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नए दलों की राजनीति: नाराजगी में बने तो, पर चले नहीं अधिकतर दल

Fri, 12 Oct 2018 12:43 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 12 Oct 2018 12:43 AM IST
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politics behind starting new political parties
राजा भैया व शिवपाल सिंह

समाजवादी पार्टी के बंद दरवाजे खुलते न देख आखिरकार शिवपाल सिंह यादव ने समाजवादी सेकुलर मोर्चा बनाकर छोटे दलों का गठबंधन बनाना शुरू कर दिया। अब यह तथ्य सामने आ रहा है कि उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया (पीएसपी लोहिया) नाम से चुनाव आयोग में राजनीतिक दल का रजिस्ट्रेशन करा लिया है। निर्दलीय राजनीति करते आ रहे कुंडा के रघुराज प्रताप सिंह ‘राजा भैया’ ने भी जनसत्ता नाम से नया राजनीतिक दल बनाने का संकेत दिया है। 

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शिवपाल के नया दल बनाने के कयास तो पहले से लगाए जा रहे थे, लेकिन ज्यादा हलचल राजा भैया के नई पार्टी बनाने को लेकर है। राजनीतिक गलियारों में इस सवाल के जवाब तलाशने की कोशिश हो रही है कि इन दोनों के राजनीतिक दल बनाने के पीछे सिर्फ वजूद की लड़ाई है या इनका मकसद लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य के सियासी समीकरणों में उलटफेर है। 
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प्रदेश में दल बनाने और बिगाड़ने का पुराना इतिहास है। मुलायम सिंह यादव को छोड़ दें तो किसी नेता का बनाया नया दल बहुत प्रभावशाली नहीं बन पाया है। अपना दल भी उपस्थिति दर्ज कराने तक ही पहुंच पाया। पिछले दो दशक में ही प्रदेश में कई नए राजनीतिक दलों का उदय और अंत हुआ।
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इनमें से कुछ एक-दो चुनाव में चमक कर अस्त हो गए तो कुछ को आंतरिक वर्चस्व के झगड़े ने खत्म कर दिया। कुछ को इन दलों के नेताओं ने अपना राजनीतिक समायोजन होते ही खत्म कर दिया। मुलायम की सपा को छोड़कर ज्यादातर को अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मौका तभी मिला जब किसी बड़े दल ने अपने राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए उसे सहारा दिया।

ये वजह तो नहीं

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि पिछले दो दशक में बने सियासी दलों पर नजर डालने से तीन निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, कल्याण सिंह जैसे नेताओं ने अपनी मूल पार्टी से अलग होकर इसलिए नया दल बनाया कि कुछ नेताओं की गुटबाजी से नाराज वह अपनी हैसियत दिखाना चाहते थे। इसमें वह कामयाब भी हुए। शिवपाल भी इसी राह पर चलते दिख रहे हैं। हालांकि कल्याण की तरह इनके मूल पार्टी में लौटने की संभावनाएं कम ही हैं।

दूसरा, अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, पीस पार्टी, निषाद पार्टी जैसे दलों के बनाने के पीछे कुछ क्षेत्र विशेष के राजनीतिक, जातीय और अन्य समीकरणों के सहारे अपनी सियासी हैसियत बनाना तथा बड़े दलों के साथ सत्ता में भागीदारी करना दिखता है। जहां तक छह बार निर्दलीय विधायक रह चुके रघुराज प्रताप सिंह के नया दल बनाने की बात है तो वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने अब प्रदेश के साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रवेश का फैसला कर लिया है। 

इस तरह बनते-बिगड़ते रहे दल

कल्याण सिंह ने भाजपा से अलग होने के बाद राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई। भाजपा का गणित बिगाड़ा। वे 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में लौट आए, लेकिन लोकसभा चुनाव 2009 से पहले भाजपा से अनबन के बाद उन्होंने जन क्रांति पार्टी बना ली। हालांकि यह पार्टी भी चल नहीं पाई। कल्याण इस समय राजस्थान के राज्यपाल हैं। मुलायम से नाराज होकर बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी क्रांति दल बनाया, पर यह बेनी बाबू को कांग्रेस का नेता बनाने तक ही चला। बेनी बाबू अब फिर सपा में हैं। उनके दल का पता नहीं। अमर सिंह ने भी सपा से अलग होकर लोकमंच बनाया और चुनाव लड़े, पर अमर की सपा में वापसी के साथ यह खत्म हो गया। अमर अब राज्यसभा के सदस्य हैं। उमा भारती, आरके चौधरी, नरेंद्र चौधरी, श्याम सुंदर शर्मा सहित प्रदेश के कई नेताओं ने मूल पार्टी से नाराज होकर नया दल बनाया, पर बहुत कुछ कर नहीं पाए। सोनेलाल पटेल ने भी बसपा से अलग होकर अपना दल बनाया था, लेकिन यह भी बहुत विस्तार नहीं पा सका। भाजपा के सहयोग से लड़े अपना दल के इस समय नौ विधायक हैं। पर, इस दल में भी मां-बेटी में वर्चस्व का झगड़ा चल रहा है। 

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