'पंडितजी' और 'भाईसाहब' के नाम पर चला काला धंधा!
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‘पंडितजी’ और ‘भाई साहब’ आखिर हैं कौन? जिनके जिक्र भर से बगैर नंबर वाले वाहनों को रोकने की हिम्मत नहीं कर पाता था। सारी कानूनी बंदिशें खत्म हो जाती थीं। जांच एजेंसियां आंख बंद कर लेती थीं और पुलिस मुंह फेर लेती थी....।
ज्यादातर लोग मानते हैं कि यादव सिंह अकेले बूते इतना बड़ा खेल नहीं कर सकता। पिछली बसपा सरकार में जिस तरह यादव सिंह को ‘शक्तिशाली’ लोगों के संरक्षण के दस्तावेजी तथ्य सामने आ चुके हैं, उससे भी यह बात पूरी तरह सही लगती है कि ‘पंडितजी’ और ‘भाई साहब’ ऐसे किरदार थे, जिनका इशारा ही कानून था।
एनसीआर से लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमा चुके पंडितजी सत्ता के बेहद करीबी थे। इनकी पहुंच बहुत ऊंची थी और हाथ उतने ही लंबे। इतने लंबे कि जिसको चाहा, उसे आसमान पर पहुंचा दिया। इनका नाम लेते ही पुलिस और प्रशानिक अफसरों की बोलती बंद हो जाती थी।
‘भाई साहब’ की हनक तो किचेन कैबिनेट तक
जहां तक ‘भाई साहब’ की बात है तो घूम-फिरकर लोगों की नजरें एक ऐसे शख्स की तरफ घूम जाती हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह प्रदेश के एक पूर्व सीएम से सीधा ताल्लुक रखते थे और उनकी तगड़ी हनक थी।
लोगों की अटकलें और इशारे सही हैं या गलत? यह सच तो जांच के बाद ही सामने आ पाएगा। पर, अतीत के घटनाक्रम पर नजर डालें तो यह अटकलें और इशारे पूरी तरह निराधार भी नहीं लगते।
परिस्थितियों और इन लोगों की शख्सियत को सामने रखकर विश्लेषण करें तो बात और भी ज्यादा साफ तरीके से समझी जा सकती है। जिस तरफ इशारे हो रहे हैं, जिनकी चर्चा हो रही है, इन्हीं दो लोगों को भाजपा की भ्रष्टाचार उजागर समिति के तत्कालीन अध्यक्ष किरीट सोमैया ने अपने निशाने पर लिया था।
साथ ही इन दोनों लोगों के यादव सिंह से कारोबारी रिश्तों के दस्तावेजी सुबूत भी सार्वजनिक किए थे। बताया था कि इन लोगों ने किस तरह कंपनियां बना-बनाकर इधर का धन उधर किया है। सभी को याद होगा कि बसपा सरकार में मुख्यमंत्री के नजदीकी लोगों में जो पांच छह लोग थे, उनमें इन दोनों का स्थान कुछ अलग ही था।
यादव सिंह के पीछे थे प्रभावशाली लोग
जाहिर है कि जिन ‘पंडित जी’ और ‘भाई साहब’ का नाम ही इन ट्रकों का परमिट बन जाता था। वह इन्हीं की तरह का कोई शक्तिशाली व्यक्ति हो सकता है। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक भी कहते हैं कि सिर्फ एक इंजीनियर का रुतबा इतना नहीं हो सकता कि प्रशासनिक अधिकारी भी उसके सामने नतमस्तक हो जाएं। निश्चित रूप से ‘पंडित जी’ और ‘भाई साहब’ वह लोग हैं जो सरकार में काफी शक्तिशाली थे।
यादव सिंह के बाद दो और कर्मियों के खिलाफ प्राधिकरण ने कार्रवाई की है। सहायक परियोजना अभियंता रामेंद्र कुमार और लेखाकार प्रदीप शर्मा को सस्पेंड कर दिया गया है। आयकर विभाग ने प्राधिकरण को भेजी रिपोर्ट में इन दोनों के नामों का भी जिक्र किया है।
