झुलस रही जनता, पर ऐसे हो रही है 'बिजली पर सियासत'
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बिजली पर सियासत इसका संकट और विकराल बना रही है। लोगों को राहत देने के लिए मिल बैठकर कोई रास्ता निकालने के बजाय केंद्र और राज्य सरकार बिजली संकट के लिए एक दूसरे को कोस रहे हैं।
राज्य सरकार केंद्र पर सहयोग न करने का आरोप जड़ रही है तो केंद्र ने बिजली को राज्य का विषय बताते हुए हाथ खींच लिए हैं। हां, कमी पूरी करने के लिए अतिरिक्त बिजली खरीदने की नसीहत जरूर दी है।
इस बार लोकसभा चुनाव में राज्य सरकार ने भले ही बिजली को चुनावी मुद्दा न बनने दिया हो पर चुनाव बाद एकाएक पैदा हुए अभूतपूर्व बिजली संकट ने अखिलेश सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।
नहीं काम आया सपा का हथकंडा
बिजली के बहाने सभी दल सपा को घेरने में जुट गए हैं। भाजपा कुछ ज्यादा ही हमलावर है।
दरअसल समाजवादी पार्टी ने बिजली के सहारे चुनावी नैया पार लग जाने का मुगालता पाल रखा था इसलिए चुनाव शुरू होने के पहले से नतीजे आने तक खूब बिजली खरीदकर गांवों में भी 16-16 घंटे तक बिजली दी गई।
चुनाव के नतीजों से साफ हो गया कि बिजली का सियासी हथकंडा काम नहीं आया। चुनाव बाद अतिरिक्त बिजली की खरीद को सीमित किया गया तो एकाएक गर्मी बढ़ गई और बिजली लोगों को रुलाने लगी।
इसी दौरान सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने यह कहते हुए खीझ मिटानी शुरू कर दी कि लोगों को ज्यादा बिजली नहीं चाहिए वरना सपा को इस तरह नहीं नकारते।
अखिलेश सरकार के खिलाफ बनी हथियार
सपा सरकार को भले ही बिजली का सियासी फायदा न मिला हो लेकिन अब विपक्ष ने इसी बिजली को अखिलेश सरकार के खिलाफ हथियार बना लिया है।
लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और बिजली कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। राजधानी समेत पूरे प्रदेश में रोजाना धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं।
आरोप लग रहे हैं कि राज्य सरकार बिजली कटौती करके लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार का बदला जनता से ले रही है।
जनता भीषण गर्मी के बीच बिजली की किल्लत से त्राहिमाम कर रही है लिहाजा इस तपिश पर सियासतदां सियासी रोटी भी अच्छी पकने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
मुख्यमंत्री दे रहे सफाई
भाजपा तो सड़क पर उतर आई है और उसके निशाने पर सीधे अखिलेश सरकार है।
बिजली संकट गर्माने के बाद लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेलने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा बिजली पर किसी तरह की सियासत नहीं हो रही है।
लगातार प्रयास किए जा रहे हैं और जल्द ही स्थिति सामान्य कर ली जाएगी। गर्मियों में हमेशा यूपी में बिजली संकट हो जाता है।
उनका यहां तक कहना है कि सूबे में बिजली की किल्लत को देखते हुए केंद्र उधार बिजली दे दे, यूपी 2016 में केंद्र को बिजली लौटा देगा।
केंद्र सरकार की दलील
उधर केंद्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल का आरोप है कि राज्य सरकार ने वोटरों को सबक सिखाने के लिए बिजली का संकट पैदा किया है। गोयल ने सवाल उठाया कि आखिर राज्य सरकार ने चुनाव नतीजे आने के दिन 16 मई से ही क्यों बिजली खरीदनी बंद कर दी?
उसके पहले तक एनटीपीसी की झज्जर इकाई से राज्य सरकार 377 मेगावाट बिजली खरीद रही थी। हर राज्य अभी केंद्रीय पूल से बिजली खरीद रहा है लेकिन उत्तर प्रदेश की सरकार क्यों नहीं खरीद रही?
अंटा, औरैया और दादरी पावर प्लांट से यूपी का जितना कोटा है उसे भी नहीं खरीदा जा रहा है। प्रदेश के ऊर्जा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि केंद्र जिन बिजलीघरों की बिजली की बात कर रहा है उसकी कीमत एनर्जी एक्सचेंज से खरीदी जाने वाली बिजली से भी ज्यादा है।
बिजली निगमों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि बहुत ज्यादा महंगी बिजली खरीद सकें। चुनाव के दौरान महंगी बिजली मजबूरी में खरीदी जा रही थी।
अखिलेश का आरोप
राज्य सरकार का कहना है कि केंद्र यूपी को उसके निर्धारित कोटे की पूरी बिजली उपलब्ध करा दे तो स्थिति काफी हद तक सुधर सकती है। यूपी का कोटा 6000 मेगावाट है जबकि केंद्र से लगभग 4500 मेगावाट बिजली ही मिल पा रही है।
राज्य सरकार ने बिजलीघरों को जरूरत भर कोयला न मिलने का मुद्दा भी उठाया है। इस पर केंद्रीय बिजली मंत्री का कहना है कि यूपी के अपने बिजलीघरों में कुल उत्पादन क्षमता का लगभग आधा ही उत्पादन हो रहा है।
उत्पादन बढ़ाकर किल्लत दूर की जा सकती है। इसके अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में भी सरप्लस बिजली है जिसे खरीदा जा सकता है। चुनाव नतीजों के बाद सरकार की छवि सुधारने में लगे अखिलेश यादव अब बिजली के मुद्दे पर केंद्र से सीधे टकराव से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
राज्य सरकार ने केंद्र की नसीहत पर अमल करते हुए बिजलीघरों का उत्पादन बढ़ाने और पूर्वोत्तर से अतिरिक्त बिजली खरीदने की पहल कर दी है।