विधान परिषद के प्रत्याशियों के चयन में भाजपा ने दिखाया 'कुर्बानी के बदले रिटर्न गिफ्ट' फॉर्मूला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भाजपा ने विधान परिषद उम्मीदवारों से कई तरह के समीकरण साधने के साथ सियासी संदेश भी देने की कोशिश की है। जिस तरह उधारी चुकाने और वफादारी निभाने पर फोकस किया गया है, उसमें आगे के गहरे सियासी संकेत छिपे दिखाई दे रहे हैं। पार्टी के पुराने लोगों को उम्मीदवार बनाकर समर्पण को सम्मान का संदेश देकर कार्यकर्ताओं को यह बताने की कोशिश की गई है कि सब्र का फल मीठा होता है।
बाहर से आने वालों को टिकट देकर भले ही भाजपा ने उधारी चुकाने का संदेश दिया हो लेकिन कार्यकर्ताओं को यह बात बहुत हजम होती नहीं दिख रही है। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में पराजय के बावजूद निषाद समुदाय से एक भी चेहरे को प्रतिनिधित्व न देना भी सवाल खड़े कर रहा है।
मुख्यमंत्री, दोनों उप मुख्यमंत्रियों और दो मंत्रियों के लिए विधान परिषद की सीटें खाली करने वाले यशवंत सिंह, सरोजनी अग्रवाल, बुक्कल नवाब और जयवीर सिंह को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने उधारी चुकाने के साथ वादा निभाने का संदेश भी देने की कोशिश की है। राजनीतिशास्त्रियों की मानें तो इस फैसले के गहरे निहितार्थ हैं। माना जा रहा है कि इसके पीछे भविष्य के राजनीतिक ऑपरेशन की तैयारी का संदेश है।
भाजपा के रणनीतिकारों ने यह जताने की कोशिश की है कि जो उनके लिए कुर्बानी का गिफ्ट देगा, वे उसे रिटर्न गिफ्ट भी देंगे। ताज्जुब नहीं कि आने वाले दिनों में खासतौर से लोकसभा चुनाव के समय भाजपा विरोधी दलों में बड़ी उथल-पुथल देखने को मिले। भाजपा को जरूरत न होने पर भी इसका असर विधान परिषद में भी दिखाई पड़ सकता है। बावजूद इसके बाहरियों की भरमार से अगर पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने लिए दरवाजे बंद होने का संदेश दिखा तो भाजपा के लिए समस्या हो सकती है।
इस तरह साधा संतुलन पर असंतुलन भी दिखा
प्रत्याशियों में यशवंत, जयवीर और महेंद्र सिंह के रूप में तीन ठाकुर, विजय बहादुर पाठक के रूप में एक ब्राह्मण, सरोजनी अग्रवाल के रूप में एक वैश्य, अशोक धवन के रूप में एक खत्री, अशोक कटारिया के रूप में एक पिछड़े और विद्यासागर के रूप में एक दलित तथा मोहसिन रजा और बुक्कल नवाब के रूप में दो मुस्लिम हैं।
अपना दल कोटे से आशीष के रूप में एक और पिछड़े को जगह दी गई है। माना जा रहा था कि गोरखपुर व फूलपुर में बड़ी संख्या में निषाद मतदाताओं के भाजपा से कट जाने को देखते हुए पार्टी इस बिरादरी के किसी न किसी शख्स को परिषद भेजेगी। पर, ऐसा नहीं हुआ।
हालांकि कहा जा रहा है कि कुछ संस्थाओं में इनका मनोनयन करके संतुलन बनाया जाएगा। इसी तरह अन्य अति पिछड़ी जातियों को नुमाइंदगी देने की संभावनाएं भी पूरी नहीं हुईं। दलितों पर फोकस कर रही भाजपा का सिर्फ एक दलित चेहरे को विधान परिषद भेजना भी कुछ असंतुलन दिखा रहा है। ऐसा लगता है कि पार्टी निकट भविष्य में किसी अन्य तरीके से इसकी भरपाई करने की सोच रही है।
कार्यकर्ताओं को संदेश, इंतजार करोगे तो कुछ न कुछ अवश्य मिलेगा
दूसरे दलों से आए चार लोगों को छोड़ दें तो दस उम्मीदवारों में छह भाजपा के ही हैं। इनमें भी मोहसिन रजा को छोड़कर पांच तो मूल काडर के हैं। महेंद्र सिंह को पार्टी दोबारा भेज रही है। बाकी चार पार्टी में लंबे समय से काम करते रहे हैं। पार्टी ने इन्हें उम्मीदवार बनाकर कार्यकर्ताओं में पैदा हो रहे अंसतोष की आग पर पानी डालने की कोशिश की है।
हालांकि पार्टी में बहुत ऐसे लोग हैं जिनका योगदान संभवत: टिकट पाने वालों से अधिक रहा है। पर, संकेतों को समझा जाए तो पार्टी ने यही बताने की कोशिश की है कि इंतजार करेंगे तो कुछ न कुछ उनके भी हिस्से में आएगा।
कैराना फैक्टर
बिजनौर के अशोक कटारिया के टिकट के पीछे कैराना फैक्टर नजर आ रहा है। हुकुम सिंह के निधन के कारण कैराना संसदीय सीट का और बिजनौर में विधानसभा की नूरपुर सीट पर चुनाव होना है। कटारिया गुर्जर हैं। कैराना सहित पश्चिम में गूजर की अच्छी खासी आबादी है। प्रदेश सरकार में कोई मंत्री गुर्जर नहीं है। माना जा रहा है कि कटारिया के जरिये भाजपा ने इस कमी को पूरी कर इस वर्ग के लोगों को साधने की कोशिश की है।