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Lucknow News: ट्रॉमा सेंटर की कैजुअल्टी से 48 घंटे तक शिफ्ट नहीं हो रहे मरीज
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कैजुअल्टी में भर्ती मरीज।
लखनऊ। केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में विभागों के बीच आपसी सामंजस्य की कमी और एक-दूसरे पर टालने की आदत घायलों पर भारी पड़ रही है। इसकी वजह से मरीज 48 घंटे और कई बार इससे ज्यादा समय तक कैजुएल्टी में पड़े रह रहे हैं। गंभीर रोगियों और घायलों के मामले में यह देरी घातक साबित हो रही है।
केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में इस समय 491 बेड हैं। इनमें से 42 बेड कैजुएल्टी में हैं। सबसे पहले घायल और रोगियों को कैजुएल्टी में लाकर प्राथमिक उपचार मुहैया कराया जाता है। इसके बाद उन्हें संबंधित विभाग में शिफ्ट किया जाता है। समस्या यहीं से शुरू होती है। दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति के सिर में चोट, हड्डी टूटने के साथ ही अन्य समस्याएं हो सकती हैं। अब ये विभाग घायल को किसी एक विभाग में भर्ती करके इलाज शुरू करने के बजाय दूसरे विभाग पर टालते हैं। इसकी वजह से वह कैजुएल्टी में पड़ा रहता है।
बुधवार को यहां अंबेडकरनगर निवासी रोहित ने बताया कि उनके चचेरे भाई को पैर में फ्रैक्चर के साथ ही सिर में भी चोट है। यहां आए 24 घंटे से ज्यादा समय बीत चुका था, लेकिन अभी तक किसी विभाग में मरीज भर्ती नहीं हो सका है। इसी तरह बलरामपुर अस्पताल में भर्ती अमेठी निवासी रामशंकर के घरवालों ने बताया कि ट्रॉमा सेंटर में करीब 30 घंटे तक पड़े रहने के बावजूद विभाग में भर्ती नहीं किया गया। ऐसे में मरीज को वह बलरामपुर अस्पताल ले गए।
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नियुक्ति के बावजूद ट्रॉमा सेंटर में काम नहीं कर रहे डॉक्टर
ट्रॉमा सेंटर की व्यवस्था सुधारने के लिए शासन ने वर्ष 2015 में कार्डियोलॉजी, जनरल मेडिसिन, पीडियाट्रिक सर्जरी, पीडियाट्रिक, रेडियोडाग्नोसिस, आर्थोपेडिक और न्यूरोसर्जरी जैसी विधा के कुल 36 पद स्वीकृत किए थे। इनमें से 20 से ज्यादा डॉक्टर इस समय संस्थान में हैं, लेकिन ट्रॉमा सेंटर के बजाय संबंधित विभागों में काम कर रहे हैं, जबकि इनकी नियुक्ति आदेश में मुख्य रूप से ट्रॉमा सेंटर में रहने और बचे हुए समय में विभाग में काम करने की बात है। इस समय ट्रॉमा सेंटर की मुख्य बागडोर रेजिडेंट डॉक्टरों के भरोसे है। पढ़ाई और काम के दबाव के चलते उनका फोकस मरीज टालने पर रहता है। वहीं, नियमित डॉक्टरों के रहने पर भर्ती प्रक्रिया बेहतर करने के साथ ही तीमारदारों से होने वाले टकराव को भी टाला जा सकता है।
विभाग दर विभाग नहीं, एक स्थान पर मिल सकता है इलाज
ट्रॉमा सेंटर में अतिरिक्त डॉक्टरों के पद इस मंशा के साथ स्वीकृत किए गए थे कि सभी मरीज और घायलों को एक ही स्थान पर इलाज मिल सके। इसी वजह से इन पदों में दिल के साथ ही, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ शामिल थे, मगर ये डॉक्टर ट्रॉमा सेंटर में काम नहीं कर रहे हैं। इस वजह से दिल के रोगियों को कार्डियोलॉजी विभाग और स्त्री एवं प्रसूति रोग संबंधी समस्या होने पर मरीज को क्वीन मेरी जाना पड़ता है, जबकि ट्रॉमा सेंटर को इस तरह बनाया गया था कि वहां हर मरीज को इलाज मिल जाए। डॉक्टरों की तैनाती ट्रॉमा सेंटर में न होने से मरीजों को भटकना पड़ता है।
कैजुएल्टी मेडिकल ऑफिसर कर सकते हैं भर्ती
Iट्रॉमा सेंटर में भर्ती के लिए विभागों के बीच स्थिति साफ न होने पर कैजुएल्टी मेडिकल ऑफिसर को भर्ती करने का अधिकार दिया गया है। मरीज को भर्ती करने के बाद संबंधित विभाग को इसकी सूचना वह व्हाट्सएप के माध्यम से दे सकते हैं। अगर इसका पालन नहीं हो रहा है तो फिर इसे गंभीरता से लिया जाएगा।
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I- प्रो. केके सिंह, प्रवक्ता, केजीएमयू I
बेड खाली होने पर होती है भर्ती
Iट्रॉमा सेंटर पर मरीजों का काफी दबाव है। इस वजह से यहां बेड खाली नहीं रहते। बेड खाली न होने से कई बार विभाग मरीज को भर्ती करने में असमर्थतता जताते हैं। उनके बीच सामंजस्य बिठाकर मरीजों को भर्ती कराया जाता है।
