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बच्चों की दुर्लभ बीमारियों के इलाज में मददगार बनेगा पीजीआई

Tue, 05 Jan 2021 12:59 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 05 Jan 2021 12:59 AM IST
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Pgi will help those children who suffer from rare deases
बच्चों की दुर्लभ बीमारियों के इलाज में मददगार बनेगा पीजीआई
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चंद्रभान यादव
एसजीपीजीआई को दुर्लभ और आनुवांशिक बीमारियों के इलाज और उनसे जुड़े शोध का प्रदेश का नोडल सेंटर बनाया गया है।
यहां इन बीमारियों से पीड़ित बच्चों के इलाज में अपनाई गई तकनीक और आनुवांशिक स्थिति का पूरा डाटा रखा जाएगा।
इसके जरिये भविष्य में इन बीमारियों के इलाज को लेकर पॉलिसी बनाने में मदद मिलेगी। देशभर में इस तरह के आठ सेंटर बनाए गए हैं।
पीजीआई के मेडिकल जेनेटिक्स विभाग में मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड समेत नेपाल से भी मरीज आते हैं। इसमें कई बच्चे ऐसे होते हैं जो आनुवांशिक या दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित होते हैं।
इलाज के अभाव में तीन से पांच साल के अंदर दम तोड़ देते हैं। वहीं, जो जिंदा रहते हैं उन्हें और उनके परिवार को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इन बीमारियों की दवाएं काफी महंगी हैं।
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परिवार खर्च नहीं उठा पाते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पीजीआई के स्थापना दिवस समारोह में इन बीमारियों के इलाज को लेकर रणनीति बनाने का सुझाव दिया था।
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राष्ट्रीय स्तर पर बन रही रणनीति
इन बीमारियों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर इलाज की रणनीति बन रही है। इसके तहत प्रोजेक्ट नेशनल रजिस्ट्री फॉर रेयर एंड अदर इन्हेरीटेड डिजीज (एनआरआरओआईडी) शुरू किया जा रहा है। इसे आईसीएमआर की ओर से शुरू किया गया है। मेडिकल जेनेटिक्स विभागाध्यक्ष डॉ. शुभा फड़के ने बताया कि अब संस्थान में आने वाले आनुवांशिक बीमारियों के मरीजों और विटामिन से जुड़ी बीमारियों का पूरा डाटा तैयार किया जाएगा। इसमें यह भी देखा जाएगा कि किस इलाके से संबंधित बीमारी के मरीज ज्यादा आ रहे हैं और इसकी वजह भी तलाशी जाएगी।
ये हैं दुर्लभ बीमारियां
दुनिया में लगभग सात हजार ऐसे रोग हैं जिन्हें दुर्लभ माना जाता है। करीब 50 फीसदी दुर्लभ बीमारियां बच्चों में पाई जाती हैं। इनमें श्वसन तंत्र व पाचन तंत्र को प्रभावित करने वाली सिस्टिक फाइब्रोसिस और मांसपेशियों को प्रभावित करने वाली बीमारी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी शामिल हैं। इसी तरह फेब्री डिजीज, ऑस्टियोजेनेसिस इम्पर्फेक्टा, एकॉनड्रोप्लेसिया, गाउचर डिजीज, लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर, पॉम्पी, एपर्ट सिंड्रोम बीमारियां भी दुर्लभ श्रेणी में आती हैं।
नर्वस सिस्टम व मांसपेशियों पर असर
मुरादाबाद निवासी परिवार के पहले बच्चे को चलने में दिक्कत हो रही थी। परिवारीजन ने ध्यान नहीं दिया। बाद में पैदा हुए दो अन्य बच्चे भी इसी तरह से हो गए। पीजीआई में जांच हुई तो पता चला कि ये आनुवांशिक बीमारी स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी (एसएमए) के शिकार हैं, जो नर्वस सिस्टम और मांसपेशियों को प्रभावित करती है। इससे बच्चे खड़े नहीं हो पाते। यह बीमारी 11 हजार में से किसी एक में पाई जाती है। इसमें पहले हाथ काम नहीं करते और बाद में सांस लेने और निगलने में दिक्कत होती है। कुछ समय बाद मरीज की मौत हो जाती है। ऐसे बच्चों को प्रोटीन थेरेपी दी जाती है।

सात करोड़ प्रोजेरिया, डिस्लेक्सिया से पीड़ित
भारत में सात करोड़ से अधिक आबादी प्रोजेरिया और डिस्लेक्सिया जैसी दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित है। फिल्म पा की कहानी प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चे पर आधारित थी। डॉ. शुभा फड़के बताती हैं कि जिस दंपती का पहला बच्चा बीमारी से ग्रसित है, उन्हें गर्भधारण करने से पहले स्क्रीनिंग करानी चाहिए। गर्भावस्था के दौरान भी जांच से पता लग जाता है कि बच्चा बीमारी की चपेट में है या नहीं। भारत में 22 से 25 प्रकार की जांच होने लगी हैं। इनमें ऐसी 20 तरह की दुर्लभ बीमारियों की पहचान हो जाती है। फिर उनका चिकित्सकीय प्रबंधन किया जाता है। यही वजह है कि गर्भावस्था में चिकित्सक की सलाह पर फोलिक एसिड जरूर लेना चाहिए। संस्थान में हीमोफीलिया और थैलेसीमिया के करीब डेढ़ हजार बच्चों का इलाज चल रहा है। संस्थान में गर्भस्थ शिशु की क्रोमोसोम मेें गड़बड़ी का पता लगाने की सुविधा भी है। इससे मंदबुद्धि बच्चे की गर्भ में ही पहचानकर उसे जन्म लेने से रोका जा सकता है। अभी ये जांच सिर्फ प्रदेश में पीजीआई में ही है।
ये लक्षण दिखें तो डॉक्टर से मिलें
- जन्म के बाद बच्चे में दौरा या बार-बार बेहोशी आए।
- शरीर में अकड़न या शिथिलता की समस्या।
- शरीर या पेशाब से तेज दुर्गंध आने लगे।
- त्वचा में बदलाव या दाने निकले। समय के साथ उसमें बदलाव होने लगे।
- बच्चे का मानसिक या शारीरिक विकास न होना।
- सिर का सामान्य से छोटा या बड़ा होना। चेहरे में बदलाव नजर आए।
- सांस ज्यादा तेज या धीमे आने लगे।
- हड्डियां बार-बार टूटे। बच्चे के जरा सा गिरने पर हड्डी टूट जाए या टेढ़ी-मेढ़ी नजर आए।
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