फिर दिखा सुबूत, प्रियंका हैं राहुल से बेहतर
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भले ही कांग्रेस राहुल गांधी के दम पर सत्ता में आने की उम्मीद कर रही हो पर सच तो यह है कि प्रियंका ने फिर साबित कर दिया कि वह राहुल से बेहतर हैं।
देश की हाई प्रोफाइल सीटों में से एक रायबरेली में फिलहाल मुकाबला एकतरफा है। मोदी ने भले ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर तीखे हमले किए लेकिन यहां उनके खिलाफ मजबूत उम्मीदवार नहीं उतारा गया।
लिहाजा चौथी बार संसद पहुंचने की सोनिया की राह आसान हो गई। कांग्रेस के लिए रायबरेली में चुनौतियां भले ही कम रही हों पर आश्वस्ति का भाव नहीं था। मोदी लहर के खतरे को भांपते हुए प्रियंका वाड्रा ने चुनाव अभियान की कमान अपने हाथ में ली।
ताबड़तोड़ सभाएं, नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले, रायबरेली के लोगों से आत्मीय रिश्तों की बात और अंतिम दिन जबर्दस्त रोड शो कर उन्होंने मां के दुर्ग को अभेद्य बनाने में कोई कसर भी बाकी नहीं रखी।
जीत पक्की है
रायबरेली में भाजपा की चुनौती मुख्य मुकाबले में आने की है तो बसपा और आम आदमी पार्टी भी इसी होड़ में लगी हुई हैं।
रायबरेली के वोटरों का तो यहां तक कहना है कि यहां नतीजा साफ है। बस देखने वाली बात यह है कि जीत-हार का अंतर कितना रहता है।
नेहरू-गांधी परिवार का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली संसदीय क्षेत्र से शुरुआती दौर में जिस तरह का माहौल बना था उसे देखते हुए इस बार सोनिया गांधी को कड़ी चुनौती मिलने की बात कही जा रही थी।
पर जैसे-जैसे चुनाव ने रफ्तार पकड़ी, सोनिया की राह आसान होती गई। पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार उन्हें रायबरेली में कुछ ज्यादा वक्त देना पड़ा तो मां के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने में प्रियंका और राहुल को भी पसीना बहाना पड़ा।
प्रियंका ने भरा जोश
प्रचार अभियान के अंतिम दिनों में प्रियंका ने विपक्ष के प्रति जिस तरीके से हमलावर रुख अपनाया उसने रायबरेली ही नहीं बल्कि पूरे देश में मायूस कांग्रेसियों में जोश भर दिया।
इसका फायदा कांग्रेस को रायबरेली में सीधे तौर पर मिलता दिखाई दे रहा है। सोमवार को प्रचार के अंतिम दिन रायबरेली में प्रियंका के रोड शो का मंजर देखकर वोटरों के रुख का अंदाजा लगाया जा सकता है।
प्रचार थमने से पहले प्रियंका ने पूरे आत्म विश्वास से कहा भी- ‘रायबरेली में सोनिया के सामने कोई चुनौती नहीं है।’
पार्टी नेता भी मानते हैं कि प्रियंका की मुहिम ने कांग्रेस में जान फूंक दी है।
रायबरेली में सिर्फ नितिन गडकरी
रायबरेली में विपक्ष के बड़े नेताओं की किनाराकशी ने भी मुकाबले को एकतरफा कर दिया।
14 साल बाद मुख्य मुकाबले में आने को बेकरार दिखाई दे रही भाजपा के केवल एक बड़े नेता नितिन गडकरी के ही कदम रायबरेली में पड़े।
उन्होंने भी पार्टी प्रत्याशी अजय अग्रवाल के साथ सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और लौट गए। बसपा ने लखन पासी और आप ने अर्चना श्रीवास्तव को मैदान में उतार तो दिया लेकिन न तो मायावती आईं और न ही अरविंद केजरीवाल।
ऐसे में सोनिया के सामने जीत नहीं बल्कि जीत का अंतर बढ़ाने की चुनौती रह गई।
कांग्रेस विरोधी लहर नहीं
देश भर में भले ही कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और महंगाई को लेकर लोगों में गुस्सा हो लेकिन रायबरेली में यह फैक्टर न के बराबर देखने को मिल रहा है।
एक खास पहलू यह भी है कि रायबरेली में सोनिया के खिलाफ सारे बाहरी उम्मीदवार हैं, जिन्हें लोग ठीक से जानते तक नहीं।
विपक्ष ने सोनिया के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की महज फर्ज अदायगी ही की ताकि उनके राजनीतिक वजूद पर सवाल न उठे।
जहां तक मुद्दों की बात है तो यहां बाकी मुद्दों पर विकास का मुद्दा भारी है। सोनिया और प्रियंका ने इसी को हथियार भी बनाया।
मुकाबले में भी नहीं भाजपा
1996 और 1998 में यह सीट भाजपा ने जीती थी। 1999 से लेकर 2009 तक तीन आम चुनाव व एक उपचुनाव में भाजपा मुख्य मुकाबले में भी नहीं आ सकी।
भाजपा कभी चौथे तो कभी तीसरे नंबर पर रही। 2009 के चुनाव में सोनिया को 4,81,490 मत मिले थे। उन्होंने बसपा के आरएस कुशवाहा को रिकॉर्ड 3,72,165 वोटों से हराया था।
कुशवाहा को 1,09,325 मत मिले थे जबकि भाजपा प्रत्याशी आर.बी. सिंह को सिर्फ 25,444 वोट ही मिल पाए थे और उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी।
सोनिया के सामने मोदी लहर पर सवाल अजय अग्रवाल पिछली बार से ज्यादा वोट हासिल करके मुख्य मुकाबले में आ सकेंगे या फिर बसपा या आप उसकी जगह लेंगे इस पर भी लोगों की निगाहें रहेंगी।