाता है।
भले ही आजमगढ़ संसदीय सीट पर सपा का कब्जा न हो लेकिन विधानसभा की यहां स्थित 10 सीटों में नौ सपा के कब्जे में हैं।
गाजीपुर, बलिया में भी सपा का वर्चस्व रहा है। सपा ने विधानसभा चुनाव का अभियान भी आजमगढ़ से शुरू किया था।
लगता है आजमगढ़ से शुरुआत को शुभ मान रहे सपा नेता लोकसभा चुनाव में भी विधानसभा चुनाव जैसा ही चमत्कार दोहराना चाहते हैं।
भीड़ जुटाने में लगे सपाई, मुलायम ले रहे फीडबैक
इस इलाके से मुलायम की उम्मीदों को सिर्फ इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने बलिया, आजमगढ़, गाजीपुर से तीन-तीन लोगों को मंत्री बनवाया है।
इसके अलावा इस पूरे क्षेत्र में कई लोगों को मंत्री स्तर का दर्जा दे रखा है।
मोदी के चलते पिछड़ों व मुस्लिमों की अच्छी आबादी वाले इस पूरे इलाके में ध्रुवीकरण का सपा को लाभ हो सकता है। शायद इसीलिए सपा ने आजमगढ़ से चुनावी समर के शंखनाद का ऐलान करने का फैसला किया।
मोदी भी इसी राह
भले ही इस समय कानपुर आंकड़ों के लिहाज से भगवा टोली के लिए बहुत उपजाऊ न लग रहा हो लेकिन यहां की आबोहवा भगवा टोली को ताकत देने वाली रही है।
नरेंद्र मोदी के बहाने फिर चर्चा में आई यूपी-नेपाल सीमा
उत्तर प्रदेश के आकार के लिहाज से बिल्कुल केंद्र में स्थित इसी शहर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने राजनीतिक सपने को साकार करने के लिए चुना था।
जनसंघ की स्थापना और बलराज मधोक की विदाई तथा अटल बिहारी वाजपेयी के युग के सूत्रपात का साक्षी रहा यह शहर और इसके आसपास से अतीत में भाजपा की झोली में अच्छी संख्या में सीटें आती रही हैं।
शायद यही वजह रही कि भगवा रणनीतिकारों को यूपी में मोदी के मिशन की शुरुआत के लिए दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, अशोक सिंहल व बैरिस्टर नरेंद्र जीत सिंह जुड़े कानपुर से ज्यादा उचित स्थान दूसरा नहीं लगा।
मोदी ने कानपुर से जमीन तैयार करने की शुरुआत की तो बगल में स्थित झांसी में बुंदेलखंड की बदहाली को मुद्दा बनाकर सपा, बसपा और कांग्रेस को घेरकर पुरानी जमीन को कब्जे में लेने का प्रयास किया।
...और राहुल ने अलीगढ़ व रामपुर से
भले ही सपा इस समय कांग्रेस के सहयोगी दल की भूमिका में हो लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकार संभवत: यह भूले नहीं हैं कि दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण के संतुलित समीकरण में आए असंतुलन के कारण ही उनकी जमीन दूसरों के कब्जे में चली गई है।
शायद यही वजह रही कि राहुल गांधी ने यूपी में चुनावी रैलियों के आगाज के लिए अलीगढ़ और रामपुर को चुना।
ध्यान रखने की बात है कि भूमि अधिग्रहण को लेकर भट्टा पारसौल में हुए विवाद के बाद राहुल ने पारसौल से अलीगढ़ तक पदयात्रा की थी।
इस बार वे नए भूमि अधिग्रहण विधेयक के पारित होने के संदेश के साथ इस इलाके में धन्यवाद रैली के साथ पहुंचे।
उनकी कोशिश किसानों की हमदर्दी हासिल करने के साथ अल्पसंख्यकों को रिझाने की भी रही। कांग्रेस के रणनीतिकार जानते हैं कि यूपी में पार्टी की मजबूती के लिए अल्पसंख्यक वोटों में सेंधमारी करनी होगी।
वे इस तथ्य से भी अनजान नहीं हैं कि सिर्फ मुस्लिम वोट ही नहीं जुटाने होंगे बल्कि इसके लिए मुसलमानों की नजर में प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा करना होगा।
मुजफ्फरनगर के बहाने इस रणनीति को परवान चढ़ाने के लिए अलीगढ़ और रामपुर से ज्यादा उचित जगह पश्चिम में दूसरी नहीं हो सकती थी।
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