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I- डॉ. प्रेमराज सिंह, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, ट्रॉमा सेंटरI
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केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में इस समय 491 बेड हैं। इनमें से 42 बेड कैजुएल्टी में हैं। सबसे पहले घायल और रोगियों को कैजुएल्टी में लाकर प्राथमिक उपचार मुहैया कराया जाता है। इसके बाद उन्हें संबंधित विभाग में शिफ्ट किया जाता है। समस्या यहीं से शुरू होती है। दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति के सिर में चोट, हड्डी टूटने के साथ ही अन्य समस्याएं हो सकती हैं। अब ये विभाग घायल को किसी एक विभाग में भर्ती करके इलाज शुरू करने के बजाय दूसरे विभाग पर टालते हैं। इसकी वजह से वह कैजुएल्टी में पड़ा रहता है।
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बुधवार को यहां अंबेडकरनगर निवासी रोहित ने बताया कि उनके चचेरे भाई को पैर में फ्रैक्चर के साथ ही सिर में भी चोट है। यहां आए 24 घंटे से ज्यादा समय बीत चुका था, लेकिन अभी तक किसी विभाग में मरीज भर्ती नहीं हो सका है। इसी तरह बलरामपुर अस्पताल में भर्ती अमेठी निवासी रामशंकर के घरवालों ने बताया कि ट्रॉमा सेंटर में करीब 30 घंटे तक पड़े रहने के बावजूद विभाग में भर्ती नहीं किया गया। ऐसे में मरीज को वह बलरामपुर अस्पताल ले गए।
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नियुक्ति के बावजूद ट्रॉमा सेंटर में काम नहीं कर रहे डॉक्टर
ट्रॉमा सेंटर की व्यवस्था सुधारने के लिए शासन ने वर्ष 2015 में कार्डियोलॉजी, जनरल मेडिसिन, पीडियाट्रिक सर्जरी, पीडियाट्रिक, रेडियोडाग्नोसिस, आर्थोपेडिक और न्यूरोसर्जरी जैसी विधा के कुल 36 पद स्वीकृत किए थे। इनमें से 20 से ज्यादा डॉक्टर इस समय संस्थान में हैं, लेकिन ट्रॉमा सेंटर के बजाय संबंधित विभागों में काम कर रहे हैं, जबकि इनकी नियुक्ति आदेश में मुख्य रूप से ट्रॉमा सेंटर में रहने और बचे हुए समय में विभाग में काम करने की बात है। इस समय ट्रॉमा सेंटर की मुख्य बागडोर रेजिडेंट डॉक्टरों के भरोसे है। पढ़ाई और काम के दबाव के चलते उनका फोकस मरीज टालने पर रहता है। वहीं, नियमित डॉक्टरों के रहने पर भर्ती प्रक्रिया बेहतर करने के साथ ही तीमारदारों से होने वाले टकराव को भी टाला जा सकता है।
विभाग दर विभाग नहीं, एक स्थान पर मिल सकता है इलाज
ट्रॉमा सेंटर में अतिरिक्त डॉक्टरों के पद इस मंशा के साथ स्वीकृत किए गए थे कि सभी मरीज और घायलों को एक ही स्थान पर इलाज मिल सके। इसी वजह से इन पदों में दिल के साथ ही, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ शामिल थे, मगर ये डॉक्टर ट्रॉमा सेंटर में काम नहीं कर रहे हैं। इस वजह से दिल के रोगियों को कार्डियोलॉजी विभाग और स्त्री एवं प्रसूति रोग संबंधी समस्या होने पर मरीज को क्वीन मेरी जाना पड़ता है, जबकि ट्रॉमा सेंटर को इस तरह बनाया गया था कि वहां हर मरीज को इलाज मिल जाए। डॉक्टरों की तैनाती ट्रॉमा सेंटर में न होने से मरीजों को भटकना पड़ता है।
कैजुएल्टी मेडिकल ऑफिसर कर सकते हैं भर्ती
Iट्रॉमा सेंटर में भर्ती के लिए विभागों के बीच स्थिति साफ न होने पर कैजुएल्टी मेडिकल ऑफिसर को भर्ती करने का अधिकार दिया गया है। मरीज को भर्ती करने के बाद संबंधित विभाग को इसकी सूचना वह व्हाट्सएप के माध्यम से दे सकते हैं। अगर इसका पालन नहीं हो रहा है तो फिर इसे गंभीरता से लिया जाएगा।
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I- प्रो. केके सिंह, प्रवक्ता, केजीएमयू I
बेड खाली होने पर होती है भर्ती
Iट्रॉमा सेंटर पर मरीजों का काफी दबाव है। इस वजह से यहां बेड खाली नहीं रहते। बेड खाली न होने से कई बार विभाग मरीज को भर्ती करने में असमर्थतता जताते हैं। उनके बीच सामंजस्य बिठाकर मरीजों को भर्ती कराया जाता है।
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I- डॉ. प्रेमराज सिंह, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, ट्रॉमा सेंटरI