बसपा सरकार में प्राधिकरण में हुए 954 करोड़ रुपये के घोटाले में यादव सिंह के साथ ही उस समय के प्रभारी परियोजना अभियंता रामेंद्र कुमार को भी निलंबित किया गया था। रामेंद्र उस समय विद्युत एवं यांत्रिकी में तैनात थे। प्राधिकरण की तरफ से उस समय दर्ज एफआईआर में यादव सिंह के साथ रामेंद्र का भी नाम था।
दोनों ने कबूला अपना गुनाह
जिम्मेदारी रामेंद्र पर थी। रामेंद्र ने नोएडा प्राधिकरण में 1999 में बतौर एपीई ज्वाइन किया और 2004 से 2012 तक प्रभारी पीई विद्युत यांत्रिकी के पद पर रहे। 2012 में उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। वहीं, प्रदीप शर्मा भी यादव सिंह के कार्यालय में लेखाकार थे। मंगलवार को इन दोनों के निलंबन का कार्यालय आदेश जारी कर दिया गया।
प्राधिकरण के सूत्र इनके निलंबन का कारण आयकर विभाग से प्राप्त रिपोर्ट बता रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, विभाग ने रिपोर्ट में बताया है कि रामेंद्र व प्रदीप शर्मा ने ठेकों पर कमीशन की बात स्वीकार कर ली है। प्राधिकरण के एसीईओ पीके अग्रवाल ने भी आयकर की रिपोर्ट के आधार पर रामेंद्र व प्रदीप शर्मा को निलंबित किए जाने की बात कही है।
दरअसल, 27 नवंबर को जिस वक्त यादव सिंह के घर पर आयकर विभाग का छापा पड़ा था, उस दौरान एक व्यक्ति सुबह यादव सिंह के घर टेंडरों की सूची देने पहुंचा। उसको यह जानकारी नहीं थी कि छापा पड़ रहा है। वह सूची आयकर विभाग के हाथ लग गई थी। उसमें ढेर सारे कर्मचारी, अधिकारी और ठेकेदारों के नाम शामिल थे। उसी सूची के आधार पर आयकर विभाग ने प्राधिकरण के कुछ अधिकारियों को तलब भी किया था।
फिर खुले लॉकर, निकला खजाना
आईटी की इन्वेस्टिगेशन विंग ने मंगलवार को नोएडा और दिल्ली में यादव सिंह के बैंक लॉकर खंगाले। नोएडा के लॉकर से भारी मात्रा में ज्वैलरी मिलने की बात कही जा रही है। लॉकर खोलने की कार्रवाई हफ्तेभर तक जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।
छापेमारी के दौरान आईटी ने करीब 13 लॉकरों को सीज किया था, जिन्हें खोलने की प्रक्रिया लगातार जारी है। सूत्रों के मुताबिक, अब तक करीब सात लॉकर खोले जा चुके हैं। इनसे नकदी और दस्तावेज मिलने की बात सामने आ रही थी, लेकिन अब खोले जा लॉकरों में असली खजाना निकल रहा है।
मंगलवार दोपहर को सर्च वारंट लेकर आईटी की टीम सेक्टर-एक के सरकारी बैंक पहुंची। बैंक अधिकारियों की मौजूदगी में दोपहर करीब 3 बजे से शाम 6 बजे तक कार्रवाई जारी रही। सूत्रों की मानें तो लॉकरों से भारी मात्रा में मिली ज्वैलरी को डिब्बे में सीज कर दिया गया।
सोने-चांदी और हीरे की पहचान के लिए जौहरियों की सहायता ली गई। हालांकि, इस दौरान बैंक का कामकाज जारी रहा और वहां मौजूद लोगों को आईटी की कार्रवाई की बिल्कुल भी भनक नहीं लगी। नोएडा के अलावा आईटी की एक टीम दिल्ली में भी लॉकर खंगालने गई थी।
सूत्रों की मानें तो यादव सिंह का असली खजाना अब मिलना शुरू हुआ है। मंगलवार को नोएडा के लॉकर से मिली ज्वैलरी देखकर आईटी के अधिकारी भी भौचक्के रह गए। बताया जा रहा है कि अभी चार से पांच लॉकर खुलने बाकी हैं।