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क्यों इतनी जल्दी में हैं सोनिया और राहुल
मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ
Updated Wed, 09 Oct 2013 08:24 AM IST
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साढ़े चार साल की चुप्पी के बाद रायबरेली और अमेठी में दो दिनों से जिस तरह धड़ाधड़ शिलान्यास और भूमिपूजन किए जा रहे हैं, उनमें चुनावी आहट साफ-साफ सुनी जा रही है।
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साफ हो गया कि है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली चुनौतियों से निपटने के लिए गांधी परिवार अपने घर में विकास का ही सहारा लेगा।
हालांकि जिन योजनाओं की शुरुआत रायबरेली व अमेठी में की जा रही है उनसे स्थानीय लोगों को बड़े पैमाने पर नौकरियां तो नहीं मिलने वाली, पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इससे उनकी जिंदगी में कोई तब्दीली नहीं आएगी।
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इससे भी खास बात यह है कि विकास की इन मेगा योजनाओं से दोनों इलाके के लोगों को भावनात्मक स्तर पर अति महत्वपूर्ण क्षेत्र का नागरिक होने का एहसास हो रहा है और निश्चित ही इसका फायदा चुनाव में कांग्रेस की झोली में जाएगा।
रायबरेली में औद्योगिकीकरण की शुरुआत सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी ने आईटीआई की स्थापना के साथ की थी। जिले का शायद ही कोई गांव ऐसा हो जिसका कम से कम एक व्यक्ति इस फैक्ट्री में नौकरी न पाया हो।
दरअसल फैक्ट्री की स्थापना से जिले का बाजार तो विकसित हुआ ही था, कांग्रेस का जमीनी आधार और पुख्ता करने में भी मदद मिली थी।
पर कालांतर में कारोबारी घरानों द्वारा 10 जनपथ में अपनी पहुंच बनाने के मकसद से स्थापित कारखानों के कम समय में बंद होने और श्रमिक आंदोलन पनपने से गांधी परिवार ने रणनीति बदल दी।
अब सारा जोर है उन सरकारी संस्थाओं और उन उद्योगों पर जिनके बंद होने की आशंका न केबराबर हो। रेल कारखानों से लेकर महिला विश्वविद्यालय की स्थापना इसी बदली सोच का हिस्सा माना जा रहा है।
योजनाएं करा रहीं विशिष्टता का एहसास
रायबरेली में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जिले की सभी सीटों पर हार गई थी। नतीजे सोनिया गांधी के लिए बड़ा झटका था।
लोकसभा चुनाव में भी किसी बड़ी चुनौती की पेशबंदी के मद्देनजर मंगलवार के कार्यक्रमों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
समाजवादी पृष्ठभूमि के वकील जय प्रकाश सिंह कहते हैं कि आज पहले से निर्धारित देश के सबसे बड़े रेल पहिया कारखाने के अलावा सोनिया ने जिस तरह अचानक मुंशीगंज में एम्स का भूमिपूजन किया।
साथ ही विकास की अन्य योजनाओं की आधार शिला रखी उससे रायबरेली के लोग भावनात्मक तौर से खुद को विशिष्ट जिले का निवासी महसूस कर रहे हैं।
जिले को उन्होंने अति महत्वपूर्ण बना दिया। निश्चित ही इसका फायदा सोनिया को लोकसभा चुनाव में महसूस होगा।
लोगों की जिंदगी में आएगा बदलाव
श्रमिक नेता वीके शुक्ला कहते हैं- भले ही जिले के बहुत लोग इन संस्थाओं में नौकरी न पाएं पर मेगा योजनाओं के आने से उनका जीवन स्तर बढ़ेगा।
पुराने लोगों से पूछिए आईटीआई आने से पहले रायबरेली शहर में लोग कैसे रहते थे और बाद में कितना बदलाव आया? बाजार ने कितनी रंगत बदली।
सोचिए जब दो बड़े रेल कारखाने, एम्स, एक महिला विश्वविद्यालय, बीएचयू का कैम्पस और कई अन्य योजनाएं रफ्तार पकड़ेंगी तो जिले का स्वरूप कैसा होगा। जिले का कोई बाशिंदा पांच साल बाद अपने घर आएगा तो नि:संदेह अचंभित होकर रास्ता नहीं खोज पाएगा।
अमेठी में रायबरेली से ज्यादा औद्योगिक विकास
तुलनात्मक रूप से देखें तो कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री देने के बावजूद अमेठी में रायबरेली की तुलना में ज्यादा औद्योगिक विकास हुआ है।
जगदीशपुर पहुंचने पर लगता है कि जैसे किसी बडे़ इंडस्ट्रियल हब में पहुंच गए हों, पर अंदर जाने पर पता चलता है कि करीब 100 के आसपास छोटे-बड़े कारखाने बंद पड़े हैं।
उद्यमी राजेश मिश्र बताते हैं कि ‘कुछ लोगों ने राजीव गांधी को खुश करने के लिए एक छोटा प्लांट अमेठी में भी डाल दिया। पर बैंकिंग सपोर्ट न मिलने और ढांचागत सुविधा न होने के कारण थोड़े ही दिनों में बंद हो गए।
एचएएल, सेल व गेल जैसे संयंत्रों से स्थानीय स्तर पर लोगों को कोई बड़ा लाभ नहीं मिला। पर मेगा फूड पार्क व पेपर मिल जैसी योजनाओं से लगता है कि गांधी परिवार का नजरिया बदला है। विकास को ढर्रे पर लौटाने की कोशिश है’।
रोजगार की बढ़ेंगी संभावनाएं
स्थानीय बड़े किसान व प्लाईवुड फैक्ट्री के प्रोपराइटर हेमंत विक्रम सिंह कहते हैं कि मेगा फूड पार्क से न केवल लोकल किसानों के माल की खपत होगी बल्कि कम पढ़े-लिखे लोगों के रोजगार मिलने की भी संभावनाएं बढ़ेंगी।
विकास को स्थानीय आकांक्षाओं से जोड़ने की कोशिश हो रही है, ये अच्छी बात है।