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सेना ही नहीं एकजुट, 'अमेठी रण' कैसे जीतेंगी प्रियंका

Wed, 16 Apr 2014 08:08 AM IST
रमाकांत तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
रमाकांत तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 16 Apr 2014 08:08 AM IST
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priyanka has challenge to unite activists

अमेठी में राहुल के लिए चुनाव प्रचार करने वाली प्रियंका को इस बार स्म़ृति और विश्वास की काट तो ढूढनी ही है साथ ही बिखरे कार्यकर्ताओं को एकजुट भी करना है।

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1999 के लोकसभा चुनाव के बाद लगातार अमेठी में कांग्रेस की कमान संभालने वाली प्रियंका वाड्रा के समक्ष इस बार मुश्किलें कहीं ज्यादा हैं।

बीते विधानसभा चुनाव के बाद से ही नाराज चल रहे कार्यकर्ताओं को एकजुट करना उनके लिए बड़ी चुनौती है। ‘आप’ नेता कुमार विश्वास और स्मृति ईरानी का कद्दावर व्यक्तित्व व ताबड़तोड़ प्रचार भी उनकी परेशानी बढ़ाएगा।
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अब तक के चुनावों में खासतौर पर प्रबंधन से काम चलाने वाली प्रियंका को इस बार प्रचार में भी ताकत झोंकनी होगी। प्रियंका वाड्रा 1999 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही अमेठी में कांग्रेस की कमान संभालती आई हैं।

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पहले सिर्फ मैनेजमेंट तक ही थी सीमित

priyanka has challenge to unite activists

राजीव गांधी की मौत के बात करीब आठ साल तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने वाली सोनिया गांधी 1999 में अमेठी से उम्मीदवार थीं।

उस चुनाव में अमेठी के लोगों में खासा उत्साह था। उसके बाद 2004 और 2009 में राहुल गांधी ने यहां से चुनाव लड़ा। दोनों चुनावों की कमान फिर प्रियंका ने संभाली।

इन चुनावों में विपक्षी दलों के प्रत्याशियों के अपेक्षाकृत कमजोर होने के नाते प्रियंका वाड्रा चुनाव प्रचार को लेकर बेफ्रिक रहती थीं। उनका ज्यादा फोकस चुनाव प्रबंधन पर होता था।

प्रियंका के अमेठी पहुंचने के बाद कांग्रेस ऐसी बेफिक्र हो जाती थी कि राहुल गांधी महज दो-एक दिन का समय ही क्षेत्र में देते थे।

अपने दम पर परिणाम हासिल करती थीं

priyanka has challenge to unite activists

प्रियंका की सक्रियता से तो सोनिया को बुलाने की तो जरूरत ही नहीं समझी जाती थी। इस बार भी अमेठी की कमान प्रियंका वाड्रा के हाथ है।

बात दीगर है कि स्थितियां पहले से बिल्कुल अलहदा हैं। ‘आप’ नेता कुमार विश्वास और भाजपा से स्मृति ईरानी बतौर प्रत्याशी अमेठी की खाक छान रहे हैं।

शहर से लेकर गांव तक में दोनों प्रत्याशी बिजली, पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसी असुविधाओं को लेकर राहुल गांधी को घेर रहे हैं।

इनकी काट के लिए प्रियंका वाड्रा को चुनाव प्रचार में ताकत झोंकनी होगी। साथ ही उन कार्यकर्ताओं को एकजुट करना होगा जो विधानसभा चुनाव से ही अपनी उपेक्षा को लेकर नाराज चल रहे हैं।

कार्यकर्ता नाराज, चुनाव बाद गायब हो जाती हैं

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कई कार्यकर्ताओं ने विधानसभा चुनावों में मिली पराजय की समीक्षा को अमेठी पहुंची प्रियंका वाड्रा से अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

कार्यकर्ताओं ने साफ कहा था कि वे केवल चुनाव के समय आती हैं। उसके बाद कार्यकर्ताओं की कहीं सुनी नहीं जाती।

तब प्रियंका वाड्रा ने कार्यकर्ताओं को आश्वस्त किया था कि वे लगातार उनके संपर्क में रहेंगी।

हालांकि ऐसा नहीं हो सका। ऐसे में प्रियंका के समक्ष कार्यकर्ताओं को लामबंद करने की बड़ी चुनौती है।

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