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गरीब बच्चों के लिए खुले निजी स्कूलों के दरवाजे

Wed, 10 Sep 2014 03:20 AM IST
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 10 Sep 2014 03:20 AM IST
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private school to take admission of poor children.

सात साल की साहिबा के पिता कलीम और मां मुमताज के लिए मंगलवार का दिन खिताब जीतने से कम नहीं था। उनकी लाडली बेटी भी बाकी बच्चों की तरह अब निजी स्कूल में पढ़ाई कर पाएगी।

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लंबी लड़ाई के बाद मंगलवार को साहिबा और तीन अन्य बच्चों को आरटीई के तहत निजी स्कूल में मुफ्त दाखिले पर जिला अधिकारी ने अपनी मंजूरी दे दी।

इसके साथ ही आरटीई लागू होने के तीन साल बाद लखनऊ में गरीब बच्चों के निजी स्कूल में मुफ्त दाखिले का खाता भी खुल गया।

चारों बच्चे अब मड़ियांव स्थित यूनिवर्सल इंटर कॉलेज में मुफ्त पढ़ाई कर सकेंगे। उनकी पढ़ाई पर आने वाले खर्च का भुगतान सरकार करेगी।

आरटीई के तहत दाखिला पाने वाले साहिबा, उजमा, रिंकी और शाहबाज के मां-पिता मजदूरी करके जीवन-यापन करते हैं।

मड़ियांव में झुग्गी झोंपड़ी के बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाने वाले बाल मंच के संचालकों ने पिछले साल इनकी आंखों में आरटीई के तहत निजी स्कूलों में मुफ्त दाखिले का ख्वाब पैदा किया था।
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इसके बाद इन अभिभावकों की परीक्षा शुरू हुई। कहने को तो आरटीई के तहत सभी निजी स्कूलों को उनकी 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब बच्चों को मुफ्त दाखिला देना था।

पर स्कूलों की मनमानी और शासनादेश की जटिलताओं के कारण इन गरीब बच्चों को दाखिला नहीं मिल पा रहा था।

ऐसे में बाल मंच की संचालिका पूजा विश्वकर्मा और आरटीई के लिए काम करने वाले अजय कुमार ने प्रमाणपत्र जुटाने और आवेदन करने में इनकी मदद की।

मजदूर मां-पिता के कठिन संघर्ष के बाद मंगलवार को इन चारों बच्चों को डीएम के आदेश के बाद निजी स्कूल में मुफ्त दाखिले का अधिकार मिल गया।

बाल मंच की संचालिका पूजा के अनुसार बस्ती के आसपास कोई सरकारी स्कूल नहीं है।

इसलिए इन चार बच्चों के साथ ही बीते साल भी कई अन्य बच्चों को निजी स्कूल में आरटीई के तहत मुफ्त दाखिला दिलाने के लिए आवेदन किया था।

लेकिन कोई रिस्पांस नहीं मिला। इस बार केवल चार बच्चों को दाखिला दिलाने के लिए आवेदन किया था।

आरटीई के तहत निजी स्कूल में मुफ्त दाखिले के लिए आवेदन करने के मामले का निपटारा 10 दिन में हो जाना चाहिए।

लेकिन चारों बच्चों को दाखिले के लिए 2 महीने का इंतजार करना पड़ा। अच्छी बात यह रही की देर से ही सही पर पिछले तीन साल से गरीब बच्चों के लिए बंद चल रहे निजी स्कूल के दरवाजे आखिर खुले तो।
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