PM बने मोदी, अब बदलेगी यूपी की सियासी हवा
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केंद्र में भाजपा नीत एनडीए की सरकार के शपथ के साथ ही सूबे के समीकरणों में बदलाव की भी आहट सुनाई देने लगी है लेकिन अब भी सूबे में भाजपा की मुश्किलें कम नहीं हैं।
भाजपा के अंदरूनी समीकरणों में भी उलटफेर जरूरी लगने लगा है। केंद्र में सत्तारूढ़ दल होने के नाते भाजपा के सामने सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच पहुंचाने की चुनौती होगी तो यह देखना भी दिलचस्प होगा कि वह सपा सरकार की नाकामियों को कितनी ताकत व मुखरता के साथ रख पाती है।
नई परिस्थितियों में सपा और बसपा के सामने भी अपनी नीति व रणनीति पर नए सिरे से तय करने की चुनौती है।
बदलाव की पटकथा भी तैयार
राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो इस बार केंद्र में सत्ता ही नहीं बदली है बल्कि उसने डेढ़ दशक बाद यूपी के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव की पटकथा भी तैयार कर दी है।
खासतौर से सपा, बसपा और भाजपा को अपनी भूमिकाएं स्पष्ट करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब देखना यह है कि इन दलों के नेता खुद को इन चुनौतियों और भूमिकाओं के आधार पर खुद को कैसे तैयार करते हैं।
इसी पर इन दलों का उत्तर प्रदेश में भविष्य और ताकत निर्भर करेगी। सिर्फ इन दलों को ही नहीं बल्कि भाजपा को भी नए सिरे से अपनी भूमिका तय करने का संदेश मिला है। संगठन के ढांचे से लेकर तेवरों में बदलाव तक।
तय होंगे सपा, भाजपा के रिश्ते
बात सही भी है क्योंकि केंद्र में अब ऐसी सरकार है, जिसके पास अपना पूर्ण बहुमत है। उसे उत्तर प्रदेश के सत्तारूढ़ दल सपा को साथ रखना मजबूरी नहीं है।
जाहिर है कि सपा को अब यह तय करना होगा कि केंद्र से उसके रिश्ते कैसे रहें। बसपा भले ही प्रदेश में सरकार में नहीं है।
पर, बसपा सुप्रीमो मायावती ने गलत फैसलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैन से न बैठने देने की बात कही है। लोकसभा में बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं है। सिर्फ राज्यसभा में उसके सदस्य हैं।
ऐसे में यह देखने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश के संदर्भ में वह किस तरह सरकार को घेरती है।
सपा की मुश्किलें
सबसे ज्यादा असमंजस सपा के लिए है। प्रदेश में वह सत्ता में है। इस नाते विकास और अन्य कामकाज के लिए उसे केंद्र का सहयोग चाहिए।
पर, सपा के सामने अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मुस्लिम वोटों को सहेजकर रखने की मजबूरी भी दिखाई दे रही है।
ऐसे में यह देखने वाला होगा कि सपा अपनी नीति के अनुसार, मुस्लिम एजेंडे को धार देने की राह पर ही चलती है अथवा कोई नया रास्ता चुनती है।
बदलना तो भाजपा को भी होगा
भाजपा नेता भी इस बात को समझ रहे होंगे कि प्रदेश में सत्ता में रही बसपा और अब सपा के प्रति नरम रुख रखने का भी कांग्रेस को नुकसान हुआ है।
संगठन की सुस्ती ने भी कांग्रेस को सूबे की सियासत में प्रमुख भूमिका से अलग-थलग कर दिया है। केंद्र में सत्ता की खुमारी और संगठन की सुस्ती से कांग्रेस अपनी सरकार की उपलब्धियां भी जनता को ठीक से न बता पाई।
भाजपा नेता भी इस सच्चाई को जानते ही होंगे कि भले ही उन्होंने सूबे में 80 में 73 सीटें अपनी झोली में डाल लीं लेकिन इसमें उनका कम जनता में कांग्रेस, सपा और बसपा के खिलाफ पैदा नाराजगी और मोदी पर भरोसे से बनी लहर का ज्यादा योगदान है, अन्यथा आधी-अधूरी बूथ कमेटियों व जमीन पर संगठन की कमजोरी से इस तरह के नतीजे आना मुश्किल था।
ऐसे लाभ मिल सकता है भाजपा को
स्वाभाविक है कि भाजपा इस माहौल का लाभ उठाते हुए आधी-अधूरी बूथ कमेटियों को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कोशिश करे।
जमीनी संगठन को मजबूत करने के उपाय हों। भाजपा नेता भी बदले तेवर में दिखे। वैसे अभी प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में लगभग तीन साल का वक्त है, ऐसे में प्रदेश के मतदाता का फैसला केंद्र में भाजपा के प्रदर्शन पर भी आधारित होगा।
जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान विकास के वादे किए थे, अगर वह उस पेस को कायम रख सके तो सपा और बसपा के सामने और भी ज्यादा मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।