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वाह री लखनऊ पुलिस! चार साल पहले खत्म कानून में दर्ज किया केस, यहां पढें- कुछ चर्चित कार्रवाइयां

Wed, 09 Jan 2019 02:36 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 09 Jan 2019 02:36 PM IST
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police filed a case in cancelled law
डेमो
सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी एक्ट) की धारा-66ए को सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2015 को ही निरस्त कर दिया था, पर लखनऊ की पुलिस है कि वह इस धारा का इस्तेमाल अब भी कर रही है। सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गिरफ्तारी करने वाले अफसरों को जेल भेजने की चेतावनी दी तो, इधर सोमवार को ही ठाकुरगंज थाने में इसी धारा के तहत केस दर्ज किया गया।
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खुद अफसर मानते हैं कि इस धारा के निरस्त किए जाने के बाद ऐसे कई मामले सामने आए हैं। हालांकि, वे इसे महज मुंशी की चूक करार देते हैं। ठाकुरगंज थाने में सोमवार को ही विश्व हिंदू महासंघ के प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील कुमार शुक्ला की तहरीर पर मोहल्ला फरीदीपुर निवासी चंद्रप्रकाश कश्यप के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा-66ए के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
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इसकी विवेचना निरीक्षक राजकुमार वर्मा को सौंपी गई है। इसी तरह तीन साल में अन्य थानों में भी धारा 66ए के तहत दर्जनों प्राथमिकी दर्ज हो चुकी हैं। 

मुंशी की चूक को दुरुस्त करते हैं विवेचक

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धारा 66ए के तहत प्राथमिकी दर्ज होने को लेकर सवाल पर ठाकुरगंज के प्रभारी निरीक्षक अंजनी कुमार पांडेय कहते हैं कि तहरीर पर मुकदमा लिखने के दौरान धारा लगाने में मुंशी से गलती हो जाती है। तफ्तीश सौंपे जाते ही विवेचक उसे दुरुस्त करके पड़ताल शुरू करते हैं। इसे चूक मानकर मुंशी को भविष्य के लिए हिदायत दी जाती है। 

पड़ताल के दौरान हटा देते हैं 66ए
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कलानिधि नैथानी भी निरस्त की जा चुकी धारा के तहत मुकदमा दर्ज किए जाने के सवाल पर कहते हैं, आईटी एक्ट की धारा 66ए ही नहीं, भारतीय दंड विधान की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मुकदमे की तफ्तीश शुरू करने पर विवेचक द्वारा पर्यवेक्षण अधिकारी के संज्ञान में लाकर धाराएं हटाई या बढ़ाई जाती हैं।

मसलन, मारपीट के मुकदमे में मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर संज्ञेय धाराओं को बढ़ाने के कई मामले हैं। इसी तरह आईटी एक्ट की धारा 66ए के तहत मुकदमे की विवेचना के दौरान विवेचक उसके स्थान पर उपयुक्त धारा में कार्रवाई करते हैं। 

बड़ा सवाल : क्या इसे मुंशी की चूक माना जा सकता है?

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पर, बड़ा सवाल ये है कि क्या इसे महज चूक करार दिया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट को इस धारा को निरस्त किए लगभग चार साल होने को हैं। इतने लंबे वक्त के बावजूद ऐसी चूक हो रही है तो साफ है कि कानून को लेकर पुलिसकर्मियों को अप-टू-डेट नहीं किया जा रहा। 

धारा 66ए : सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करार दिया था
वर्ष 2000 में बने सूचना प्रौद्योगिकी कानून में वर्ष 2008 में संशोधन करके धारा 66ए को जोड़ा गया था। इसके तहत सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और अश्लील सामग्री पोस्ट करने व्यक्ति की गिरफ्तारी का अधिकार दिया गया था।

दोषियों को तीन साल की जेल या 5 लाख रुपये का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान था। वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने आईटी एक्ट की धारा 66ए को अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करार देते हुए रद्द कर दिया था।
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यहां पढ़ें,- चर्चित कार्रवाइयां

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66 ए के तहत कुछ चर्चित कार्रवाइयांः
1. 2012 में बालासाहेब ठाकरे की अंतिम यात्रा पर सोशल मीडिया पर कमेंट करने पर महाराष्ट्र के पालघर की रहने वाली शाहीन और उसे लाइक करने वाली उसकी सहेली रीनू को गिरफ्तार किया गया था। इस कानून पर पहला विवाद यही मामला था। 
2. 2013 में खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने वाली आईएएस अफसर दुर्गशक्ति नागपाल के निलंबन पर सपा सरकार की सोशल मीडिया पर आलोचना करने पर लेखक कंवल भारती को गिरफ्तार किया गया था।
3. सपा सरकार के दौरान मंत्री रहे आजम खान के खिलाफ विवादास्पद कमेंट करने पर 11 वीं के छात्र को गिरफ्तार किया था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
4. पं. बंगाल की मुख्यमंत्री का कार्टून पोस्ट करने पर जाधवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को गिरफ्तार किया गया था। 
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